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शायद पहले कभी आपने फेमिनिज़्म इन इंडिया पर कोई आर्टिकल पढ़ते हुए, किसी से बात करते हुए, कोई फ़िल्म रिव्यु पढ़ते हुए ‘मेल गेज़’ शब्द सुना हो। अगर हूबहू यह शब्द नहीं भी सुना है तब भी समाज में मेल गेज़ कैसे मौजूद है और कैसे यह महिलाओं के जीवन की छोटी से बड़ी आदतों, व्यवहारों, फैसलों को प्रभावित करता है यह बात देखी होगी। आइए समझते हैं कि ‘मेल गेज़’ जिसके लिए सबसे क़रीबी हिंदी शब्द होगा ‘मर्दाना चश्मा’ आख़िर है क्या।

1970 के दौरान फ़िल्म थ्योरी और आलोचनाओं की दुनिया में ‘गेज़ शब्द’ आया। जिसका मतलब था कि दर्शक दृश्यों को किस तरह से जुड़ते और उसे समझते हैं यानि विजुल रिप्रेजेंटेशन। इसमें विज्ञापन, टीवी प्रोग्राम, सिनेमा आदि शामिल हैं। स्कॉलर और फ़िल्म मेकर लौरा मुल्वेय ने नारीवादी फ़िल्म थ्योरी में पहली बार ‘मेल गेज़’ शब्द का उपयोग किया। इस शब्द को गढ़ने का श्रेय उन्हें जाता है। उन्होंने 1975 में अपने लेख ‘visual pleasure and narrative cinema‘ में इसका ज़िक्र किया था। मुल्वेय के अनुसार इस शब्द के पीछे की धारणा उन पुरुषों पर आधारित है जो इतरलिंगी (हेट्रोसेक्सुअल) हैं और पितृसत्ता के नियमों के अनुसार मर्दाना हैं। ऐसे पुरुष जिस नज़र से महिलाओं को देखते हैं, उनके अनुभवों को देखते हैं, उनके पूरे अस्तित्व को समझते हैं और समझाते हैं वही मेल गेज़ है। मुल्वेय ने लिखा था, “महिलाएं ‘नज़ारा'(स्पेक्टेकल) हैं और पुरुष उस दृश्य को भोगने वाला, यही मेल गेज़ का आधार है।”

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फिल्मों के नज़रिये से मेल गेज़

फ़िल्मों से मेल गेज़ का उदाहरण ढूंढ कर इसे समझना चाहें तो कई उदाहरण हैं। फिल्मों में आइटम सॉन्ग का चलन देखा जा सकता है। आइटम सॉन्ग दर्शकों को आकर्षित करने और मसाला डालने के लिए फिल्मों में भरपूर इस्तेमाल किया जाने लगा। आइटम सांग्स के बोल पर ध्यान दें तो एक बात सबमें एक तरह से मौजूद है। लिरिक्स में एक पुरुष महिला के शरीर का भोग करना चाह रहा है और उसे भोग की वस्तु से ज़्यादा कुछ नहीं समझ रहा है। गाने के ये बोल या तो हीरो के मुंह से गवाए जाते हैं या ‘आइटम गर्ल’ के मुंह से जो खुद को भोग की वस्तु बताकर थाल में सजकर पुरुष के पास आ रही है। इसके अलावा ज्यादातर ऐसे गानों में आइटम गर्ल का पहनावा उन कपड़ों, गहनों से लिया गया होता है जो नोमैडिक यानि घुमंतू समुदाय की महिलाओं, विमुक्त जातियों की महिलाओं का आम पहनावा है।

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इन सभी समुदायों के साथ ऐतिहासिक रूप से ग़लत हुआ है। उन्हें अपनी इसी पहचान के कारण तथाकथित सभ्य समाज ने कभी आपराधिक समुदाय का नाम दिया। बता दें कि साल 1952 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तरह उन्हें इस आपराधिक समुदाय की श्रेणी से निकाला गया। इसके साथ ही इन समुदायों के साथ सांस्कृतिक, सामाजिक भेदभाव होता आया है। डीनोटिफिएड ट्राइब, नोमेडिक ट्राइब और सेमी नोमेडिक ट्राइब के अंदर आने वाले समुदाय अपने पुश्तैनी काम जैसे सांप, बंदरों के खेल दिखाना, भविष्य बताना इत्यादि जैसे काम करते थे, जब तक उनका पेट इससे पल पा रहा था। सभ्य समाज के लिए ये लोग उनके साथ रहने और उनकी तरह के सामाजिक इज्ज़त के हक़दार नहीं माने जाते।

वहीं, इन समुदाय की महिलाओं को बस यौन रूप से फैंटसाइज़ किया गया है। इसी प्रवृति से आइटम गर्ल के कपड़ों का एस्थेटिक बनाया जाता है। दर्शक कह सकते हैं कि ऐसा करना महिला की चॉइस, उसका खुद का चुनाव हो सकता है, लेकिन आइटम गर्ल के पात्र का फ़िल्म में कोई हिस्सा नहीं होता, उस क़िरदार की कोई यात्रा नहीं होती, इसलिए यह मानना कि आइटम सॉन्ग कहानी की ज़रूरत रही होगी, या उसमें महिला अपनी यौनिकता को अभिव्यक्त कर रही है एक तरह से मेल गेज़ को जबरन उचित साबित करने जैसा है।

“मेल गेज़ बचपन से ही बच्चों पर थोपा जाता है। लड़की को बचपन से कहा जाता है कि तुम मोटी हो तो शादी कैसे होगी, ये खाओ, वह मत खाओ। तो बचपन से वह खुद को पुरुषों के बनाए पैरामीटर से देख रही है, घर की औरतें भी उसे यही पैरामीटर बता रही हैं।”

एक और उदाहरण से इसे समझने की कोशिश करते हैं। ‘Sorarai Pottru‘ फ़िल्म का गाना है ‘Kattu Payale।’ इस गाने में महिला पात्र अपने प्रेमी को प्रेम में चिढ़ा रही है, साथ ही अपनी यौन इच्छाओं को प्रेमी के सामने ज़ाहिर कर रही है। गाने में एक चुम्बन दृश्य है, लेकिन कहीं से किसी महिला को विज़ुल देखते हुए ऐसा नहीं लगेगा कि उसे भोग की वस्तु बनाकर उसे वहीं तक सीमित किया जा रहा है। उस गाने के वहां होने के पीछे एक पूरी कहानी है जिसे हटा देने से फ़िल्म कहानी कहने और सृजनात्मक अभिव्यक्ति के स्तर पर प्रभावित होती दिखेगी। साथ ही छोटे-छोटे सीन जैसे, हीरो का रसोई में आटा गूंथना और हिरोइन का उसके आसपास घूम-घूमकर उसे प्यार से परेशान करने की कोशिश करना। दूसरा सीन, हीरो जब छत पर कपड़े डाल रहा होता है, हिरोइन बच्चों की तरह मसखरी कर रही ख़ुद में नाच रही होती है। कभी उसे अपनी मसखरी में शामिल करने को खींच रही होती है। ऐसे तमाम सीन जेंडर आधारित भूमिका जो घर में बंटी होती है उसे तोड़ते हुए किए जा रहे प्रेम को दिखाते हैं। साथ ही इसका विज़ुल उस तरह से प्योरिस्ट यानि ‘पवित्र प्रेम’ के विज़ुल को भी नहीं मान रहा जो बड़ी चालाकी से दो फूलों को आसपास में टकराकर प्रेम की यौन अभिव्यक्ति को दोनों पक्षों के लिए रोकते हो या महिला शरीर को ‘पवित्र’ बताने की साज़िश के तरह उसे संस्कार की तिज़ोरी में डाल कर, उसपर ताला लगा देते हों, और चाभी पितृसता को पकड़ा दी जाती हो।

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मेल गेज़ और हमारे जिए हुए अनुभव 

हालांकि, मेल गेज़ हर महिला का वस्तुतिकरण करता है लेकिन एक उम्र स्लैब, 20-30 के उम्र की महिलाएं उनके निशाने पर हर वक़्त होती हैं। फ़िल्मों के अलावा रोज़मर्रा के जीवन में इस उम्र की लड़कियां, महिलाएं जो इस शब्द से परिचित हैं, विश्वविद्यालय के स्पेस में जिन्हें आने और पढ़ने का मौका मिला है, जो अपने आसपास के मेल गेज़ को चिन्हित कर पा रही हैं या ऐसा कर पाने को लेकर सज़ग रहती हैं, उनसे मैंने जानना चाहा कि वे मेल गेज़ को निजी अनुभवों से कैसे देखती हैं और उसे अपने जीवन में कैसे हैंडल करती हैं।

एक महिला सोशल मीडिया या ऑफलाइन मौजूद लोगों को बहुत ही आज़ाद ख़्याल, मनमौजी, पढ़ी-लिखी, मजबूत लगती होगी, तब भी उसे मेल गेज़ हमेशा मानसिक स्तर पर असहज किए रहता है।

“हमारे लिए मेल गेज़ दो एक्सट्रीम पर काम करता है। एक इच्छा और दूसरा डर। जैसे अगर हम तैयार होकर कहीं जा रहे हैं या सोशल मीडिया पर फ़ोटो डाल रहे हैं, तो एक ख़्याल है कि जो मर्द हमें पसंद हैं उनको हम पसंद आएंगे या नहीं, उनको ये कैसा लगेगा। फिर आता है डर। मेल गेज़ का यह डर हमेशा दिमाग़ में रहता है। जैसे हम सड़क पर चल रहे हैं पर हम खुद को बाहर से मेल गेज़ के नज़र से देख रहे हैं कि कहीं हम ऐसे तो नहीं लग रहे कि उसके परिणाम में कोई पुरुष आकर मेरे स्पेस में दखल दे। वह मेरे किसी हरक़त को ऐसा कर पाने का अधिकार मान ले। फ़ोटो डालने में वही एक बात है कि फ़ोटो डालने समय हम बस सहज तारीफ़ के लिए डाल रहे होते हैं पर डालने के बाद जो भावना है वह डर की होती है कि इससे कहीं कोई मर्द ऑनलाइन स्टॉकर न बन जाएं, कहीं फ़ोटो का ग़लत इस्तेमाल न कर ले, कहीं उसे ऐसा न लगे कि हम ‘हॉट’ कपड़े पहनकर किसी को आमंत्रित कर रहे हैं। यह बात भी है कि हॉट दिखने का पैमाना भी आंतरिक मेल गेज़ से आता है, लेकिन यहां तक इससे फिर भी किसी को दिक़्क़त नहीं हो रही है। पर फिर वही कपड़े में बाहर जाने से डर लगा कि कोई मेरे कपड़े को अपने ग़लत व्यवहार का जिम्मेदार ठहरा देगा।” एक सहपाठी ने मेल गेज़ को लेकर यह कहा। उसे सुनते हुए मुझे एक पुरुष की याद आई जो मुझसे किसी और महिला का ज़िक्र करते हुए कहा रहा था कि वह महिला एक विशेष तरह के सेक्स जोक्स, मीम डालती है इससे उसका ‘ट्रैफिक’ बना है। मेरे ट्रैफिक शब्द पर आपत्ति करने और उसके इस स्थिति को देखने और कहने के पूरे तरीक़े पर आपत्ति जताने पर वह ‘ट्रैफिक’ शब्द उसके मुंह से क्यों निकल गया इस बात पर तर्क देता रहा बल्कि मामला उससे बड़ा था। इस तरह के शब्द को अक्सर पुरुषों के ‘मुंह से निकल जाते हैं’, यह मेल गेज़ का ही उदाहरण है।

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एक महिला सोशल मीडिया या ऑफलाइन मौजूद लोगों को बहुत ही आज़ाद ख़्याल, मनमौजी, पढ़ी-लिखी, मजबूत लगती होगी, तब भी उसे मेल गेज़ हमेशा मानसिक स्तर पर असहज किए रहता है। वह हमेशा अपने आप को उस गेज़ से क्रॉस चेक करती है, फिर सोचती है कि उसने अपनी रीढ़ की हड्डी इसलिए नहीं उगाई कि वह इन सबसे डर जाए या उसे सही मान लें। कई बार वह मानसिक थकावट से दूर रहने के लिए जैसा मेल गेज़ उसे देख रहा है और समाज के दूसरे चार लोग से कह रहा है, उसकी ख़बर होने और उसमें क्या ग़लत है वह मालूम होने के बाद भी उसे उस एक स्थिति में जाने देती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे लड़ना उसका रोज़ का काम बन चुका है और वह कुछ बार बस जाने देती है। कई बार लड़ पड़ती है। कुछ बार अन्य महिलाओं के साथ ये अनुभव साझा करती है। 

“मुझे लगता है कि मेल गेज़ बचपन से ही बच्चों पर थोपा जाता है। लड़की को बचपन से कहा जाता है कि तुम मोटी हो तो शादी कैसे होगी, ये खाओ, वह मत खाओ। तो बचपन से वह खुद को पुरुषों के बनाए पैरामीटर से देख रही है, घर की औरतें भी उसे यही पैरामीटर बता रही हैं। उसे ये नहीं कहा जा रहा कि शरीर स्वस्थ रहना चाहिए, वह जरूरी है, ये पोषण खाने में ज़रूरी है या शरीर के आकार-वजन और उसके स्वास्थ्य में हमेशा कोई रिश्ता हो ये ज़रूरी नहीं है, सबका शरीर अलग-अलग तरह से काम करता है।” इस बात से आप इतना तो समझ सकते हैं कि मेल गेज़ से ख़ुद को देखने की आदत जो महिलाओं के अंदर रह जाती है वो कहीं और से नहीं आती, समाज ने उन्हें दिया है जिससे निकलना सेल्फ लव की लंबी यात्रा हो सकती है। 

मेल गेज़ अपनाने वाले पुरुषों को इस बात अंदाज़ा रहता है या बोध के स्तर पर थोड़ी भी भनक होती है कि वे किसी के दिमाग़ को ऐसे प्रभावित करते हैं और उन्हें अपने इस गेज़ को ठीक करने पर काम करना चाहिए।

“एक भावना है जो हर वक़्त महसूस होती है, देखे जाने की और आंकलन किए जाने की भावना। मिरांडा में जब आई और जब यहां के थिएटर ग्रुप का हिस्सा बनी बहुत ज्यादा समझ आने लगा कि जिन स्पेस में पुरुष नहीं होते वहां मैं कैसा महसूस कर रही होती हूं, या वहां मेरी मौजूदगी कैसी रहती है। एक तरह से ये खुद को लगातार याद दिलाना है कि मैं किसी पुरुष के हिसाब से या उनको खुश करने के लिए नहीं हूं। कभी कभी ऐसा करने में दो कदम आगे ही चली जाती हूं। जैसे आजकल एक्ने और वज़न को लेकर कुछ निज़ी जीवन में चल रहा है तो मैं जब पुरुष मित्रों के साथ होती हूं तो इस बारे में ज़्यादा और जानबूझकर कर सज़ग होती हूं कि किसी को ऐसा न लगे कि मैं एक्ने या वजन छिपा रही हूं लेकिन कभी कभी मन किया तो इसके विपरीत भी करती हूं। ये बैलेंस का बहुत अजीब सा तरीक़ा लगता है मुझे। कई बार पार्टी जैसी सेटिंग में मालूम होता है कि क्या पहनूं-करूं तो जिस में मैं रुचि रख रही हूं वह भी मेरी उसमें रुचि देख पाए। पुरुष बहुत प्रेडिक्टेबल लगते हैं मुझे। मेल गेज़ कहीं जाने वाला तो है नहीं, ये हमें पता है, तो कभी-कभी ख़ुद के लिए उसके इस्तेमाल में क्या बुरा है। हालांकि बैलेंस करना दिमाग़ में रहता है, तो कई बार तो जानबूझकर एक्स्ट्रा दो कदम लेकर इस गेज़ को बीच वाली उंगली दिखती हूं।”

अपनी सहपाठियों से हुइ बात के बाद इतना तो साफ़ है कि महिलाओं ने इस समाज में पितृसत्ता के साथ रहते हुए, उसे लेकर हमेशा सवाल करते रहने, दूसरों से और खुद से भी, लेकिन उससे लड़ने और समाज में टिके रखने के लिए अपने छोटे-छोटे तरीक़े बनाए हैं। क्या मेल गेज़ अपनाने वाले पुरुषों को इस बात अंदाज़ा रहता है या बोध के स्तर पर थोड़ी भी भनक होती है कि वे किसी के दिमाग़ को ऐसे प्रभावित करते हैं और उन्हें अपने इस गेज़ को ठीक करने पर काम करना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा वे महिलाओं को अच्छी और बुरी औरत के खांचों में डाल, दोनों को अपने बनाए अलग-अलग पैंतरों से उनका स्पेस और उनका अधिकार कम या ज्यादा हड़पते रहेंगे। ख़ासकर महिलाओं के अपने शरीर पर हक से दूर कर, उन्हें इंसान और नागरिक होने से दूर सिर्फ़ अपने भोग की वस्तु बनाने तक सीमित करेंगे।

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तस्वीर साभार : Medium

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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