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भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर का असर कम होने के साथ ही तीसरी लहर की आशंका भी जताई जा रही है। एक तरफ़ वैक्सीन लगवाने का दौर तो चल रहा है लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ कोरोना का संक्रमण अभी भी ज़ारी है। कोरोना की शुरुआती लहर से बचाव के लिए बाज़ार, दुकान और लोगों की आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित हुई है, जिससे अधिकतर परिवारों का बजट बिगड़ने लगा है। ऐसे में कोरोना की तीसरी लहर की खबरें अभी से ही गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों की नींद उड़ाने लगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी तक लोग वैक्सीन से जुड़ी भ्रांतियों और अफ़वाहों से जूझ रहे थे, ऐसे में तीसरी लहर को लेकर नयी-नयी अफ़वाहों का दौर ज़ारी है। कोई कह रहा है कि तीसरी लहर का प्रभाव बच्चों पर होगा तो कोई कह कह रहा है कि तीसरी लहर में लॉकडाउन ही एकमात्र विकल्प होगा। ऐसी अलग-अलग अफ़वाहें गांव में सुनने को मिल रही हैं पर गरीब परिवारों के कानों में इसका सिर्फ़ एक मतलब पहुंच रहा है वह यह कि उनके रोज़गार का और भी जयदा बुरा असर होगा और परिवार को भयानक आर्थिक संकट झेलना पड़ेगा। इन अफ़वाहों का प्रभाव सिर्फ़ बातों तक ही नहीं परिवारों में भी दिखाई पड़ने लगा है, ख़ासकर महिलाओं की जिंदगियों पर।

शादी ही एकमात्र उपाय क्यों

पूनम (बदला हुआ नाम) तब उन्नीस साल की थी जब कोरोना की शुरुआत हुई। लॉकडाउन के दौर से ही उसकी पढ़ाई छूट गई। दलित मज़दूर परिवार की पूनम का स्कूल जैसे ही बंद हुआ, घर के काम का बोझ ऐसा बढ़ा की बंद किताबों को पलटने का मौक़ा ही नहीं। रिज़ल्ट में तो पूनम पास हो गई, लेकिन वास्तव में उसकी पढ़ाई पूरी तरीक़े से रुक गई। जब लॉकडाउन में प्रवासी मज़दूर घर लौटे तो उसी दौरान पूनम के घरवालों ने उसकी शादी के लिए लड़का पसंद कर लिया। तब पूनम ने इनकार किया और कहा कि वह पढ़ना चाहती है लेकिन परिवारवालों ने ये कहकर उसकी बात टाल दी कि ‘अरे अभी कौन-सी शादी कर रहे है।‘ दो साल बीतने को है, न स्कूल खुला और न पूनम की पढ़ाई के अवसर बन पाए। आख़िरकार बीती पंद्रह जुलाई को पूनम की शादी कर दी गई। पूनम अपने परिवार की पहली लड़की थी, जिसने बारहवीं तक पढ़ाई की।

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यूनिसेफ़ की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक़, कोविड के चलते अगले एक दशक में एक करोड़ लड़कियों को कम उम्र में या कहें उनका बाल विवाह हो सकता है। यूनिसेफ़ के मुताबिक़, कोरोना संक्रमण के आने से पहले यह अनुमान लगाया गया था कि अगले दस साल में करीब 10 करोड़ शादियां कम उम्र वाले लड़के-लड़कियों की हो सकती हैं। कोरोना संक्रमण आने के बाद ऐसी शादियों की संख्या में 10 प्रतिशत यानि एक करोड़ की बढ़ोत्तरी होने की आशंका है। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया भर में स्कूलों के बंद होने से, आर्थिक सुस्ती और परिवार और बच्चों की सहायता सेवाओं में कमी के चलते 2030 तक क़ानूनी रूप से बालिग़ होने से पहले एक करोड़ लड़कियों की शादी हो जाएगी।

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गांव में जब एक लड़की पढ़ती है, आगे बढ़ती है तो न केवल उसके बल्कि आसपास के कई लड़कियों के लिए पढ़ने और आगे बढ़ने के अवसर खुल जाते हैं लेकिन किसी भी वजह से जब लड़की की शिक्षा बाधित होती है या उसकी जल्दी शादी होती है तो ये आसपास की लड़कियों की ज़िंदगी भी सीधे तौर पर प्रभावित करती है।

पूनम अपनी शादी के समय बीस साल से अधिक उम्र की थी, इसलिए आंकड़ों में उसकी शादी बाल विवाह के दायरे में नहीं आएगी। लेकिन वह देश जहां आज भी महिलाओं की शिक्षा, अवसर और उनके अधिकारों की सुरक्षा एक बड़ा सवाल है, वहां पूनम जैसी लड़कियों की पढ़ाई छूटना आने वाले समय में महिलाओं की गंभीर सामाजिक स्थिति की तरफ़ ईशारा करता है। गांव में जब एक लड़की पढ़ती है, आगे बढ़ती है तो न केवल उसके बल्कि आसपास के कई लड़कियों के लिए पढ़ने और आगे बढ़ने के अवसर खुल जाते हैं लेकिन किसी भी वजह से जब लड़की की शिक्षा बाधित होती है या उसकी जल्दी शादी होती है तो ये आसपास की लड़कियों की ज़िंदगी भी सीधे तौर पर प्रभावित करती है। पूनम दलित समुदाय से है, जहां आज भी लड़कियों की शिक्षा सपना मात्र है। ऐसे में मज़दूर परिवार जब अपनी मज़दूरी के पैसे में बचत करके लड़की की शादी की बजाय उसकी शिक्षा का चुन रहा हो और इसी बीच आर्थिक संकट की वजह से उसे लड़की की शादी करनी पड़े तो ये न केवल उस परिवार को बल्कि मज़दूर दलित परिवार की तमाम लड़कियों के लिए विकल्प का उदाहरण बन जाता है।

