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पूरी दुनिया की सामाजिक संरचना में एक समानता है वह है महिलाओं का शोषण। पितृसत्तात्मक सोच दुनिया के हर हिस्से पर महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करती है। महिलाओं की यौनिकता को लेकर उन पर बर्बरता की जाती है। तमाम आधुनिक तकनीक, विचार और लोकतांत्रिक प्रकियाओं के बावजूद महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। महिला को महज उसकी यौनिकता और एक उपभोग तक ही सीमित रखने की रवायतें आज भी जारी है। परंपरा और नियम-कायदों की कैद में रखकर सदियों से महिलाओं के अस्तित्व को नकारा जा रहा है। एक समान अवसर के लिए पुरुषों के लिए अलग पैमाने और महिलाों के लिए अलग पैमाना बनाकर उन्हें आगे बढ़ने से रोका जा रहा है। ऐसी ही एक बाधा को तोड़ने के लिए इंडोनेशियाई सेना ने फैसला लिया है जिसमे वहां की सेना में भर्ती होने की इच्छुक महिलाओं के साथ होने वाले एक क्रूर भेदभाव को खत्म करने का एलान किया गया है।

इंडोनेशिया में महिलाओं की सेना में भर्ती से पहले उनका कौमार्य परीक्षण यानि वर्जिनिटी टेस्ट किया जाता था। महिलाओं के कौमार्य की जांच के लिए विवादस्पद ‘टू फिंगर टेस्ट’ पर अब रोक लगाने का एलान किया गया है। इंडोनेशियाई सेना प्रमुख जनरल एंडिका पर्कासा ने एक सम्मेलन में इस बात की जानकारी दी है। उन्होंने कहा है कि दशकों से चले आ रहे इस नियम को अब खत्म करने का समय आ गया है। महिलाओं की भर्ती प्रक्रिया भी पुरुष अभ्यर्थियों की तरह ही समान शर्तों पर होगी। भर्ती की प्रक्रिया में महिला कैडेट्स का वर्जिनिटी टेस्ट होना लैंगिक भेदभाव के रवैये को दिखाता है। महिला आवेदकों का कौमार्य बरकरार है या नहीं इसको जांचने के लिए टू फिंगर टेस्ट इंडोनेशियाई सेना की सभी शाखाओं में किया जाता रहा है। द गार्डियन के मुताबिक जनरल पर्कासा से जब यह पूछा गया कि क्या इंडोनेशियन नेवी और एयर फोर्स भी इस फैसले का अनुसरण करेंगी तो उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। कई मानवाधिकार संगठनों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है।

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वर्जिनिटी टेस्ट का स्वास्थ्य पर असर

वर्जिनिटी टेस्ट लिंग आधारित एक हिंसा है। यह एक व्यापक रूप से प्रचलित कुप्रथा है। महिलाओं की यौन स्वतंत्रता को खत्म करने वाली यह प्रथा दर्दनाक और अपमानजनक भी है। साल 2018 में संयुक्त राष्ट्र एंजेसियां विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूएन वुमन और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे लैंगिक हिंसा करार दिया। इसे चिकित्सकीय रूप से अनावश्यक, पीड़ादायक और अपमानजनक बताकर विश्व स्तर पर हमेशा के लिए खत्म करने को कहा। सरकारों को ऐसे कानून बनाने और लागू करने के लिए कहा गया जो वर्जिनिटी परीक्षण पर प्रतिबंध लगाते है। विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे अवैज्ञानिक घोषित कर चुका है। ऐसे परीक्षण को न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया है, बल्कि यौन हिंसा के मूल कृत्य की नकल और दोहराव भी कहा है।

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पितृसत्ता के अनुसार एक महिला के पास उसकी कोई यौन स्वतंत्रता नहीं होती है। इस पर केवल पुरुष का ही हक होता है। सदियों से महिला के हायमन की स्थिति को जांच-परखकर उसकी पवित्रता को सिद्ध कर पुरुष अंहकार को बढ़ाया जा रहा है।

वर्जिनिटी टेस्ट के दवाब के कारण महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इस कारण महिलाएं मानसिक, शारीरिक परेशानी के अलावा सामाजिक तिरस्कार तक का भी सामना करती हैं। ऐसी परिस्थितियों में वह चिंता, तनाव और अवसाद जैसी परेशानियों से गुजरती हैं। बहुत सारी विषम परिस्थितियों में महिलाएं या लड़कियां सम्मान के नाम पर आत्महत्या तक का कदम उठा लेती हैं। इस तरह की गैर-ज़रूरी चिकित्सीय जांच मानवाधिकारों और मूल अधिकारों का उल्लघंन करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्जिनिटी टेस्ट को चिकित्सकीय अनावश्यक और हानिकारक बताते हुए अधिकारों को खत्म करना बताया है। साथ ही चिकित्सा प्रणाली के मूल उद्देश्य ‘किसी को नुकसान नहीं’ पहुंचाने का उल्लघंन तक कहा है। वर्जिनिटी टेस्ट किसी भी स्थिति में न करने की सलाह देते हुए इसे जल्द से जल्द बंद करने के लिए भी कहा गया।

