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आप एक लड़की हैं और किसी भी तरह की ड्राइवर बनने की चाहत रखती हैं लेकिन आपके घरवाले, आस-पड़ोस के लोग कहते हैं कि लड़कियां ड्राइवर नहीं होती, वे ड्राइविंग नहीं कर सकती क्योंकि यह उनका काम नहीं है तब आप उनसे कहें कि सुरेखा यादव ने इस पितृसत्तात्मक समाज का यह भ्रम 1988 में ही तोड़कर रख दिया था। सुरेखा यादव आज़ाद भारत की पहली महिला ट्रेन ड्राइवर (लोको पायलट) हैं। सुरेखा यादव का जन्म 2 सितंबर 1965 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में एक किसान परिवार में हुआ था। माता का नाम सोनाबाई और पिता स्वर्गवासी रामचंद्र भोसले थे। परिवार में सबसे छोटी, पांचवें नंबर की औलाद थीं सुरेखा। सुरेखा अपने ज़िले के सेंट स्कूल से प्राइमरी की पढ़ाई करती हैं और आगे चलकर सतारा के सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करती हैं।

सुरेखा अपनी आगे पढ़ाई जारी रखना चाहती थीं इसीलिए उन्होंने अध्यापक बनने के ख्याल से गणित में पढ़ाई जारी रखते हुए बीएड की डिग्री ली। लेकिन इस बीच जब उन्हें मालूम हुआ कि इंडियन रेलवे में ड्राइवर की नौकरी के पद भरने के लिए मौका आया है तब टेक्निकल बैकग्राउंड से होते हुए और अपने ट्रेन के प्रति पैशन को जानते हुए उन्होंने नौकरी के लिए फॉर्म भरा। ये उनकी किसी भी नौकरी के लिए पहली कोशिश थी। साल 1987 में उन्होंने लिखित परीक्षा दी जिसके बाद इंटरव्यू हुआ। बोर्ड ऑफ रेलवे का इंटरव्यू उन्होंने क्रैक किया और कल्याण ट्रेनिंग स्कूल में बतौर ट्रेनी असिस्टेंट ड्राइवर के रूप में नियुक्त हुई जहां उनकी ट्रेनिंग 6 महीने चली। इसके बाद 1989 में रेगुलर असिस्टेंट ड्राइवर के रूप में काम करना शुरू किया।

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साल 1996 में सुरेखा को गुड्स ट्रेन का चालक बनाया गया। इन्होंने पहली गुड्स ट्रेन के नंबर, ‘L-50’ वाडी बुंदेर से कल्याण तक चलाई थी।

द बेटर इंडिया न्यूज़ वेबसाइट में दिए गए इंटरव्यू में सुरेखा नौकरी में चयनित होने को लेकर कहती हैं, ” यह अब तक की सबसे साधारण कहानी है जिसे आपने कभी सुना होगा। मैंने केवल इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में अपना डिप्लोमा पूरा किया था। अधिकांश अन्य छात्रों की तरह, मैं भी रोज़गार के अवसर की तलाश में थी। यह बात चारों ओर फैल गई कि भारतीय रेलवे में सहायक चालक के लिए एक रिक्त पद था और ‘किसी भी संकाय में डिप्लोमा’ करने वाला अप्लाई कर सकता है।” बताते चलें इस नौकरी के लिए आवेदन करने वाली सुरेखा अकेली महिला थीं, जिन्होंने आवेदन भी किया, लिखित परीक्षा भी दी और इंटरव्यू भी क्रैक किया। 

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साल 1996 में सुरेखा को गुड्स ट्रेन का चालक बनाया गया। इन्होंने पहली गुड्स ट्रेन के नंबर, ‘L-50’ वाडी बुंदेर से कल्याण तक चलाई थी। काम में नयी होने के कारण इन्हें अधिकतर ट्रेन के इंजन की स्थिति देखना, सिग्नल चेक करना और अन्य ऐसे ही काम दिए जाते थे। सुरेखा पूरी तरह से गुड्स ट्रेन ड्राइवर साल 1998 में बनी थीं। वेबसाइट मी मुंबई से बात करते हुए कहती हैं, “पुरुष राफेल उड़ाते हैं, महिला चालक दल एआई बोइंग को अमेरिका ले जाती है। हम जो करते हैं उसमें भी सम्मान है। वास्तव में, शुरुआती दिनों में महिलाओं को 30-40 किमी से अधिक लंबी यात्रा नहीं सौंपी जाती थी। यह अब बदल गया है, हालांकि हमने आज के समय के लिए बहुत पहले से अभ्यास शुरू किया था।”

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अप्रैल 2000 में रेल मंत्री ममता बनर्जी ने ‘लेडीज़ स्पेशल’ लोकल ट्रेन की शुरुआत की थी तब सुरेखा यादव ही उस स्पेशल लोकल ट्रेन की पहली मोटर ड्राइवर नियुक्त हुई थीं। इसके अलावा 2011 में जब उनका प्रोमोशन एक्सप्रेस मेल ड्राइवर के रूप में हुआ तबसे वह ड्राइवर्स ट्रेनिंग सेंटर में बतौर सीनियर इंस्ट्रक्टर पढ़ा भी रही हैं।सुरेखा यादव के लिए उनके करियर में सबसे सुनहरा मौका तब आया जब उन्हें 8 मार्च 2011 को विश्व महिला दिवस पर एशिया की पहली ट्रेन ड्राइवर घोषित किया गया जिसने डेक्कन क्वीन ट्रेन को पुणे से सीएसटी तक दौड़ाया जो कि सबसे कठिनतम रेलवे रास्ता है। सुरेखा यादव वक़्त वक़्त पर चुनौतियों को हराती रहीं। चेन पुलिंग, आंदोलनों के समय चक्का जाम, ट्रेन के रास्ते में अचानक से किसी जानवर या इंसान का ट्रैक पर आ जाना जैसी परिस्थिति को बखूबी संभाला। उन का अब तक का रिकॉर्ड है कि उन्होंने जो भी, जहां भी ट्रेन चलाई एक भी मौत उनके ट्रैक पर, उनकी ट्रेन द्वारा नहीं हुई। 

पहला कदम जो सुरेखा यादव ने उठाया उससे प्रेरणा लेते हुए आज दो सौ से ज़्यादा महिला लोको पायलट देश में है। हालांकि ये आंकड़ा अभी भी इस क्षेत्र में एक बड़ा जेंडर गैप है। सुरेखा यादव को सेंट्रल रेलवे ने 2013 में आरडब्लयूसीसी बेस्ट फीमेल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया था। इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च 2021 को सुरेखा यादव ने मुंबई से लखनऊ पूर्ण रूप में महिला स्टाफ के साथ ट्रेन चलाई जिसका मकसद रेलवे में महिलाओं के सशक्तिकरण पर ज़ोर देना था।

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तस्वीर साभार : Wikimedia Commons

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