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महिलाओं के खिलाफ हिंसा, पुरुषों और महिलाओं के बीच ऐतिहासिक रूप से असमान शक्ति संबंधों की अभिव्यक्ति है, जिसके कारण पुरुषों द्वारा महिलाओं पर वर्चस्व और भेदभाव किया गया है और महिलाओं की पूर्ण उन्नति को रोका गया है। महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ़ हिंसा एक वैश्विक महामारी बनी हुई है जो उन्हें शारीरिक, मानसिक, यौन और आर्थिक रूप से मारती है, प्रताड़ित करती है। महिलाओं और लड़कियों को समानता, सुरक्षा, गरिमा, आत्म-मूल्य और मौलिक स्वतंत्रता का आनंद लेने के उनके अधिकार से वंचित करना, यह मानवाधिकारों के सबसे व्यापक उल्लंघनों में से एक है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा, संस्कृति, वर्ग, शिक्षा, आय, जाति, धर्म, हर आधार पर, हर जगह मौजूद है। भले ही अधिकांश समाज महिलाओं के खिलाफ हिंसा को प्रतिबंधित करते हैं। वास्तविकता यही है कि महिलाओं के मानवाधिकारों के उल्लंघन को अक्सर सांस्कृतिक प्रथाओं और मानदंडों की आड़ में या धार्मिक सिद्धांतों की गलत व्याख्या के माध्यम से मंजूरी दी जाती है। इसके अलावा, जब उल्लंघन घर के भीतर होता है, जैसा कि अक्सर होता है तो राज्य और कानून लागू करने वाली मशीनरी द्वारा प्रदर्शित मौन चुप्पी और निष्क्रियता इस दुर्व्यवहार को माफ कर देती है।

महिलाओं के साथ किया जाने वाला दुर्व्यवहार शारीरिक, यौन, मानसिक, आर्थिक किसी भी प्रकार का हो सकता है। आज के समय में शारीरिक के साथ- साथ आर्थिक हिंसा भी महिलाओं के जीवन को भयावह बनाए हुए है। यह सच है कि पैसा मनुष्य को पूरी तरीके से खुश नहीं करता है लेकिन यह भी सच है कि पैसे के बिना कुछ भी संभव नहीं है। इसलिए, आर्थिक शोषण नियंत्रण का सबसे बड़ा रूप है। दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति द्वारा औरतों के पैसे और अन्य संसाधनों, जैसे भोजन, कपड़े, परिवहन और रहने की जगह तक पहुंच को प्रतिबंधित करना और उसका शोषण करना आर्थिक शोषण कहलाता है। यह वास्तव में किसी की स्वतंत्रता को सीमित करके उसे अपने ऊपर निर्भर बनाना होता है। 

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अंतरंग साथी हिंसा (इंटिमेट पार्टनर वॉयलेंस) महिलाओं के खिलाफ हिंसा के सबसे आम रूपों में से एक है जो पति या अंतरंग पुरुष साथी द्वारा किया जाता है। यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या भी है जो औरतों के शारीरिक, प्रजनन और मानसिक स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ी है। पुरुष द्वारा वर्चस्व स्थापित करने की होड़ में वे महिलाओं के अधिकारों का हनन करने लगते हैं। वे इसे अपने जीवन का अंग, या संस्कृति का हिस्सा मानते हुए इसे अपनाने लगते हैं। वास्तव में ऐसा करने के पीछे कई कारण काम करते हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने अपने आस-पास यही होते देखा है, अपने बड़ों को इसी ढर्रे को अपनाते हुए ज़िंदगी जीते देखा है, उन्हें बचपन से यही सिखाया गया है, आदि।

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आर्थिक शोषण नियंत्रण का सबसे बड़ा रूप है। दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति द्वारा औरतों के पैसे और अन्य संसाधनों, जैसे भोजन, कपड़े, परिवहन और रहने की जगह तक पहुंच को प्रतिबंधित करना और उसका शोषण करना आर्थिक शोषण कहलाता है।

मुंबई की रहने वाली शमा ने पढ़-लिखकर अपने बलबूते पर नौकरी प्राप्त की। वह हर महीने 50 से 70 हज़ार रूपये कमा लेती थी। शादी के बाद पति ने उससे उसकी नौकरी का हिसाब लेना शुरू कर दिया। इससे शमा के दिल को ठेस तो पहुंची मगर वह पति के आगे मजबूर थी। पहले-पहल पति उससे सिर्फ हिसाब लिया करता था, धीरे- धीरे उसने उससे पैसे भी मांगना शरू कर दिया। हिसाब देने के लिए मना करने पर पति की तरफ से इमोशनल ब्लैकमेल किया जाने लगा। यह इमोशनल ब्लैकमेल कब शाब्दिक हिंसा में बदल गया वह भी नहीं समझ पाई। पति को पैसे न देने पर उसके साथ बदतमीज़ी की जाने लगी, उसको नए-नए नामों से पुकारा जाने लगा। पति के इस व्यवहार ने शमा पर बुरा प्रभाव डाला। वह बहुत अधिक डिप्रेशन में रहने लगी, बाद में एक दिन उसने इस रोज़- रोज़ की हिंसा से बचने के लिए अपनी जान दे दी। यह सिर्फ एक उदाहरण है। इस प्रकार के न जाने और कितने उदाहरण हैं जो हमारे चारों तरफ मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपे हुए हैं।

