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हमारे देश के संविधान के तीसरे भाग में 86वें संवैधानिक संशोधन एक्ट 2002 के तहत शिक्षा के अधिकार को मूलभूत (फंडामेंटल) अधिकार माना गया है। शिक्षा का अधिकार जो समान रूप से समाज के हर वर्ग के बच्चे के पास होना चाहिए वह मौजूदा हालात में अपनाए गए शिक्षा के ‘ऑनलाइन मोड’ में, जिस रफ़्तार से चलकर इस समाज के वंचित वर्ग के बच्चों तक पहुंचा था, उसका आधा भी नहीं रह गया है। डेमोग्राफिक लेवल पर इस पूरे देश को शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में बांटते हैं तो इस डिजिटल डिवाइड को और गंभीर पाते हैं। अपनी बात इसी डिजिटल डिवाइड और शिक्षा के अधिकार को लेकर आपके सामने हम इस लेख के ज़रिये रखने जा रहे हैं।

वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों की माने तो साल 2019 तक 34.47 फीसद आबादी शहरों में रहती है। लाइव मिंट की रिपोर्ट के अनुसार भारत के छह बड़े शहर नई दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद और बंगलुरू में अनुसूचित जाति और जनजाति को एकसाथ लेने पर मात्र 11.25 फीसद आबादी इन समुदायों की इन छह शहरों में रहती है जो कि असल में दोनों की पूर्ण गणना 25.6 फीसद से बहुत कम है। जब सिर्फ़ छह बड़े शहरों का हाल ये है तब हम इस समुदाय के बाकी लोगों का हाल सोच सकते हैं और कह सकते हैं कि अनुसूचित जाति, जनजाति से आने वाले लोगों की एक बड़ी आबादी शहरी क्षेत्रों में अभी भी नहीं रहती हैं। लेकिन जो भी थोड़ी आबादी में शहरों में रहती है, वे या तो छोटी-मोटी नौकरी करते हैं या किसी और के यहां कामगार के रूप में काम करते हैं, या इन शहरों में माइग्रेंट वर्कर होते हैं यानि वे कामगार जो रोज़गार की तलाश में अपने शहरों, गांवों, कस्बों को छोड़कर दूसरे शहर आते हैं। इस प्रवासी मज़दूरों के बच्चे अगर संभव हो पाता है तो किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं या वहां के किसी सरकारी स्कूल में। कुल मिलाकर हम आंकलन कर सकते हैं कि शहरों में रहने वाले दलित, आदिवासी लोग उतना ही कमा रहे हैं जितने में उनका पेट भर सके और उनकी कुछ मूलभूत ज़रूरतें पूरी हो जाएं। 

ऐसे लोग जो अपने बच्चों को फ़ोन, लैपटॉप, इंटरनेट कनेक्टिविटी दे भी पाए तो इंटरनेट नेटवर्क का न मिलना भी एक बड़ा मसला है। बड़ी तादाद में ये बच्चे पढ़ाई-लिखाई का सामान नहीं जुटा पाए।

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साल 2020 के मार्च में जब लॉकडाउन हुआ तो एक तरह से कामगारों के लिए दुनिया हिल चुकी थी। वे अपनी अपनी यथास्थिति को देखते हुए अपने गांव, कस्बों की ओर वापस लौट चले। उनके वापस लौटने से वे बच्चे जो किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे थे या सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे उनकी पढ़ाई छूट गई। ऐसे में सरकार ने डिजिटल इंडिया का हवाला देते हुए ऑनलाइन मोड में पढ़ाई शुरू करने के आदेश जारी कर दिए। वे बच्चे जो गांव, कस्बों की तरफ लौटे वे ऑनलाइन पढ़ाई के लिए ज़रूरी संसाधन जैसे लैपटॉप, फ़ोन, इंटरनेट कनेक्टिविटी को जुटाने में असमर्थ रहे हैं क्योंकि उनके अभिभावकों की रोज़ की कमाई तो बंद हो चुकी है। ऐसे बच्चे जो इस ऑनलाइन मोड में पीछे छूटे वे फिर अपनी पढ़ाई आगे बढ़ा ही नहीं सके हैं और अलग-अलग तरह के कामों में घर चलाने के लिए जुट गए। हम अपने छोटे शहरों में भी छोटे बच्चों को अब काम करते हुए पहले से और भी ज़्यादा तादाद में देखते हैं। जो थोड़े बच्चों के मां-बाप अपना कुछ भी सामान बेचकर, जैसा कि हम खबरों में सुनते ही रहे किसी ने अपना ट्रैक्टर बेचा, किसी ने अपना जानवर ताकि बच्चे की पढ़ाई ना रुके। ऐसे लोग जो अपने बच्चों को फ़ोन, लैपटॉप, इंटरनेट कनेक्टिविटी दे भी पाए तो इंटरनेट नेटवर्क का न मिलना भी एक बड़ा मसला है। बड़ी तादाद में ये बच्चे पढ़ाई-लिखाई का सामान नहीं जुटा पाए।

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वहीं शहरों में रह रहे सवर्णों, अभिजात्य वर्ग के बच्चे सब सुविधाओं से लैस रहे। उनके लिए ऑनलाइन मोड ‘आपदा में अवसर’ बनकर उभरा जिससे कि वे अपनी पढ़ाई के इतर एक्स्ट्रा कोर्स तक कर पा रहे हैं। ग्रामीण अंचल की तरफ रुख करें तो वर्ल्ड बैंक के ही आंकड़ों के अनुसार 2019 तक भारत की 65.3 फीसद आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। जिसमें दलित, आदिवासिय बड़ी संख्या में मौजूद हैं लेकिन वे आर्थिक रूप से बेहद कमज़ोर हैं जो सवर्ण जमींदारों के यहां कामगार के रूप में काम करते हैं। द हिंदू की एक रिपोर्ट के 2017-18 में शिक्षा पर नेशनल स्टेटिस्टिक्ल ऑर्गनाइजेशन द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार अनुसार गांवों में 15% परिवारों तक ही इंटरनेट की सेवा उपलब्ध है। वह आदमी जो गरीब है, दूसरे के दबाव में रहता है, दूसरों के खेतों में कोल्हू के बैलों जैसे काम करता है, निश्चित है कि वह इस 15% का हिस्सा नहीं है। सरकार नाकाम रही है इन परिवारों तक, इन ग्रामीण क्षेत्रों तक इंटरनेट की सेवा उपलब्ध कराने में। इतने कम संसाधनों में, जो हर तरह से दूसरे पर भारी पड़ेगा, तय है कि इस लड़ाई में वही जीतेगा। ऊंची जाति और अभिजात्य वर्ग यहां हर क्षेत्र में भारी पड़ेगा क्योंकि उसके पास हर संसाधन मौजूद है।

भारतीय संविधान जो शिक्षा का अधिकार सभी को देता है, उसी भारत की शिक्षा प्रणाली ने इस अधिकार को ‘शिक्षा का विशेषाधिकार’ में बदलकर रख दिया है। जिसके पास संसाधन हैं वह इस विशेषाधिकार को पा लेगा।

