FII is now on Telegram

आज भले चुनिंदा संसद में महिला मंत्रियों, सांसदों, विधानसभा में महिला विधायकों को देखकर यह अंदाज़ा लगाया जा रहा हो कि देश में महिलाओं का सशक्तिकरण हो चुका है। लेकिन आज भी महिलाओं का राजनीति में नेतृत्व और भागीदारी में मामूली योगदान है। हमेशा से स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर तक महिलाओं का नेतृत्व और राजनीतिक भागीदारी प्रतिबंधित रही है। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अधिकार होने, भाग लेने और अपनी क्षमताओं के बावजूद उन्हें राजनीतिक भागीदारी से वंचित रखा जाता है। बात भारत की राजनीतिक परिदृश्य की करें तो, साल 1963 से देश में केवल 16 महिलाएं मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। देश आजतक केवल एक महिला प्रधानमंत्री के शासन अधीन रहा है। महिलाओं को राजनीति में सफल रूप से भागीदारी न करने देने का कारण सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर तक जाता है। भारतीय राजनीति की बागडोर हमेशा से पुरुषों के हाथों में रही है। पितृसत्तात्मक समाज में महिला राजनीतिज्ञ को सुचारू रूप से लोगों के बीच अपना स्थान बनाने लिए भी किसी पुरुष ‘गॉडफादर’ की ज़रूरत होती है। घरेलू दायरे तक सीमित महिलाओं को अपने राजनेता के रूप में अपनाना अक्सर हमारे पितृसत्तात्मक समाज को मंजूर नहीं होता।

देश की आबादी में आधा हिस्सेदारी होने के बावजूद पीछे छूटती महिलाएं अपनी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को बयान करती हैं। हालांकि महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के मामले में साल 2021 की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट अनुसार भारत 155 देशों में 51वें पायदान पर है लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि भारत उन देशों में से एक है जहां साल 2019 की तुलना में महिला मंत्रियों की हिस्सेदारी में भारी कमी हुई। साल 2019 की 23.1 फ़ीसद की तुलना में साल 2021 में देश में महिला मंत्रियों की भागीदारी महज 9.1 फ़ीसद रही। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के अनुसार भारतीय संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी 14.4 फ़ीसद पर स्थिर है। साथ ही पिछले 50 वर्षों में किसी महिला का राज्य का मुखिया बने रहने का दर महज 15.5 फीसद है।

और पढ़ें: के.के शैलजा के बहाने वामपंथ में निहित पितृसत्त्ता की बात

साल 1952 से 2014 तक भारत में महिलाओं की चुनावों में भागीदारी लगभग 7 फ़ीसद से बढ़कर आज 11.2 फीसद हुई है जो विश्व के औसत से नीचे है। देश की महिला मतदाताओं की संख्या की बात करें, तो साल 1962 से अब तक कोई असाधारण बढ़त नहीं हुई है। साल दर साल महिलाओं का नेता के रूप में प्रभावशील और प्रदेश के विकास के साथ उनका सकारात्मक जुड़ाव अब साबित हो चुका है। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है इसके बावजूद बीते दिनों पांच राज्यों के चुनावों में सभी उम्मीदवारों में महिलाओं की भागीदारी केवल 10.4 फीसद रही। वहीं विधानसभा के सभी सदस्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी 8.5 फ़ीसद रही। हमेशा से भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता पश्चिम बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य है जहां 90 के दशक के बाद से महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ा है। वहीं, केरल के विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व दर सबसे कम है।

Become an FII Member

बात भारत की राजनीतिक परिदृश्य की करें तो, साल 1963 से देश में केवल 16 महिलाएं मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। देश आजतक केवल एक महिला प्रधानमंत्री के शासन अधीन रहा है।

