इंटरसेक्शनलजेंडर लड़कियों को शिक्षा के अधिकार से दूर करता लैंगिक भेदभाव

लड़कियों को शिक्षा के अधिकार से दूर करता लैंगिक भेदभाव

अगर लड़का पढ़ना चाहता है तो भी ठीक और नहीं पढ़ना चाहता है तो भी। गांव में लड़कियों को आज भी शिक्षा के लिए लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है और कई बार ये भेदभाव मानसिक और शारीरिक हिंसा तक पहुंच जाता है।

घर के कामों के लिए हमेशा मां मुझसे ही कहती हैं, इसका मैं जब भी विरोध करती हूं तो यही कह दिया जाता है घर का काम लड़कियों का काम होता है। लेकिन घर के मर्दों के हिस्से का काम भी हमेशा महिलाओं को करना पड़ता है। चाहे वह उनके लिए खाना बनाना हो, कपड़े धोना हो या फिर रहने के लिए मकान को व्यवस्थित करना हो। उनके लिए परिवार में शान से कहा जाता है कि वह लड़का है, घर का काम थोड़े ही करेगा।‘ एकतरफ जितने अनुशासन के साथ महिलाओं के काम और उनकी ज़िम्मेदारियों की बात की जाती है, उतने ही अनुशासन के साथ उनके अधिकारों का दमन करके उनके साथ ज़िंदगीभर भेदभाव किया जाता है। लड़की है तो वह कैसे बोलेगी, क्या बोलेगी, क्या करेगी, कितना पढ़ेगी, क्या काम करेगी और न सबकुछ ये समाज उसके लिए तय करता है। लड़कियों की ज़िंदगी से हर फ़ैसले में परिवार और समाज का दख़ल होता है।

बदलते समय में जब शहर की लड़कियों को पढ़ते और आगे बढ़ते हम जैसी गांव की लड़कियां देखती हैं तो हमें भी उन लड़कियों की तरह अपनी पहचान बनाने का मन होता है पर इसमें घर की परिस्थितियां ख़ासकर परिवार की सोच कई बार बिल्कुल भी साथ नहीं देती। अगर आगे पढ़ने या बढ़ने की बात करो तो सिरे से इसे आर्थिक तंगी और संसाधन के अभाव का हवाला देकर ख़ारिज कर दिया जाता है पर लड़कों के लिए ये सब बहुत लचीला होता है। अगर लड़का पढ़ना चाहता है तो भी ठीक और नहीं पढ़ना चाहता है तो भी। गांव में लड़कियों को आज भी शिक्षा के लिए लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है और कई बार ये भेदभाव मानसिक और शारीरिक हिंसा तक पहुंच जाता है।

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परिवार को किसी भी समाज की इकाई कहा जाता है ऐसे में जब परिवार लड़की के किसी भी निर्णय पर उसका साथ नहीं देता है तो लड़कियों का मनोबल टूटने लगता है और एक समय के बाद लड़कियां ख़ुद भी आगे बढ़ने के अवसर से अपने कदम पीछे करने लगती हैं। अक्सर गांव में होने वाली बैठकों या सामाजिक कार्यक्रमों में लड़कियों के कहा जाता है कि ये कुछ करना ही नहीं चाहती, इनके अंदर आगे बढ़ने की कोई इच्छा नहीं है। ये कहकर लड़कियों को आगे बढ़ने की ख़ूब बड़ी-बड़ी बातें कही जाती हैं। ये सब कहने के चक्कर में हम अक्सर ये भूल जाते हैं कि जब बचपन से लड़कियों के सपनों और उनकी मांगों को कुचला जाता है तो अचानक से लड़की कैसे अपने जीवन के लिए लड़ने को तैयार हो सकती है। मुझे याद है जब एक़ बार बचपन में मुझे मेरे पिता ने बिना किसी गलती के मारा था और मैंने इस पर उन्हें पलटकर ज़वाब दिया तो इसपर मुझे मां की भी मार खानी पड़ी थी। वह पहली बार था जब मैंने अपने साथ ग़लत होने पर आवाज़ उठाई थी। उस समय मेरी उम्र छह या सात साल रही होगी। कहने को तो यह छोटी बात है, लेकिन उसके बाद से मैंने ज़वाब देना बंद कर दिया था। ऐसा सिर्फ़ मेरे साथ नहीं हुआ, अपने आसपास के गांवों में अक्सर लड़कियों के साथ ऐसा होते देखती हूं कि उनकी आवाज़, मांग और अधिकारों को बचपन से ही इस तरह दबाया जाता है कि लड़कियां ख़ुद भी एक समय के बाद बोलना भूल जाती हैं।