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मार्च 2020 से लेकर अब तक स्कूल, कॉलेज पूरी तरह से नहीं खुले हैं। विद्यार्थियों के पास आज भी ऑनलाइन मोड ही एकमात्र साधन है पढ़ने का। जिसके पास संसाधन हैं वह शिक्षा के ऑनलाइन मोड में फिट हो पाया। इस पूरे आंकलन में हम देखते हैं कि जो वर्ग धीरे-धीरे पढ़ने में बढ़ रहा था, इस महामारी के दौर में और सरकारी ढांचे की ख़राब व्यवस्था ने उसे और पीछे धकेल दिया है। ऑल इंडिया सेकंडरी हाइयर एजुकेशन रिपोर्ट 2018-19 के अनुसार स्नातक के लिए विश्वविद्यालयों में आए 79.8 फीसद आवेदनों में से अनुसूचित जाति के 14.9 फीसद और अनुसूचित जनजाति के 5.5 फीसद ही आवेदन आवेदन आए यानि कॉलेज, यूनिवर्सिटी में अनुसूचित जाति और जनजाति के आवेदनों को मिलाकर देखें तो यह सामान्य वर्ग से आने वाले छात्रों के मुकाबले 20 फीसद के आस-पास है। पढ़ने वाले दलित, आदिवासी बच्चे भी इस समय अपने घरों पर हैं। सरकार की लापरवाहियों और नीतियों के कारण जिनके घरों में कमाने वाला एक ही व्यक्ति था और अब घर बैठ गया है तो वे बच्चे अब भला कैसे इंटरनेट का मोटा खर्चा उठाएंगे। जो सुदूर इलाकों में रहते हैं जहां कभी बिजली नहीं पहुंची, वहां भला अच्छा नेटवर्क, इंटरनेट कनेक्शन कैसे पहुंचेगा।

ऐसे हालात में दलित, आदिवासी छात्रों को इस व्यवस्था ने मिलकर पीछे छोड़ दिया है। शिक्षा के क्षेत्र की वह दौड़ जो कभी समान पट्टी से शुरू नहीं हुई थी, उसमें आधुनिक संसाधनों की उपलब्धता को ‘विशेषाधिकार’ के रूप में खड़ा कर, दलित, आदिवासी समाज के बच्चों के लिए उनके सपनों को पाने का संघर्ष अधिक कठिन और भयावह कर दिया है। पिछले साल केरल में दसवीं की एक दलित छात्रा ने ऑनलाइन क्लासेज ना ले पाने के कारण ख़ुद को खत्म करना ज़रूरी समझा। ऐसे तमाम केस हैं जो कभी तो रिपोर्ट भी नहीं होते हैं। इसीलिए इन आंकड़ों को लिखे हुए आंकड़े से ज़्यादा लेकर चलना ही बेहतर है। भारतीय संविधान जो शिक्षा का अधिकार सभी को देता है, उसी भारत की शिक्षा प्रणाली ने इस अधिकार को ‘शिक्षा का विशेषाधिकार’ में बदलकर रख दिया है। जिसके पास संसाधन हैं वह इस विशेषाधिकार को पा लेगा। एक ऐसा वक़्त जब डिजिटल डिवाइड सिर्फ बढ़ रहा है, उस वक़्त इस देश के तमाम शिक्षाविदों, संस्थानों को सोचना चाहिए कि वो आखिर इस शिक्षा के अधिकार को कैसे ‘इन्क्लूसिव’ करें।

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तस्वीर साभार : Global Public Affairs

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मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की स्नातक की छात्रा हूँ। जिस समाज में, ख़ासतौर से छोटे शहरों में आज भी लड़कियों को राजनीति से दूरी रखने की हिदायत दी जाती है वहाँ मैंने ना सिर्फ़ स्नातक में विषय के तौर पर बल्कि रोज़ की बातचीत, घर में डिस्कशन के लिए भी राजनीति का रुख किया। मैं उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर मथुरा में पली बड़ी हूँ। शौक की बात करें तो हिंदी कैलिग्राफी, पेंटिंग, डायरी में क्रिएटिव पोस्टर्स, डिजिटल पोस्टर्स, फ़ोक म्यूज़िक सुनना, कविताएँ लिखना, ब्लॉग लिखना, साहित्य पढ़ना, ये सब मेरे शौकों की फेहरिस्त में शामिल हैं। अब तक के जीवन के संघर्षों को कुछ लाइनों में समेटना मुश्किल होगा इसीलिए सिर्फ़ इतना कह सकती हूँ कि मैं एक एंटी-कास्ट हूँ इसीलिए वैचारिक पंगे और उनसे उपजी लर्निंग-अनलर्निंग, और माइग्रेन सरदर्द मेरे रोज़मर्रा के जीवन में आम बात है।

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