हालांकि पंचायतों में आज भी महिलाओं के बदले उनके पुरुष साथी या रिश्तेदार उम्मीदवारी निभाते हैं। लेकिन अधिकांश अध्ययनों से पता चलता है कि स्थानीय सरकार में महिलाएं, महिलाओं की जरूरतों और हितों जैसे पानी, पोषण या बच्चों की शिक्षा को संबोधित करने पर विशेष ध्यान देती हैं। उदाहरण के तौर पर, भारत में पंचायतों पर किए गए एक शोध अनुसार महिलाओं के नेतृत्व वाले परिषदों में पेयजल परियोजनाओं की संख्या पुरुषों के नेतृत्व वाले परिषदों की तुलना में 62 प्रतिशत अधिक थी।

द हिंदू बिज़नस लाइन में छपी गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स अँड इक्नोमिक्स की एक रिपोर्ट के अनुसार 86 प्रतिशत महिलाएं पंचायत और जिला परिषद के चुनावों में सीट किसी महिला उम्मीदवार के लिए आरक्षित होने के वजह से खड़ी होती हैं। सर्वेक्षण में शामिल अधिकतर महिलाओं ने किसी राजनीतिक परिवार से संबंध रखने की बात बताई। दुर्भाग्यवश ज़्यादातर महिलाओं में अपना कार्यकाल पूरा होने पर, वापस चुनावों में हिस्सा न लेने का चलन पाया गया। निश्चित तौर पर राजनीति में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं का संसद में प्रवेश के लिए आरक्षण एक महत्वपूर्ण उपाय है, लेकिन संसाधनों तक पहुंच और समान अवसर के मामले में लैंगिक समानता अभी भी कोसो दूर है। पहले से हाशिए पर जी रही महिलाओं के लिए कई बाधाएं जैसे शिक्षा की कमी, कम या अपर्याप्त आय, जीवनसाथी का असहयोग, संसाधनों तक पहुँच, घरेलू जिम्मेदारियों के कारण चुनावी गतिविधियों के लिए समय की कमी, सार्वजनिक कार्यालयों में महिलाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण या राजनीतिक जीवन में शामिल होने की प्रशिक्षण में कमी उन्हें राजनीति में प्रवेश करने से बाधित करती है। यह उनकी शासन अवधि में अपनी भूमिकाओं को पूरा करने और दोबारा चुनाव लड़ने के अवसर को सीमित करती है। चूंकि राजनीतिक जीवन ससाधनों तक पहुँच, आर्थिक क्षमता, समय और एक्स्पोसर जैसे कई कारकों की मांग करता है, साधारणतः महिलाओं का इससे जुड़ना और भी कठिन हो जाता है।

और पढ़ें : राजनीति और महिला नेताओं के ख़िलाफ़ सेक्सिज़म का नाता गहरा है

पितृसत्तात्मक समाज में अधिकांश पुरुषों को खुद से कामयाब महिलाएं खटकती हैं। ख़ासतौर पर तब जब राजनीतिक दुनिया में सदियों से पुरुषों का ही दबदबा रहा है।

यूएन वुमेन और इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वुमेन द्वारा भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के अवसर और चुनौतियों पर देश के तीन राज्यों के अलग-अलग जिलों पर एक अध्ययन किया गया। अध्ययन के विषय में लैंगिक असमानता, पुरुष वर्चस्व और महिलाओं पर नियंत्रण का सबसे व्यापक माध्यम ‘घरेलू हिंसा’ को भी मद्देनजर रखा गया। इस अध्ययन के अनुसार महिलाओं का राजनीति में नेतृत्व या भागीदारी न होने का एक अहम कारण घरेलू हिंसा पाया गया। सदियों से भारतीय राजनीति में पितृसत्ता, जाति और नस्ल अपनी जड़ें बनाए हुई है। भारत की मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री रह चुकी लगभग सभी महिलाएं उच्च जाति, सम्पन्न आर्थिक स्थिति और सभी संसाधनों तक पहुंच रखती थीं। जाति या नस्ल पितृसत्ता के पोषक के तरह काम करती है और इसलिए ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज को किसी दलित-बहुजन जाति या हाशिए पर रह रही महिला के शासनाधीन रहना स्वीकार नहीं।

