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जैसे- जैसे समय बदला है, समाज में स्त्री की स्थिति भी बदली है। उसने काफी कुछ हासिल किया है। स्त्री ने अपना दायरा घर-परिवार से बाहर अलग-अलग क्षेत्रों में फैलाया है और अपना प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया है। आज एक तरफ तो हम भले ही स्त्रियों की इस प्रगति पर अपनी पीठ थपथपा लें लेकिन दूसरी तरफ आज भी समाज का एक ऐसा धड़ा, या यूं कहूँ कि तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों का एक ऐसा वर्ग भी है जिससे स्त्रियों की यह प्रगति पचाए नहीं पचती। उनके अनुसार आज स्त्रियां अगर समाज में अपनी पहचान बनी रही हैं, वे बिना पुरुषों की ‘कृपा’ के संभव नहीं हो सकता। उनके मुताबिक एक स्त्री बिना पुरुष के कुछ भी नहीं है और अगर एक स्त्री लेखिका और पत्रकार है तो उसके लिए अपनी पहचान हासिल करना और भी मुश्किल हो जाता है।

ऐसा ही एक वाकया मैं यहां साझा करना चाहूंगी। एक बार मैं ऑफिस में एक महिला पत्रकार के आर्टिकल्स पढ़ रही थी और अपने एक कलीग से उनके लेखन की तारीफ करने लगी। मैं उससे अपेक्षा कर रही थी कि वह भी उनकी तारीफ करेंगे लेकिन उन्होंने कहा, ‘पता है तुम्हें, उनके पति जो कि एक लेखक हैं, उनके आर्टिकल एडिट करते हैं। तब जाकर वे इतने अच्छे होते हैं।’ जरा सोचिए जब वे ही लोग, जो प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ाई करते हैं, खुद को प्रोग्रेसिव सोच वाला पत्रकार/लेखक बताते हैं, जब उनकी सोच ऐसी घटिया हो सकती है तो अन्य लोगों के बारे में तो क्या ही कहें। यह कहकर लोग कितनी आसानी से एक महिला के संघर्ष और उसकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं। पितृसत्ता ने महिला- पुरुष के अस्तित्व को बांट कर अलग-अलग स्तरों पर इस तरीके से फिट कर दिए हैं कि व्यवहार में उन्हें हम इतनी आसानी से उपयोग कर ले जाते हैं कि स्त्रीद्वेष से पीड़ित होने का एहसास ही नहीं हो पाता।

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बुद्धिमत्ता को पुरुष के साथ और मूर्खता को एक स्त्री के साथ इस प्रकार से जोड़ दिया गया कि दोनों चाहे एक ही बात क्यों न लिख रहे हो, लेकिन महत्ता पुरुष के लिखे को दी जाएगी। अगर स्त्री वही बात लिखती है तो या तो उसे मूर्ख कह दिया जाता है या फिर कह दिया जाता है कि किसी पुरुष का रहमो-करम है। अगर स्त्री को उसके लिखे का सम्मान और पहचान मिल भी जाती है तो बार-बार यह कहकर कि स्त्रियों को स्त्री होने के कारण ज्यादा महत्व मिलता है, उनके लिखे को नष्ट करने का प्रयास किया जाता है। एक स्त्री के काम को किसी और की कृपा बताकर एक पल में ही शक की निगाह से देखा जाने लगता है और इस तरह उसे धूमिल कर दिया जाता है।