वास्तव में हायमन का क्या है उद्देश्य

हायमन योनि में प्रवेश द्वार को कवर करने वाली एक पतली सी झिल्ली है। यह बाहरी और आंतरिक जननांग अंगों के बीच एक सीमा की भूमिका निभाता है। साधारण शब्दों में कहे तो हायमन एक प्रकार का अवरोध है, जो संक्रमण को सीधे महिलाओं के शरीर में प्रवेश करने से रोकता है। डॉक्टरों के अनुसार यह आवश्यक नहीं है कि मेंबरेन केवल सेक्स के दौरान ही डैमेज होता है। कई बार यह एथलीट लड़कियों द्वारा खेल के अभ्यास के दौरान, साइकिल चलाने और दूसरी शारीरिक गतिविधियों के दौरान भी हायमन टूट सकता है। वैज्ञानिक तर्क के बावजूद भी दुनिया के समाज में महिला की यौनिकता को लेकर बहुत मिथ गढ़े गए हैं जिस कारण महिलाओं में ‘हायमनोप्लास्टी’ का चलन लगातार बढ़ रहा है। 

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महिला की यौनिकता पर क्यों है सबकी नज़र

महिला की शुद्धता, अग्निपरीक्षा जैसी रवायतें पूरी दुनिया में फैली हुई हैं। पितृसत्ता के अनुसार एक महिला के पास उसकी कोई यौन स्वतंत्रता नहीं होती है। इस पर केवल पुरुष का ही हक होता है। सदियों से महिला के हायमन की स्थिति को जांच-परखकर उसकी पवित्रता को सिद्ध कर पुरुष अंहकार को बढ़ाया जा रहा है। दुनिया के 20 से अधिक देशों में यह कुप्रथा किसी न किसी तरह मौजूद है। न केवल एशिया और अफ्रीका में यह कुरीति व्यापत है बल्कि अमेरिका तक में वर्जिनिटी टेस्ट और सर्जरी को महत्व देने वाली खबरें सामने आती है। द गार्डियन की एक खबर के मुताबिक बीते साल यानि 2020 तक अमेरिका के कुछ हिस्सों में कानूनी तौर पर वर्जिनिटी टेस्ट वैध है। अमेरिका में इस प्रक्रिया को गैरकानूनी घोषित करने वाला कोई संघीय और राज्य कानून नहीं है। अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, मिस्त्र, इंडोनेशिया, इराक, मोरक्को, फिलीपींस, टर्की और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में पिछले कुछ सालों में ही टू फिंगर टेस्ट पर रोक लगी है। इसके अलावा आज भी वहां किसी प्रथा के चलते महिला पर वर्जिनिटी साबित करने का दबाव है।

महिला की शारीरिक रचना और उसकी स्वायत्तता को किसी भी स्थिति में जांचना या परखना उसके अधिकारों का उल्लघंन है। एक महिला भी उतनी ही यौन स्वतंत्रता की हकदार है जितना कि एक पुरुष है।

साल 2020 में ही पाकिस्तान के लाहौर उच्च न्यायालय ने टू फिंगर टेस्ट को अवैध और असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट ने इसे यौन हिंसा सर्वाइवर पर ही शक करने की मंशा वाली प्रक्रिया बताकर खारिज किया। भारत में साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने टू फिंगर टेस्ट को निजता का उल्लघंन करार दिया था। वहीं, इसे रेप सर्वाइवर के अधिकारों का हनन और उन्हें मानसिक पीड़ा देने वाला कहा था। अदालत ने कहा था कि सरकार को इस तरह की जांच को खत्म कर कोई अन्य तरीका अपनाना चाहिए। बावजूद इसके देश के कई राज्य राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी महाराष्ट्र के कंजरभाट समुदाय में नई दुल्हन के पवित्र होने की प्रथा पंचायतों के माध्यम से होती है। अदालत के इस फैसले के बाद मेडिकल पाठ्यक्रम से भी इस टेस्ट को हटाने के लिए कहा गया। साल 2019 में महाराष्ट्र में सबसे पहले चिकित्सा शिक्षा बोर्ड ने आपत्तियों और सुझावों के संज्ञान के बाद एमबीबीएस के पाठ्यक्रम से वर्जिनिटी टेस्ट को हटाया गया।

महिलाओं के हित में यह फैसला

तमाम शोध और मानवाधिकार संगठन अपनी रिपोर्टों में इस बात की तस्दीक कर चुके हैं कि टू फिंगर टेस्ट व वर्जिनिटी जैसे विचार केवल लैंगिक असमानता को मजबूत करने का काम करते हैं। महिला की शारीरिक रचना और उसकी स्वायत्तता को किसी भी स्थिति में जांचना या परखना उसके अधिकारों का उल्लघंन है। एक महिला भी उतनी ही यौन स्वतंत्रता की हकदार है जितना कि एक पुरुष है। महिला की यौनिकता को लेकर समाज में जो सोच है उसको खत्म करके हुए चरित्र को जांच-परखने वाले ऐसे नियम के खत्म होने से ही स्थिति में बदलाव लाया जा सकता है। महिला के शरीर को उसकी पवित्रता से जोड़ने वाली सामाजिक सोच के ढांचे को खत्म करने के लिए एक ओर इस तरह के नियम और जांच को खत्म करना होगा। साथ ही महिला की स्वायत्ता को धरातल पर वास्तविक रूप से स्थापित करना होगा।

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तस्वीर साभार : BBC

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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