समाजकानून और नीति शिक्षा एक प्रिविलेज : कैसे क्राउड-फंडिंग के ज़रिये अपने सपनों को पूरा करेंगे ये विद्यार्थी

शिक्षा एक प्रिविलेज : कैसे क्राउड-फंडिंग के ज़रिये अपने सपनों को पूरा करेंगे ये विद्यार्थी

भारत में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों का इतिहास समावेशी नहीं रहा है। शोषित तबक़े के लोगों को शिक्षित होने के रास्ते से ही सामाजिक आर्थिक बराबरी और गतिशीलता मिल सकती है।

एडिटर्स नोट : यह लेख हमारी दो पार्ट की सीरीज़ का पहला भाग है जहां हमने अलग-अलग समुदायों के आनेवाले चार छात्रों से बात की है जो क्राउड-फंडिंग के ज़रिये विदेशी कॉलेजों की फीस जुटा रहे हैं। ये सीरीज़ इस मुद्दे पर केंद्रित है कि कैसे शिक्षा हमारे देश में आज भी एक विशेषाधिकार है।

भारत में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों का इतिहास समावेशी नहीं रहा है। शोषित तबक़े के लोगों को शिक्षित होने के रास्ते से ही सामाजिक आर्थिक बराबरी और गतिशीलता मिल सकती है। उनके लिए शिक्षा व्यवस्था की सरकारी नीतियां कितनी लाभकारी साबित हो रही हैं यह सवाल साल 2021 में भी बना हुआ है। उच्च शिक्षा की बात करें तो भारत से बाहर के विश्वविद्यालयों में चयनित छात्रों की समस्याओं के समाधान में सरकार के पास कोई ठोस उपाय नहीं नज़र आता। इनकी समस्याएं भारत की शिक्षा नीतियों के मूलभूत मूल्यों की कमियां उजागर करती हैं। इस साल कई विद्यार्थी विदेश जाकर पढ़ने के लिए क्राउड-फंडिंग कर रहे हैं। उनके फंड जमा करने के पोस्टर में उनका नाम, अब तक की शैक्षणिक योग्यताएं, उनका काम, साथ में जिस विश्वविद्यालय में उनका चयन हुआ है उसकी जानकारी लिखी होती है। इनमें से कुछ लोगों की यह दूसरा मास्टर्स की डिग्री होगी तो कुछ लोग केवल स्नातक हैं। हालांकि आप इनकी शैक्षणिक यात्राओं को ध्यान से देखें तो समझ पाएंगे कि ये सभी लोग ऐसे जगहों या समुदायों से आते हैं जिन का शिक्षित होना, उच्च शिक्षा के संस्थानों में दाख़िला लेना उनके साथ-साथ समावेशी समाज के लिए संघर्ष करने वाले अन्य लोगों के लिए एक प्रतीकात्मक सफलता भी है। जिन लोगों को लंबे समय तक शिक्षण संस्थानों ने जगह नहीं दी गई या विशेषाधिकार प्राप्त लोगों ने उनके संघर्षों को केवल केस स्टडी के रूप में देखा। 

समय रहते फीस के पैसों के लिए सरकार पर निर्भर रहना शिक्षा के इस मौके को दांव पर लगाने जैसा है। इसलिए ये विद्यार्थी फंड इकट्ठा कर रहे हैं। फंड रेज़ के ज़रिये ये बता रहे हैं कि उन्हें कितने पैसों की ज़रूरत है और लोग चाहें तो अपनी मर्ज़ी से उन्हें इस राशि को जमा करने में अपना आर्थिक योगदान दें या उसे प्रचारित कर अन्य लोगों तक पहुंचाने की भूमिका निभा सकते हैं। शुरू-शुरू में फंड रेज़ milap.org जैसे वेबसाइट के ज़रिये हो रहा था, फिर कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय कलाकार जैसे, इंस्टाग्राम पर bakery prasad, artedkar इत्यादि नाम से मौजूद हैं, जो विद्यार्थियों के इस संघर्ष को समझते हैं वे अपनी डिजिटल पहुंच द्वारा आगे आकर उनकी मदद के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। शिक्षा हासिल करना जब ख़ास लोगों का विशेषिधकार हो जाता या तब अपने लिए खुद सीढ़ियां बना रहे इन विद्यार्थियों से फेमिनिज़म इन इंडिया ने बात की और जाना कि सरकारी योजनाएं किस वजहों से उनके काम नहीं आ पायी। आइए, उनके प्रत्यक्ष अनुभव हम उनसे ही सुनते हैं।

https://twitter.com/maknoonwani/status/1402151861767970822

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मकनून वानी कश्मीर के रहने वाले हैं। उन्होंने ‘दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज़म’ से स्नातक किया है। साल 2020 में उनका चयन भारत के ‘अशोका यूनिवर्सिटी’ में हुआ था लेकिन आर्थिक दिक्कतों के कारण वह वहां नहीं पढ़ सके। मकनून बताते हैं, “मुझे बैंक स्टेटमेंट, अकाउंट डिटेल साल 2018,2019 और 2020 के लिए देना था। आर्थिक सहायता के लिए मेरे एप्लिकेशन को देखते हुए उन्होंने शायद इसपर ध्यान नहीं दिया कि साल 2019 में कश्मीर में क्या हुआ था। कश्मीर को सिक्यॉरिटी लॉकडाउन में रखा गया था। इंटरनेट की सुविधाएं नहीं थीं। कश्मीर एक साल से ज्यादा बंद रहा। उसके तुरंत बाद कोरोना लॉकडाउन हो गया। इसलिए दो साल तक मेरे परिवार के पास आमदनी का कोई सार्थक ज़रिया नहीं था। आर्थिक सहायता देते समय कॉलेज या सरकार बाकी लोगों और मेरे जैसे कॉन्फ्लिक्ट ज़ोन से आने वाले लोगों को एक तरह से नहीं देख सकते। हालांकि कई कश्मीरी कश्मीर से बाहर पढ़ते हैं लेकिन अधिकतर कश्मीर के अमीर परिवारों से आते हैं। मैं मध्यवर्गीय परिवार से हूं। एक कश्मीरी मध्यवर्गीय परिवार का निम्न वर्ग में शामिल हो जाने की संभावना बनी रहती है। बस कुछ महीनों के लॉकडाउन से ऐसा हो जाता है। उन्होंने इस बात को महत्ता नहीं दी जबकि फॉर्म में मैंने यह बात लिखी थी। दाखिले के लिए मुझे 6 लाख खुद से देने पड़ते जो मेरे लिए संभव नहीं था।” मकनून के पास इस साल तीन विश्वविद्यालयों का ऑफर लेटर है। लंदन स्कूल ऑफ कॉमर्स, SOAS यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन, ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी। इस साल मकनून ऑक्सफर्ड जाने का अपनी प्रतिभा से कमाया हुआ मौका खोना नहीं चाहते इसलिए वह पब्लिक फंडिंग कर रहे हैं। उनके सोशल मीडिया हैंडल पर ‘Send Maknoon to Oxford’ के कई पोस्टर्स मिल जाएंगे।