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इस विषय में हाल ही में आई किताब  ‘आलोचना का स्त्री पक्ष’  किताब में लेखिका सुजाता ‘हिंदी में स्त्रीत्ववादी विमर्श: साहित्य में अधीनता से मुक्ति के सवाल’ से एक उद्धरण पेश करती हैं जिसमें सुधीश पचौरी लिखते हैं, “अभी तक स्त्री के लिखने के योग्य होने के प्रति एक गहन संदेह का वातावरण ही स्त्री लेखन का मुख्य वातावरण है। यह एक होस्टाइल वातावरण है जिसके दवाब स्त्री-लेखन पर जगह- जगह पड़ते हैं। जिस तरह लोग औरतों के प्रति अपराध करने की प्रवृत्ति को स्वाभाविक मानकर चलते हैं, उसी तरह वे उनके लिखने को अस्वाभाविक मानकर चलते हैं। स्त्री के प्रति जिस समाज में अनुदार वातावरण है, स्त्री लेखन के प्रति भी उसी अनुपात में असहिष्णु वातावरण है। हर लेखिका को एक मर्द ही बनाता है यह प्रवाद मौन स्वीकृति से सिद्धांत में बदल जाता है। इतने सारे लेखक हैं तो कुछ औरतें भी गिना दी जानी चाहिए, जगह देने वाले अक्सर ऐसा ही सोचते हैं।”

साहित्य के इतिहास की बात करें तो वहां भी स्त्री रचनाकार क रचनाओं पर सवाल उठाए गए हैं। इस बारे में सुजाता लिखती हैं, ”अब तक की साहित्येतिहास की पुस्तकों की तर्कप्रणाली यह है कि स्त्रियों की रचनाएं मिलती नहीं, मिल जायें तो प्रामाणिक नहीं ठहरतीं, प्रामाणिक हो तो कविता की दृष्टि से स्तरीय नहीं हैं, यदि स्तरीय हैं तो संभावना है कि उसके पति या प्रेमी (यदि वह कवि है) द्वारा लिखी गई है। स्त्री का अभिकर्तृत्व हमेशा संदिग्ध रहा। अधिकांश बहसें, ‘उसने लिखा या उसके प्रेमी ने’ के आस- पास घूमती हैं।”

बुद्धिमत्ता को पुरुष के साथ और मूर्खता को एक स्त्री के साथ इस प्रकार से जोड़ दिया गया कि दोनों चाहे एक ही बात क्यों न लिख रहे हो, लेकिन महत्ता पुरुष के लिखे को दी जाएगी। अगर स्त्री वही बात लिखती है तो या तो उसे मूर्ख कह दिया जाता है या फिर कह दिया जाता है कि किसी पुरुष का रहमो-करम है।

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इसके लिए सुजाता ने किताब में कई उदाहरण दिए हैं जिनमें से एक शेख़ रंगरेज़िन का मैं यहां ज़िक्र करूंगी। सुजाता लिखती हैं कि शेख़ रंगरेज़िन के छंद हिंदी के अच्छे से अच्छे श्रंगारी कवियों से टक्कर ले सकते हैं। इतिहासकारों ने शेख़ की प्रतिभा का लोहा तो माना लेकिन उसका स्त्री होना उनके लिए एक चुनौती बन गया। उन्होंने शेख़ को सहृदया, रसिका और वाक्पटु कहकर तारीफ तो की, साथ ही साथ यह भी लिख गए कि इतनी अच्छी भाषा उन्होंने कैसे पाई? हो सकता है कि आलम के सहयोग या संबंध का प्रभाव हो या रंगरेज़िन होने के कारण उसका संबंध ब्रज भाषा से परिचित अन्य रसिक कवियों से रहा हो। बता दें कि आलम जो कि एक ब्राह्मण था, उसने शेख़ के प्यार में पड़कर अपना धर्म परिवर्तित किया था। शेख़ और आलम दोनों का एक संयुक्त संग्रह भी है, आलम- केलि। एक लेखक ने तो यहां तक लिखा है कि आलम ने ही प्रसन्न होकर अपने छन्दों पर शेख़ के नाम की मुहर लगा दी होगी। इस पर सुजाता सवाल करती हैं कि कोई पूछे कि अगर इतना ही प्रेम था तो आलम को पूरा संग्रह ही शेख़ के नाम कर देना चाहिए था।

अगर कोई महिला अपने पसंद का कोई कोर्स करना चाहती है या स्पोर्ट्स खेलना चाहती है तो कहा जाता है कि किसी ने बहका दिया होगा। अगर घर- परिवार में बहस करती है, गलत पर सवाल करती है तो कोई न कोई हवा दे रहा है।