अगर लड़का पढ़ना चाहता है तो भी ठीक और नहीं पढ़ना चाहता है तो भी। गांव में लड़कियों को आज भी शिक्षा के लिए लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है और कई बार ये भेदभाव मानसिक और शारीरिक हिंसा तक पहुंच जाता है।

ज़ाहिर है कि अगर हमने अपने घर में किसी लड़की को पढ़ाई करते या उसे आगे बढ़ते नहीं देखा है तो हम कैसे सीख सकते हैं कि हमें भी आगे बढ़ना है। शिक्षा और रोज़गार के अवसर में जब हम अपनी जैसी लड़कियों को आगे बढ़ते देखेगें तो इससे न केवल हम लड़कियों का बल्कि परिवारों का भी मनोबल बढ़ेगा। लैंगिक भेदभाव इस तरह हमारी जड़ों में है कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के में जो भी मज़दूर और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार है वहां लड़कियों को आगे बढ़ने और पढ़ने का पर्याप्त अवसर नहीं दिए जाते हैं। सरकार हर बार लड़कियों को शिक्षा में प्रोत्साहित करने के लिए अलग-अलग योजनाएं लाती है, लेकिन सच्चाई यही है कि इन योजनाओं से बड़ी संख्या में लड़कियां दूर रह जाती हैं। कई बार वे इस प्रोत्साहन से स्कूल की दहलीज़ तक तो पहुंच जाती है लेकिन पढ़ाई पूरी कर पाना उनके लिए किसी जंग से कम नहीं होती क्योंकि लड़कियों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने और पढ़ाई करने के लिए खुद अपनी ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है। अधिकतर परिवारों में साफ़ कह दिया जाता है कि पढ़ाई करो चाहे मत करो घर का काम पूरा करना पड़ेगा। स्कूल जाने से पहले और स्कूल से आने के बाद घर के सारे काम की ज़िम्मेदारी उन्हें वैसी ही उठानी पड़ती है। इतना ही नहीं, अगर घर में कोई दिक़्क़त होती है तो लड़कियों को ही स्कूल से छुट्टी करने को कहा जाता है। इन सब वजहों से लड़कियां पढ़ाई में पीछे छूटने लगती हैं और कई बार परीक्षा में फेल भी हो जाती हैं, जिससे कई बार उनको अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ जाती हैं।

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अक्सर शिक्षा और रोज़गार के लिए रिपोर्ट जारी होती है, जिसमें महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को देखकर सभी खुद को शाबाशी देने लगते हैं। हम यह कल्पना भी नहीं कर पाते कि अभी भी समाज के कई हिस्सों में लड़कियों को अपने बुनियादी शिक्षा और विकास के अवसरों से दूर रखा जाता है लेकिन जब हम इन अवसरों तक न पहुंचने वाली महिलाओं का विश्लेषण करेंगें तो हमें इन आंकड़ों की सच्चाई मालूम होने लगेगी। साथ ही, जब इसमें हम जातिगत विश्लेषण करेंगें तो ग्रामीण क्षेत्रों की दलित-मज़दूर परिवारों से आने वाली महिलाओं की भागीदारी न के बराबर पाएंगे। शिक्षा और बेहतर भविष्य का अवसर पाना हर इंसान का अधिकार है, लेकिन अपने समाज में इस अधिकार को आज भी लड़कों के लिए ही सुरक्षित रखा जाता है और इसकी शुरुआत कहीं और से नहीं बल्कि अपने परिवार से होती है। लैंगिक भेदभाव वाली सोच जब तक परिवार की रहेगी, तब तक परिवारों में महिलाओं की पहुxच उनके विकास से अवसरों तक नहीं बन पाएगी? इसलिए ज़रूरी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लैंगिक भेदभाव के दंश को दूर करने की दिशा में योजनाबद्ध तरीक़े से काम किया जाए नहीं तो योजनाएँ बहुत आएंगी लेकिन जब तक ज़नचेतना नहीं होगी तब तक कोई योजना समाज के अंतिम नागरिक तक नहीं पहुंचेगी।

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तस्वीर साभार : Indian Express

About the author(s)

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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