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ये हमारे समाज की विडंबना कहें या दुर्भाग्य, अधिकतर सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं का हल हमें शादी में ही नज़र आता है। महिला हिंसा के केस बढ़ते हैं तो कहा जाता है, “शादी करवा दो, ज़माना ख़राब है।” आर्थिक तंगी हो तो कहते हैं कि शादी करके छुट्टी पा लो। यह हमेशा से हमारे समाज का चलन रहा है, पर अब कोरोना महामारी ने इस चलन को अपने नाम कर लिया है। कोरोना संक्रमण से बहुत ज़्यादा संख्या में लोगों की जानें गई, जो इस महामारी का प्रत्यक्ष प्रभाव देखने को मिल रहा है। वहीं, अप्रत्यक्ष रूप से लगातार महिलाओं की शिक्षा और उनके विकास के अवसर प्रभावित हो रहे है।

कोरोना, ग्रामीण महिलाएं और उनका स्वास्थ्य

ऐसा नहीं है कि कोरोना महामारी ने केवल महिलाओं की शिक्षा, रोज़गार और उनकी सामाजिक प्रस्थिति को प्रभावित किया है, बल्कि इस दौरान महिलाओं में कुपोषण का स्तर भी बढ़ा है। ऑक्सफैम संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में हर मिनट कम से कम 11 लोग भूख और कुपोषण से मर रहे हैं और यह दर कोविड-19 की वर्तमान वैश्विक मृत्यु दर यानी प्रति मिनट सात लोगों की मृत्यु से भी अधिक है। वहीं, दूसरी तरफ़ साल 2019 में संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम ने उत्तर प्रदेश के दो जिलों के घरों में भोजन वितरण और खपत को नियंत्रित करने वाले मानदंडो और प्रथाओं का अध्ययन किया जो घर के सदस्यों, विशेषकर महिलाओं और लड़कियों के खाने को प्रभावित करते हैं। इस अध्ययन में यह पाया गया कि हर पांचवीं महिला ने आर्थिक तंगी के कारण पिछले तीस दिनों से कम खाना खाना खाया है। हमारे देश में पोषण के स्तर पर महिलाओं की स्थिति पहले से ही चिंताजनक रही है। ऐसे में कोरोना महामारी के दौर में महिलाओं में कुपोषण की बढ़ती समस्या न केवल उन्हें बल्कि पूरी आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को भी सीधे तौर पर प्रभावित करेगी।

कुपोषण के साथ-साथ कोरोना महामारी के दौरान अनचाहे गर्भ की समस्याएं भी महिलाओं में काफ़ी ज़्यादा बढ़ी है। गांव में महिलाओं के साथ काम करते हुए हमलोग लगातार इस समस्या को देख रहे है। इस संदर्भ में आईपास डेवेलपमेंट फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ लॉकडाउन के तीन महीनों (25 मार्च से 24 जून) के दौरान 18 लाख 50 हज़ार महिलाओं ने असुरक्षित गर्भसमापन कराया या अनचाहा गर्भ हुआ। लेकिन जब हम लोग ग्रामीण क्षेत्रों की बात करते हैं तो अभी भी यहां सुरक्षित गर्भसमापन के लिए केंद्रों का अभाव है। ऐसे में कभी-कभी महिलाएं दवाई की दुकानों से ख़ुद दवाई लेकर इनका सेवन करती हैं जिससे अक्सर उन्हें शारीरिक समस्याओं से जूझना पड़ता है। लेकिन ज़्यादातर महिलाओं को अपने अनचाहे गर्भ को ज़ारी रखना पड़ता है, क्योंकि शादीशुदा महिलाओं के लिए भी गर्भसमापन करवाना एक चुनौती है।

महिलाओं के जीवन, पोषण और स्वास्थ्य से जुड़ी ये कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिसने दबे पांव महिलाओं के जीवन को प्रभावित किया है। ये प्रभाव इतना ज़्यादा रहा है कि इसने महिलाओं को सीधे से सालों पीछे कर दिया है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि कोरोना महामारी के दौर में महिलाओं की स्थिति को किए जाने वाले ज़्यादातर सर्वे सिर्फ़ महिलाओं की बात कर रहे हैं, लेकिन जब हम शहरी, ग्रामीण, ऊंची जाति, निचली जाति, आर्थिक रूप से कमज़ोर और मज़बूत जैसी तमाम परतों के आधार पर बक़ायदा सर्वेक्षण करेंगें तब हमें इस चुनौतियों का भयानक रूप देखने को मिलेगा, क्योंकि महिलाओं की जाति, धर्म, वर्ग और प्रस्थिति जैसी तमाम परतें उनके साथ होने वाली हिंसा और पिछड़ेपन को कई गुना बढ़ाने का काम करती हैं। वैसे तो हमारी सरकारें कोरोना की तीसरी लहर की तैयारी में वैक्सीन के अभियान में जुटी है, लेकिन लगातार पीछे जाती हुई महिलाओं को भी साथ लेकर चलने और उनके अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों को अगर तैयारी की योजनाओं में शामिल नहीं किया गया तो ऐसा न हो कि इस महामारी के बाद महिलाओं की निम्न प्रस्थिति एक बड़ी समस्या बन जाए।

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तस्वीर साभार : मुहीम फेसबुक पेज

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