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अभी हाल ही में समाप्त हुए खेल के उत्सव टोक्यो ओलंपिक्स में भारत के शानदार प्रदर्शन के बाद टोक्यो में ही पैरालंपिक्स का आयोजन भी होने जा रहा है। यह उत्सव 24 अगस्त से शुरू होगा जिसमें भारत की ओर से 9 खेलों में 54 पैरा एथलीट हिस्सा लेंगे और देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। इस साल पहली बार पैरालंपिक्स में बैडमिंटन खेल का आयोजन किया जा रहा है। सभी खिलाड़ियों में से बैडमिंटन में भारत का प्रतिनिधित्व करती सबसे युवा खिलाड़ी हैं पलक कोहली। पलक कोहली इस बार के टोक्यो पैरा ओलंपिक में तीन बैडमिंटन इवेंट सिंगल्ल, डबल्स और मिक्स्ड डबल्स में हिस्सा लेंगी। इनके इस मुकाम पर पहुंचने का सफ़र आसान नहीं था लेकिन फिर भी तमाम परेशानियों के बावजूद पलक ने अपने हौसले पस्त नहीं होने दिए और अब वह इतिहास रचने जा रही हैं। 

पंजाब के जालंधर शहर की रहने वाली पलक का जन्म 12 अगस्त, 2002 में हुआ। पारुल की शिक्षा सेंट जोसेफ़ कॉन्वेंट स्कूल से हुई। इनकी ज़िंदगी ने बड़ा मोड़ लिया जब किसी व्यक्ति ने इन्हें पैरा-बैडमिंटन के बारे बताया। उस दिन के बाद से आज तक इन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपनी मेहनत और अभ्यास से अब यह पैरा-बैडमिंटन खेल की तीन प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी। डबल्स में पलक 48 वर्षीय पैरा-ओलंपिक खिलाड़ी पारुल परमार की जोड़ीदार बनकर खेलेंगीं। पारुल सभी खिलाड़ियों में से सबसे बड़ी हैं और पलक सबसे युवा। इन दोनों खिलाड़ियों की जोड़ी विश्व में छठे स्थान पर है। इनके कोच गौरव खन्ना, जो इस समय भारतीय पैरा-बैडमिंटन टीम के राष्ट्रीय कोच हैं, पैरालंपिक में इन दोंनो के क्वालीफाई हो जाने से बेहद खुश हैं। 

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ऐसा नहीं है कि बचपन से ही पलक की रुचि बैडमिंटन में थी। हिंदुस्तान टाइम्स के साथ एक साक्षात्कार के दौरान इन्होंने बताया कि पहले सब लोग इनको दया की दृष्टि से देखते थे। वह हमेशा पूछते थे कि ‘आपके साथ क्या हुआ है? भगवान ऐसा किसी के साथ न करे।’ पलक को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। वह कहती हैं, “अब जो होना था वह हो गया। हम लोगों पर दया करके चीज़ें बदल तो सकती नहीं हैं।” वह एक सहज ज़िंदगी जीने चाहती थीं। वह हमेशा सोचती थी कि लोगों के दो हाथ क्यों हैं और मेरे क्यों नहीं? लेकिन यह स्थिति लखनऊ में अकादमी में आकर बैडमिंटन खेलने के दौरान बदली। यहां अन्य-पैरा खिलाड़ियों को देखकर पलक को बहुत अच्छा लगा। यहां सब साथ में हंसते और खेलते हैं। पलक का मानना है कि एक व्यक्ति का आचरण उसके परिवेश पर निर्भर करता है। अगर आप सकारात्मक लोगों से घिरे हैं तो वो आपके आचरण में दिखाई देगा।

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पलक ने साक्षात्कार में बताया कि उनके लिए ज़िंदगी इतनी आसान नहीं थी। इस मुकाम पर पहुंचने के लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किए हैं। पहले तो स्कूल और समाज से जो भी इन्हें सुनने को मिलता था, वह घर आकर अपने माता-पिता को बताकर दुखी नहीं करती थीं। एक दिन किसी मॉल में एक व्यक्ति ने इनका परिचय पैरा-बैडमिंटन से करवाया। जब इसका ज़िक्र इन्होंने अपने माता-पिता से किया और उन्हें कहा कि मैं बैडमिंटन खेलना चाहती हूं, तो वह हैरान तो हुए पर मेरे कहने पर वह मान गए। अकादमी में भी ट्रेनिंग का सफ़र इनके लिए आसान नहीं था। लॉकडाउन के चलते जब पलक के बाकी सब दोस्त घर अपने माता-पिता के साथ थे, तब पलक अकादमी में रह कर अभ्यास करती थीं। इन्होंने इस मुकाम पर पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की है और आज इसका फल इन्हें मिल रहा है। पलक को अपनी मेहनत और लगन पर पूरा विश्वास है। वेबसाइट पैरालंपिक के मुताबिक पलक ने पिछले एक साल से कोई छुट्टी नहीं ली। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान भी वह लगातार प्रैक्टिस में जुटी रहीं।

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अब पलक का यह सपना है कि वह टोक्यो पैरा-ओलंपिक के पोडियम पर खड़े होकर देश का राष्ट्रगान सुने जिसके लिए वह मेहनत भी कर रही हैं। बता दें कि पेरु और ब्राज़ील में आयोजित BWF पैरा बैडमिंटन इंटरनेशनल टूर्नमेंट में शामिल होने के लिए पलक ने अपनी बोर्ड परीक्षाएं तक छोड़ दी थीं। इन्होंने साल 2019 के यूगांडा पैरा-बैडमिंटन में वीमंस डबल्स में गोल्ड और वीमंस सिंगल्स में सिल्वर मेडल जीता। साथ ही BWF पारा बैडमिंटन इंटरनैशनल जापान में पलक ने वीमंस डबल्स में ब्रॉन्ज़ मेंडल अपने नाम किया। इसी साल दुबई में हुए पैरा बैडमिंटन टूर्नमेंट में पलक ने वीमंस सिंगल्स में सिल्वर, वीमंस डबल्स में ब्रॉन्ज और मिक्स्ड डबल्स में भी ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया।

पलक ने अपने सपनों के बीच किसी भी रुकावट को नहीं आने दिया। वह बिना डरे, मेहनत करके बस परिश्रम करती रहीं और आज विश्व के सबसे बड़े पैरा खेल के महा-उत्सव पैरालंपिक में अपना नाम बनाने जा रही हैं। पलक की ज़िंदगी हम सबको सीख देती है कि अगर आप में लगन और कुछ करने की इच्छा हो तो कोई भी चीज़ आपको अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए नहीं रोक सकती। ज़रूरत है तो बस धैर्य और मेहनत की। हर व्यक्ति अपने-अपने संघर्षों से लड़ता है पर सफ़ल वही होता है जो हार नहीं मानता और पलक इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। वह ऐसे लोगों के लिए मिसाल हैं जो हार मानकर बैठ जाते हैं। 

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तस्वीर साभार: Olympic.Com

प्रेरणा हिंदी साहित्य की विद्यार्थी हैं। यह दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। इन्होंने अनुवाद में डिप्लोमा किया है। अनुवाद और लेखन कार्यों में रुचि रखने के इलावा इन्हें चित्रकारी भी पसंद है। नारीवाद, समलैंगिकता, भाषा, साहित्य और राजनैतिक मुद्दों में इनकी विशेष रुचि है।

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