पुरुषवादी आलोचना का स्त्री लेखन पर प्रभाव

कभी सुना है किसी पुरुष लेखक के बारे में कि उसकी प्रेमिका या पत्नी ने लिखा होगा। नहीं सुना होगा क्योंकि सदियों से आलोचक का दर्जा भी तो पुरुषों के पास है जो अपने पुरुषवादी चश्मे से स्त्रियों की प्रतिभा का आकलन करते आए हैं। स्त्री रचना के आलोचकों के लिए एक और बड़ा हथियार था, ‘एड फेमिनम (ad feminam) जिसमें स्त्री के तर्कों का जवाब देने के बजाय उसके चरित्र पर सवाल उठा दिए जाते हैं। जिस स्त्री को सदियों से पढ़ने- लिखने से वंचित रखा गया, उसका अपने भाव और विचारों को लेखन के माध्यम से व्यक्त कर पाना ही बहुत बड़ी बात थी, ऊपर से स्त्री विरोधी आलोचना का डर। सोचिए किसी नई लेखिका पर इसका कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ता होगा। कई तो लेखन के क्षेत्र में आने से ही घबराती होंगी। इसी वजह से स्त्री रचनाकार आत्मसंशय से ग्रसित होकर और स्त्रीद्वेषी आलोचना से कुछ हद तक बचने के लिए लेखन के पितृसत्तात्मक मानकों को अपना लेती हैं और जो मूल स्त्री स्वर होता है, वह कहीं दबकर रह जाता है। लेखन के इन पितृसत्तात्मक मानकों में स्त्री की छवि को भी पुरुष की फंतासी के अनुसार ही गढ़ा गया है क्योंकि पुरुषों के लिए केवल पुरुष ही टारगेट ऑडियंस थे जिनके लिए पुरुषवादी भाषा में ही लिखा गया। पुरुषों ने जब भी रोमांस का वर्णन किया, स्त्री को सुंदरता की मूरत बताया। स्त्री भी अपनी लेखनी में इन्हीं मानकों पर गढ़ी स्त्रियोचित छवि को आत्मसात कर लेती है और यह तय नहीं कर पाती हैं कि उनके अपने लेखन के मूल्य कितने महत्वपूर्ण हैं।

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जब पहचान छिपाकर लिखती थी स्त्री

प्रारंभ से ही स्त्री के लिए लिखना बहुत बड़ी बात रही है। जब पुरुषवादी समाज में ही कुछ पुरुष सामाजिक-राजनीतिक कारणों से छद्मनामों से लिखते थे, सोचिए उस वक्त एक स्त्री के लिए कितनी मुश्किल रही होगी। अपनी पीड़ा, अपनी बात को अपनी वास्तविक पहचान के साथ शब्दों में बयां करना एक स्त्री के लिए अंगारों पर पैर रखने के समान तो था ही, साथ ही समाज के द्वारा उनके लिखे को स्वीकार कर भी नहीं किया जाता था। छद्मनामों से लिखने वाले पुरुषों के लिए अपने लेखन पर दावा करना कोई बड़ी बात नहीं थी क्योंकि उनके सामने लिंगभेदी दीवार जो नहीं थी। वे तो बाद में हालात ठीक होने पर अपनी पहचान उजागर कर सकते थे। लेखिका सुजाता अपनी किताब में बताती हैं कि स्त्री लेखकों को ऐसे छद्मनामों का सहारा लेना ही पड़ता था जिनसे जेंडर का पता ही न चले या फिर किसी पुरुष की रचना लगे ताकि उनके लेखन को गंभीरता से लिया जाए, पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर और एक स्त्री समझकर उसे उपेक्षित और खारिज न कर दिया जाए।

ऐसे कई उदाहरण हैं। जैसे कि लेखिका मैरी एन इवांस  ने जॉर्ज इलियट और वायलेट पेजेट ने वर्नन ली  के नाम से लिखा। जिस आउट ऑफ एफ्रीका  किताब पर आधारित मूवी ने बेस्ट पिक्चर के अवॉर्ड समेत सात एकेडमी ऑस्कर अवॉर्ड अपने नाम किए, वह करेन ब्लिक्सेन  ने आइजैक डाइनेसन  के छद्मनाम से लिखी थी। इसके साथ ही करेन ने पियरे एंड्रेज़ल  नाम का भी उपयोग अपनी रचनाओं के लिए किया। लेखन केवल और केवल पुरुषों का इलाका था जिसमें अगर एक स्त्री की एंट्री हो भी रही थी तो छिपते- छिपाते।