मकनून बताते हैं, “मेरे कई दोस्त जिनसे मेरी बातचीत है विदेश में पढ़ने का सोचते तक नहीं। मेरे परिवारवालों को भी इस बारे में कुछ नहीं पता था। मैंने इस कोर्स और एप्लिकेशन का सारा काम खुद से किया, गूगल कर कर के।” मकनून के कॉन्फ्लिक्ट ज़ोन से संबंध रखने के कारण उनका निज़ी संघर्ष भारत के विद्यार्थियों से अलग है। फिर भी थोड़ी समानता इस मामले में आगे के उन अलग-अलग लोगों के साथ बातचीत में समझ आती है जिनके पास सामाजिक पहचान का पीढ़ीगत प्रिविलेज नहीं रहा है। मकनून विदेशी विश्विद्यालयों में भारत के अलग-अलग समुदाय के प्रतिनिधित्व के सवाल पर कहते हैं, “आप ऑक्सफोर्ड में पढ़ने वाले लोगों का डेटा देखिए, कितने कश्मीरी मुस्लिम वहां मिलेंगे? कितने भारतीय मुसलमान मिलेंगे? लोग मेरिट की बात करते हुए यह भूल जाते हैं कि मेरे जैसे लोग अल्पसंख्यक पहचान के लोग हैं। हमारा संघर्ष बहुत अलग है। मेरे परिवार में कोई भारत से बाहर कभी पढ़ने नहीं गया है। ऑक्सफर्ड जैसी यूनिवर्सिटी की तो बात ही दूर है। कई हिन्दू उच्च जाति के लोग जो ऐसे संस्थाओं में हैं मैं उनकी प्रतिभा पर सवाल नहीं कर रहा पर उनके पास आर्थिक संसाधन मौजूद हैं। हमारे पास वह चीज़ नहीं है लेकिन मेरा चयन हुआ मतलब मैं उस लायक हूं। जब हम बाहर से पढ़कर आएंगे हम अपने समुदाय के लिए काम करेंगे। हमारी व्यक्तिगत बेहतरी, समुदाय के लोगों के अंदर से ये हिचक दूर करेगी कि कोई ऐसी जगह नहीं है जो उनके पहुंच से बाहर है। ये वे जगहें हैं जहां से वैश्विक स्तर के लीडरों ने अपनी यात्रा शुरू की। हमारे समुदाय को भी ऐसे जगहों पर स्पेस मिलना चाहिए ताकि हमारा प्रतिनिधित्व हो लेकिन हमारे पास संसाधन नहीं हैं जबकि क्षमता है, जिसे हमने साबित किया है। सरकारी योजनाओं को लेकर मकनून अपने अनुभव बताते हैं, “मेरे लिए एक ही स्कीम थी, कॉमन वेल्थ स्कॉलरशिप लेकिन उसकी प्रक्रिया बहुत ही पेचीदा है। आप इस साल के चयनित विद्यार्थियों की सूची देखें तो सारे ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज से हैं। जिस समय फॉर्म भरने की प्रक्रिया चल रही थी मेरे पास ऑक्सफर्ड का स्वीकृति पत्र (acceptance letter) नहीं था। मेरे पास सिर्फ लंदन स्कूल ऑफ कॉमर्स का स्वीकृति पत्र था। इस स्कॉलरशिप के लिए वे लोग शीर्ष बीस स्थान वाले यूएस विश्वविद्यालयों के लिए जा रहे विद्यार्थियों को चुनते हैं। लंदन स्कूल 49वें स्थान पर है और ऑक्सफर्ड का पत्र मेरे पास आया नहीं था। इसलिए ये छात्रवृत्ति मेरे किसी काम नहीं आई। 

भारत में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों का इतिहास समावेशी नहीं रहा है। शोषित तबक़े के लोगों को शिक्षित होने के रास्ते से ही सामाजिक आर्थिक बराबरी और गतिशीलता मिल सकती है।

ये छात्रवृत्ति भी पिछले साल केवल 20 लोगों को मिल पाई जो संख्या काफी नहीं है। हालंकि ट्विटर और अन्य जगहों पर कुछ लोग अभी तक फंड रेज़ करने वाले विद्यार्थियों की यात्रा और संघर्ष नहीं समझ पा रहे हैं। मकनून बताते हैं कि उनका कोर्स अकादमिक कोर्स है, “भारत में रिसर्च को लेकर लोग नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। रिसर्च प्रॉजेक्ट और रिसर्चर को पैसे और मौक़े मिलने चाहिए इस बात की जागरूकता यहां नहीं है। उसे लोग जॉब की तरह नहीं देखते। इसलिए एक भ्रम पैदा होता है कि हयूमैनिटिज़ के कोर्स से समाज को कोई फ़ायदा नहीं होता, यह गलत है। रिसर्च किसी विषय पर पॉलिसी बनाने का पहला और मुख्य कदम है। जैसे मेरा कोर्स है ‘Msc in social science of the internet’, इंटरनेट को लेकर कई बातें हैं, जैसे हेट स्पीच, इंटरनेट प्रतिबंध, इन चीजों को लेकर अगर रिसर्च हुए बिना पॉलिसी बनीं तो भारत के 2021 आईटी ऐक्ट जैसी पॉलिसी बनेगीं जो ऑनलाइन अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन है।”