कैसे पता करें कि आप आर्थिक हिंसा कि शिकार हैं

आर्थिक शोषण कई रूप ले सकता है। आर्थिक हिंसा करने के लिए दुर्व्यवहार करने वाला व्यक्ति निम्नलिखित कोई भी काम कर सकता है:

1- पैसा कब और कैसे खर्च किया जाए इस पर नियंत्रण रख सकता है।

2- वही तय करता है कि आप क्या खरीद सकते हैं क्या नहीं।

3- वह आपसे आप ही के पैसे मांगता है। 

4- औरत द्वारा खर्च किए गए पैसों की रसीदों की जांच करता है। 

5- औरत ने कितना पैसा कहां खर्च किया है उसकी डायरी बनाने के लिए कहता है। 

6- औरत द्वारा की गई हर खरीदारी को सही साबित करने के लिए ज़ोर देता है। 

7- औरत द्वारा खरीदी गई या उसे उपहार में दी गई संपत्ति को नियंत्रित करता है।  

8- सभी आर्थिक संपत्तियां (जैसे, बचत, घर) उसी के नाम पर किए जाएं इसके लिए औरत को विवश करता है। 

9- अपनी सभी वित्तीय जानकारी गुप्त रखता है।

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आर्थिक हिंसा भयावह क्यों है ?

आर्थिक दुर्व्यवहार करने वाले के साथ रहने के दौरान एक महिला के लिए शारीरिक रूप से हिंसक साथी को छोड़ना मुश्किल होता है जब वह आर्थिक रूप से उस पर निर्भर होती है। जब हिंसा करने वाला व्यक्ति पीड़ित के आर्थिक संसाधनों तक पहुंच को सीमित कर देता है, तो अगर पीड़ित घर छोड़ता है तो वह अपने लिए एक सुरक्षित आवास खोजने के लिए और दिन-प्रतिदिन की लागतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करेगा। आर्थिक रूप से शोषित महिलाओं को कम वेतन, खंडित भुगतान कार्य और अपर्याप्त सेवानिवृत्ति के कारण वित्तीय अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। दुर्व्यवहार करने वाले द्वारा शिक्षा या रोज]गार में दखल देने से महिलाओं के लिए नौकरी ढूंढना मुश्किल हो सकता है। जिन महिलाओं ने आर्थिक शोषण का अनुभव किया है, उनके अलग होने पर वित्तीय निपटान (फाइनेंशियल सेटलमेंट) में अच्छा प्रदर्शन करने की संभावना कम होती है। एक स्त्री जो खुद कमाती है लेकिन उस कमाई को अपनी इच्छा अनुसार खर्च नहीं कर सकती, तब ऐसे में वह मानसिक हिंसा का भी सामना करती है। पिछले दो दशकों में रिपोर्ट किए गए सबसे प्रचलित मानसिक स्वास्थ्य परिणाम अवसाद, पोस्टट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD), और चिंता हैं। इससे ग्रस्त रोगियों की कई बार आत्महत्या से मौत भी हो जाती है।

आर्थिक हिंसा पर कैसे प्रतिक्रिया दें ?

आर्थिक हिंसा के रोकथाम के लिए पहला कदम आर्थिक दुरुपयोग को गंभीरता से लेना है। एक बदलाव की ज़रूरत है कि घरेलू हिंसा को अधिक व्यापक रूप से कैसे समझें ? साथ ही दुर्व्यवहार करने वाले की हिम्मत को बढ़ावा देने की जगह उससे साफ़ शब्दों में बात करें। अगर इससे भी दुर्व्यवहार कम नहीं होता है तो उसकी सूचना अपने परिवार को दें। परिवार की ओर से यदि सहयोग नहीं मिलता है तो किसी ऐसी संस्था जो कि महिलाओं के अधिकारों पर कार्य करती है उससे संपर्क करें। अब वह समय नहीं रहा जब स्त्री को संस्कार के नाम पर चुप करा दिया जाता था। सभी को पूरी तरह से अपने तरीके से जीने का अधिकार है। किसी को भी यह अनुमति नहीं है कि चलन या संस्कृति के नाम पर मानवाधिकारों का हनन किया जाए। समय बदल चुका है। स्त्री की इज़्ज़त करना सीखें।

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तस्वीर साभार : Sipping Thoughts

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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