स्त्री के लिए छद्मनाम से लिखने के केवल सामाजिक कारण ही नहीं थे, बल्कि उसको घर- परिवार के दवाब का सामना भी करना पड़ रहा था। इस बारे में सुजाता लिखती हैं, “क्षेमचंद्र सुमन जब आधुनिक हिंदी कवयित्रियों के प्रेम- गीतों का संकलन कर रहे थे तो उन्हें रचनायें तो खूब मिलीं लेकिन कुछ कवयित्रियों ने अपने जीवन- परिचय और फोटो भेजने में आनाकानी की। कुछ कवयित्रियां इसलिए शामिल नहीं हो पाईं कि बीसवीं सदी के स्वतंत्र भारत में भी कुछ ऐसे पति हैं जिन्हें पत्नियों का साहित्यिक जीवन बर्दाश्त नहीं।”

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निजी जीवन में भी स्त्री के फैसलों पर संशय

यह बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। निजी जीवन में भी स्त्रियां अगर अपने निर्णय खुद लेती हैं तो उनको भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। यह पितृसत्तात्मक समाज एक स्त्री को अपने व्यक्तिगत फैसले लेने के काबिल भी नहीं समझता है। हमें अपने आस-पास इसके कई उदाहरण देखने- सुनने को मिल जाते हैं। जैसे, अगर कोई महिला अपने पसंद का कोई कोर्स करना चाहती है या स्पोर्ट्स खेलना चाहती है तो कहा जाता है कि किसी ने बहका दिया होगा। अगर घर- परिवार में बहस करती है, गलत पर सवाल करती है तो कोई न कोई हवा दे रहा है। अगर मनपसंद शादी करना चाहती है तो बहल गई है। मसला यहां ये है कि लोग लड़कियों को पुरानी सोच से आगे बढ़कर आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना तो चाहते हैं लेकिन वे यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि यह फैसला लड़कियां खुद लेने के काबिल और परिपक्व हैं।

स्त्री कोई घुसपैठिया नहीं है जो आपके इलाके में आकर आपका हक छीन लेगी। स्त्रियां समावेश चाहती हैं जिसमें हर क्षेत्र में प्रदर्शन का उनको भी उतना ही हक मिले, जितना एक पुरुष को मिलता आया है। जिसमें कोई यह न समझे कि इस पर तो बस हमारा ही हक है और स्त्री बिना किसी चरित्र प्रमाण-पत्र की चिंता किए खुद को अभिव्यक्त कर सके। स्त्रियों की प्रतिभा, उनके फैसलों को पितृसत्तात्मक चश्मे से देखना बंद कर उनके लिए ऐसा वातावरण, सपोर्ट सिस्टम विकसित किया जाना चाहिए जिसमें उनको हाशिए पर न रखा जाए। वरना आप विकास और समानता को लेकर कितना ही दंभ भर लें लेकिन सच्चाई यही रहेगी कि लैंगिक संवेदनशीलता और समानतापूर्ण समाज के निर्माण का सपना कोसों दूर ही रहेगा और लैंगिक भेदभाव के बीज इसी तरह आगे भी बोए जाते रहेंगे।

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संदर्भ : आलोचना का स्त्री पक्ष

तस्वीर साभार : MLA Commons

मेरा नाम पारुल शर्मा है। आईआईएमसी, नई दिल्ली से 'हिंदी पत्रकारिता' में स्नातकोत्तर डिप्लोमा और गुरु जांबेश्वर यूनिवर्सिटी, हिसार से मास कम्युनिकेशन में एम.ए. किया है। शौक की बात करें तो किताबें पढ़ना, फोटोग्राफी, शतरंज खेलना और कंटेंपरेरी डांस बेहद पसंद है।

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