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फेमिनिज़म इन इंडिया ने एक और विद्यार्थी मोनालिसा बरमन से की। मोनालिसा मेघालय के कोच जनजाति के पहली महिला होंगी जिनके पास उच्च शिक्षा के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी जाने का मौका है। उन्हें ‘MA, public administration’ के लिए स्वीकृति पत्र मिला है। उन्होंने बीए, एलएलबी बेंगलुरु के KLE कॉलेज से किया है। TISS से उन्होंने एमए सोशल वर्क में किया है। उनकी विशेषज्ञता ‘दलित और ट्राइबल स्टडीज़’ है। छात्रवृत्ति से जुड़े अपने निज़ी अनुभवों को लेकर मोनालिसा कहती हैं, “मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफ़ेयर स्कॉलरशिप देती है लेकिन ज़मीन पर जानकारी का अभाव रहा। हमें मालूम नहीं होता कि उसके लिए एक साल पहले अर्ज़ी देनी होती है। स्कॉलरशिप का पोर्टल भी बहुत ढंग से काम नहीं कर रहा था, कई अपडेट नहीं मिल पा रहे थे। बाद में मैंने मंत्रालय को चिट्ठी लिखी, वे लोग चिट्ठी छात्रवृत्ति विभाग को भेजते हैं। विभाग से किसी ने मुझे संपर्क उसके बाद इस सिलसिले में नहीं किया। मोनालिसा फंड रेज़ करने के पहले की स्थितियां बताती हैं। “मुझे ऑफर लेटर मार्च में मिल गया था। मैंने स्कॉलरशिप की कोशिश की जो मेरे पक्ष में कारगर साबित नहीं हुई। मैंने अपने राज्य के मुख्यमंत्री से संपर्क किया। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार के पास इस संदर्भ में मदद की कोई योजना नहीं है। मैंने तुरा की एमपी अगाथा संगमा से संपर्क किया। अप्रैल में उन्होंने ट्राइबल मिनिस्ट्री को लिखा। उस दौरान यहां लॉकडाउन हो गया। मैं प्रोडज़ी लोन के बारे में सोच रही थी लेकिन किसी कारण से वे मुझे लोन नहीं दे सकते थे। लेकिन बात ये है कि लॉकडाउन था और मैं शेड्यूल 6 क्षेत्र से आती हूं। हमें लोन लेने जैसे काम के पहले कई तरह के कागज़ी काम करने पड़ते हैं। लॉकडाउन में सब कुछ ठप था और सारी प्रक्रिया लेट से हो रही थी। मैं मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफ़ेयर के जवाब का भी इंतज़ार कर रही थी, लेकिन अंत में मुझे फंड रेज़ करना ही एकमात्र रास्ता दिखा जिससे समय रहते मैं फीस के लिए पैसे जमा कर सकती थी। मैंने अन्य विकल्प आज़माए पर काम बना नहीं।”