पितृसत्तात्मक समाज में अधिकांश पुरुषों को खुद से कामयाब महिलाएं खटकती हैं। ख़ासतौर पर तब जब राजनीतिक दुनिया में सदियों से पुरुषों का ही दबदबा रहा है। ऐसे में आगे निकलती महिलाओं को नीचा दिखाना, उनके कपड़े, बोलचाल का अंदाज, शिक्षा, बच्चों की संख्या, उनके निजी जीवन जीने के ढंग पर सवाल खड़ा करना और उनके चरित्र पर लांछन लगाना सबसे आसान तरीका है। महिला राजनीतिज्ञों को आए दिन सोश्ल मीडिया और विपक्षी पार्टियों द्वारा अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। आम आदमी पार्टी की आतिशी मार्लेना के नाम पर बाटें गए पर्चे या पिछले दिनों पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार ममता बनर्जी के लिए विपक्षी पार्टियों द्वारा सेक्सिस्ट बयानों का इस्तेमाल, इस मानसिकता और देश में महिला राजनीतिज्ञों की स्थिति को दर्शाती है।

दलित, बहुजन, मुस्लिम और आदिवासी महिलाएं ऐसे बयानों का और भी अधिक सामना करती हैं। अक्सर उनकी जाति, उनकी शिक्षा, रंग-रूप सभी पर भद्दी और अश्लील बातें कही जाती हैं। ब्राह्मणवादी समाज में बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी राबड़ी देवी को आज तक उनके बच्चों की संख्या या बोलचाल के तरीके के कारण निशाना बनाया जाता है। बहुजन समाज पार्टी की नेता और चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती को न सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा न जानने के लिए बल्कि उनकी कदकाठी, रंग और जाति के लिए ट्रोल किया जाता रहा है। हालांकि भारतीय राजनीति में अशिक्षित, एकल, पत्नी से अलग हुए या अधिक बच्चों वाले पुरुष अपना स्थान बनाए हुए हैं लेकिन पितृसत्तात्मक समाज उनके चरित्र, निजी जीवन या उम्मीदवारी पर सवाल नहीं खड़ा करता।

हाल में बीजेपी सरकार की केंद्रीय परिषद में मंत्रियों की फेरबदल की बात करें, तो यह महामारी से त्रस्त जनता और आर्थिक मंदी से लोगों का ध्यान भटकाने का सरकार का एक प्रयास था। विधानसभाओं और संसद में महिला आरक्षण के वादे पर सत्ता में रहे विभिन्न दलों की चुप्पी, महिलाओं की चुनावी भागीदारी में बढ़ती संख्या के प्रति इन दलों की लापरवाह रवैया दर्शाती है। कैबिनेट में स्मृति ईरानी और निर्मला सीतारमण जैसी सशक्त राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली ग्यारह अन्य महिला नेताओं को जगह दी गई लेकिन इन दो महिलाओं के अलावा किन्हीं और महिला को केन्द्रीय मंत्री का पद नहीं दिया गया। यानि महिलाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद आज भी वास्तविक निर्णय लेने की प्रक्रिया पुरुषों के हाथ रहेगी। साथ ही यह संख्या पिछली कैबिनेट की तुलना में कम है। दूसरे देशों के औसत 23 प्रतिशत के तुलना में कैबिनेट में आज भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल 7 प्रतिशत है। सुल्ली डील्स, हाथरस कांड या खुद बीजेपी नेताओं द्वारा महिला विरोधी बयानों पर महिला मंत्रियों की चुप्पी उसी विचारधारा का समर्थन करती है जो पितृसत्ता को बढ़ावा देती है। इसलिए अधिवक्ता और समाज सेवी रह चुकी मीनाक्षी लेखी जैसी नेता से रूढ़िवादी और दक़ियानूसी बयान कोई आश्चर्य की बात नहीं। बहरहाल, एक समस्याग्रस्त, दमनकारी शासन में केवल महिलाओं का प्रतिनिधित्व सरकार को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक या महिलाओं का हितैषी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।

और पढ़ें : पंचायत चुनावों में बात जाति और जेंडर पॉलिटिक्स की


तस्वीर साभार : Reuters/Nita Bhalla

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply