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हमारे भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में बेहतर माना जाता है। समाज में आज भी ऐसी धारणा है कि महिलाएं पुरुषों के बराबर काम नहीं कर सकती है, जबकि कई रिसर्च रिपोर्ट में यह पाया गया है कि महिलाएं पुरुषों से कहीं गुना ज़्यादा काम करती हैं। लेकिन महिलाओं को पुरुषों से कमतर आंकने की वजह से ही अक्सर जब एक महिला नौकरी करती है तो उसे पुरुषों की नौकरी के सामने कोई सम्मान नहीं दिया जाता है। महिलाओं के ऊपर ये दबाव शादी के बाद और भी बढ़ जाता है, क्योंकि शादी के बाद महिलाओं पर अपने काम के साथ-साथ घर संभालने का भी बोझ बढ़ जाता है। आज हम चाहे कितने भी विकास और आधुनिकता की बात करें, पर सच्चाई यही है कि अगर कोई महिला अपनी मर्जी से नौकरी करना चाहे तो उसे पति से इजाजत लेनी पड़ती है और महिलाओं के साथ ये दृश्य गाँव-शहर दोनों ही परिवेश में देखा जा सकता है।

इन सबमें कहीं- न-कहीं हमारी परवरिश भी बड़ा योगदान देती है, जिसमें लड़कियों को बचपन से ही पढ़ने-लिखने या नौकरी करने की बजाय घर संभालने के काम सीखाने पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है। अक्सर हमलोग गाँव में महिलाओं और किशोरियों के साथ काम करते हुए यह अनुभव करते है कि जब भी किसी विवाहित कामकाजी महिला पर परिवार नौकरी छोड़ने के लिए दबाव बनता है तो महिला परिवार और नौकरी के सामने अपने परिवार को चुनना पसंद करती है और इसपर अधिकतर महिलाओं का कहना रहता है कि नौकरी के चलते वो अपने परिवार की बलि नहीं दे सकती है, क्योंकि उन्हें ज़िंदगी तो परिवार के साथ गुज़ारनी है।

ज़ाहिर है महिलाएँ मुश्किल से पढ़-लिखकर नौकरी तक तो पहुँच पाती है लेकिन परिवार और नौकरी को साथ लेकर चलने में कई बार वो इतनी कमजोर पड़ने लगती है कि  उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ जाती है। लिंक्डइन ने ‘श्रमबल विश्वास सूचकांक’ (वर्कफोर्स कॉन्फिडेंस इंडेक्स) सर्वे में दावा किया गया है कि पांच में से दो यानी महिलाओं को अपने बच्चों की देखभाल के लिए कार्य के घंटों से आगे भी काम करना पड़ रहा है। यह सर्वे 2,254 पेशेवरों के बीच किया गया है। सर्वे के अनुसार, पांच में से सिर्फ एक यानी 20 फ़ीसद महिलाएं ही अपने बच्चों की देखभाल के लिए परिवार के सदस्यों या मित्रों पर निर्भर हैं।

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ये सर्वे बताते है नौकरीपेशा महिलाओं के ऊपर भी लगातार अपने काम के साथ-साथ अपने परिवार और बच्चों का भार बना रहता है। महिलाओं के ऊपर हर वक्त अच्छी औरत, अच्छी पत्नी और अच्छी माँ बनने का दबाव बनाया जाता है। ये दबाव का स्तर महिलाओं की नौकरी से ज़्यादा होता, परिवार उनसे लगातार रसोई से लेकर कमाई तक बेहतर करने की उम्मीद करता है, जिसमें अक्सर घर के महिलाओं को पूरा सहयोग नहीं मिल पाता है। बिना पारिवारिक सहयोग के महिलाओं का मनोबल टूटने लगता है, नतीजतन महिलाएँ अपने काम की बजाय परिवार को चुनने के लिए मजबूर हो जाती है। वो नौकरी वो उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त ही नहीं बल्कि एक पहचान दिलाती है और उनका मनोबल बढ़ाती है।

लड़कियों की शिक्षा और उनके विकास पर परिवार और समाज के मुँह सिकोड़ने की आदत, हर स्तर पर महिलाओं के मनोबल को प्रभावित करती है।

ये कुछ और नहीं लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देनी वाली परवरिश है जो बचपन से लड़कियों की सुरक्षा और मज़बूती परिवार में उन्हें दिखाती-समझाती है, लेकिन अक्सर लड़कियाँ आर्थिक रूप से मज़बूत होने के बाद भी बिना परिवार के ख़ुद को मज़बूत नहीं मानती। ये लैंगिक भेदभाव का ऐसा बीज है जो महिलाओं के मनोविज्ञान को प्रभावित करता है।

लड़कियों की शिक्षा और उनके विकास पर परिवार और समाज के मुँह सिकोड़ने की आदत, हर स्तर पर महिलाओं के मनोबल को प्रभावित करती है। पर ऐसा नहीं है कि सभी महिलाओं का मनोबल इससे टूट जाता है, बल्कि ऐसी कई महिलाएँ हैं जो मज़बूती से आगे बढ़ रही है। लेकिन दुर्भाग्यवश उनकी संख्या बहुत सीमित है और ग्रामीण क्षेत्रों में ये स्तर और भी ज़्यादा कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में जब छोटे-स्तर से ही सही कोई महिला अपने घर की दहलीज़ काम करने के लिए पार करती है तो पूरे समाज की नज़र उसपर टिकने लगती है। ये मैं लगातार अपने गाँव और आसपास के क्षेत्रों में महिलाओं के अनुभवों से महसूस करती हूँ।

कई बार गाँव में महिलाओं के साथ बैठक के दौरान उनके कामक़ाज़ी होने की वजह से उनकी हिंसा की कहानियाँ सुनने को मिलती है। ऐसे में महिलाओं के विकास से कोई सीख ले या न ले, पर जैसे ही महिलाओं के सामने चुनौती आनी शुरू होती है, समाज उसपर घर-परिवार और लोज-लाज के तमाम ताने मारना शुरू कर देता है। पर इसके विपरीत अगर महिला सफलता से अपने काम को करती है तो गाँव में और समुदाय में मिसाल बनने लगती है। कभी-कभी किसी सामाजिक बदलाव के लिए प्रेरणास्रोत का होना बेहद ज़रूरी होता है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में मज़बूती से अपने काम से अपनी पहचान बनाने वाली महिलाओं को प्रोत्साहित करना और उनकी कहानी अन्य लड़कियों तक पहुँचाना ज़रूरी है। तभी हम आने वाले समय में किसी बदलाव की कल्पना कर पाएँगें, वरना लड़कियों को पढ़ाया तो जाएगा लेकिन नौकरी करने के लिए उन्हें मानसिक रूप से मज़बूत नहीं बनाया जा पाएगा।

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तस्वीर साभार :

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