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मोनालिसा 31 साल की हैं। कोविड के समय वह अपनी जनजाति के गांव में जाकर काम कर रही थीं। TISS से निकलने के बाद उन्होंने कई मुद्दों पर रिसर्च की है। जैसे, नगालैंड, ओडिशा, असम, हरियाणा, मध्यप्रदेश में महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ के ऊपर, नॉर्थईस्ट से ट्रैफिकिंग शुरू होकर दिल्ली में खत्म होने के केस पर। इतने बेहतरीन काम के बाद भी उनके संघर्ष कम नहीं हुए हैं। जो लोग सरकारी शिक्षा नीति की जगह पब्लिक फंडिंग करने वाले विद्यार्थियों की मेहनत पर सवाल कर रहे हैं उनके लिए मोनालिसा आगे बताती हैं कि कुछ स्कॉलरशिप में उम्र की सीमा लगा देने के कारण वे उनका लाभ नहीं ले सकती हैं। मोनालिसा बताती हैं कि उनके अभिभावक या समुदाय के समर्थन के मालमे में वे अकेली थीं और उन्होंने सबकुछ खुद से किया जितनी जानकारी उन्हें मिल पाई। “मेरे जैसी जनजाति के लोगों के बारे में कई लोगों को मालूम भी नहीं है कि हम इसी देश में रहते हैं। पॉलिसी स्पेस में हमें जाने के लिए एक अच्छे संस्थान से होना ज़रूरी है। कोलंबिया जाना सिर्फ मेरी शिक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि मेरे समुदाय के लिए बड़ी बात है, ये हमारा साझा संघर्ष है। ऑनलाइन वेबसाइट पर सिर्फ चीजें डाल देने हल नहीं निकल जाता। मेरे इलाके में कई बार इंटरनेट रहता ही नहीं है तो ऐसी सरकारी योजनाओं का लाभ या उसकी जानकारी हम तक कैसे आएगी। इसके लिए सरकार को राज्य सरकार द्वारा नोटिफिकेशन जारी करवाने चाहिए। मैंने TISS से पढ़ाई की है फिर भी इन जानकारियों के साथ दिक्कत का सामना कर रही हूं तो सोचिए बाकी लोगों के लिए ये कितना मुश्किल होता होगा जिनके पास ये मौके भी नहीं रहे होंगे। मेरे पास एक नौकरी थी इसलिए मैं एप्लिकेशन फॉर्म भी भर पाई। ये फॉर्म कम से कम 10 हज़ार के होते हैं। लेकिन मेरे पास मदद के लिए कुछ अपनी सेविंग्स और कुछ दोस्त थे। अपने ज़मीन पर काम करने के अनुभव से मैंने देखा है लोगों के पास शिक्षा नीतियों की बुनियादी जानकारी तक नहीं है। महिलाओं के विकास की बात इस गैप को दूर किए बिना कैसे होगी।” लोन लेकर उच्च शिक्षा में जाने वाली मुध्यधारा से कटे समुदायों की महिलाओं के बारे में वह कहती हैं, “मेरा समाज मेट्रिलिनीयल है लेकिन फिर भी मैं बताऊं तो कुछ पैसे जो मैं लोन से चुकाऊंगी उसे बिना चुकाए मैं अपनी तरह से जो काम करने के लिए ये कोर्स करना चाहती हूं वह नहीं कर सकती। मैं पारदर्शी होना चाहती हूं इसलिए मैं फंड रेज़ खत्म होने के बाद उसका लेखा-जोखा बताऊंगी।”

फंड रेज़ कर के जा रहे विद्यार्थियों के ऊपर यह दोहरा बोझ जैसा है। एक तो उन्हें सरकारी मदद नहीं मिली। दूसरी, क्राउड-फंडिंग में लोगों के साथ एक पारदर्शिता बनाये रखने में लगी मेहनत, जो समय और ऊर्जा एक नए विश्विद्यालय में उच्च शिक्षा के दौरान नया जानने समझने में खर्च किया जाना चाहिए था वो इस मामले में सरकार की असफलता के कारण इन तमाम प्रक्रियाओं में ज़ाया हो रही है। आगे के भाग में हमने गोल्डन और हर्षाली से बात की, वे दोनों इस बिंदु ठीक से प्रकाश डालती हैं।

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