समाजपरिवार ‘आदर्श माता-पिता’ की पीढ़ी से युवाओं का संघर्ष

‘आदर्श माता-पिता’ की पीढ़ी से युवाओं का संघर्ष

आज की पीढ़ी को अपने राजनैतिक और सामाजिक को अपने माता-पिता के सामने रखने में हिचकिचाहट होती है।

आज की पीढ़ी में अपने माता-पिता की पीढ़ी के प्रति एक आक्रोश होना सामान्य बात है और जायज़ भी। गुस्सा माता-पिता के प्रति नहीं बल्कि उनकी पीढ़ी की रूढ़िवादी सोच के खिलाफ होता है। कभी-कभार उनकी सोच में द्वंद भी हो सकता है जिनका पता उन्हें खुद नहीं होता है। मिसाल के तौर पर जो पिता अपनी बेटी को उच्च शिक्षा पाने के लिए प्रेरित करता है, वही पिता बेटी को मेहमानों के आने पर ‘ढंग से’ पेश आने की हिदायत भी देता है। जो मां अपने बच्चों को सबसे कुशल व्यवहार रखना सिखाती है, वही मां उन्हें अन्य जाति के बच्चों के साथ टिफिन न शेयर करने को भी कहती है। 

भारतीय घरों में हर वक़्त बड़ों का आदर करना सिखाया जाता है। कोई छोटी-बड़ी बात कितनी ही प्रोब्लेमैटिक क्यों न हो, “बड़े कह रहे हैं तो सही ही होगी” ऐसा माना जाता है। “तुम चुप रहो”, “बड़ों के बीच छोटे बात नहीं करते”, “अभी तुमने दुनिया नहीं देखी, तुम्हें समझ नहीं है,” “ज़्यादा पढ़ लिया”,  ये सब अक्सर सुनने को मिलता है। ज़्यादा बात बढ़ी तो हमें ‘झगड़ालू’ या ‘बदतमीज़’ भी करार दे दिया जाता है। अफसोस कि हमारा उनकी बात से असहमत होने को उनकी अवहेलना करना मान लिया जाता है।

एक स्वस्थ रिश्ते के लिए ज़रूरी है कि दो लागों के विचारों में समानता हो। एक विषय पर समान राय रखने से दो लोगों में बेहतर समझ विकसित होती है। समान राय न भी हो तो एक दूसरे के विचारों का आदर करने और अपने विचार न थोपने से भी रिश्तों में सम्मान बना रहता है। अक्सर भारतीय परिवारों में एक दूसरे के अलग विचारों के लिए यह सम्मान कम पाया जाता है। यही रिश्तों में दरार और लड़ाई-झगड़े का कारण बन जाता है। 

आज की पीढ़ी को अपने राजनैतिक और सामाजिक को अपने माता-पिता के सामने रखने में हिचकिचाहट होती है।

आज की पीढ़ी को अपने राजनीतिक और सामाजिक विचारों को अपने माता-पिता के सामने रखने में हिचकिचाहट होती है। डर लगता है कि अगर वे नहीं समझ पाए तो? वे मुझे नहीं स्वीकार पाए तो और ऐसा भी नहीं है कि हम चुप बैठ जाएं! तो करें क्या आखिर? वाकई बदलाव घर से ही शुरू होता है। मसलन घर में किसी की शादी हो और बात लड़की के रंग को लेकर हो, तो घर पर ही रंगभेद और नारीवाद पर विचार-विमर्श होना तो ज़रूरी है, पर कैसे?

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जिस समाज में हम पल-बढ़ रहे हैं वह हमारे माता-पिता के समाज से काफी अलग है। एक शोध के अनुसार, साल 1972 में सिर्फ 52 फ़ीसद अमेरिकी एक गे व्यक्ति द्वारा पढ़ाए जाने से राज़ी थे। वहीं, साल 2012 में 85 फ़ीसद लोग गे व्यक्ति द्वारा पढ़ाए जाने के लिए तैयार थे। आज हमारे पास हर जानकारी तुरंत पाने के साधन हैं। जब मन किया ट्रान्स राइट्स की जानकारी प्राप्त कर ली। उस पर वीडियो देख लिया। अपने दोस्तों से बात कर ली। डिप्रेसिव फील हुआ तो सोशल मीडिया पर ‘rant’ कर लिया या मीम शेयर कर लिया। यकीनन हमारे माता-पिता के पास भी इंटरनेट की सुविधा है लेकिन काफी सीमित है। फर्क सिर्फ इंटरनेट के इस्तेमाल में नहीं बल्कि हमारी बुनियादी विचारधारा में भी है। अभी हम उस दौर में हैं जहां इंटरनेट हमारी विचारधारा को प्रभावित कर सकता है और कर ही रहा है। वहीं, हमारे माता-पिता के विचार पुरानी रूढ़िवादी समाज के हिसाब से ढल चुके हैं। अब इंटरनेट से मिली जानकारी में उन्हें कम विश्वास होता है। वे एक सांचे में ढल चुके हैं और उससे निकलना नहीं चाहते।

ज़रूरी है कि हम अपने माता-पिता से एक स्वस्थ संवाद बनाए रखें और उन्हें धीरे-धीरे अपने विचारों और उसके कारण के बारे में बताएं। हमारे आस-पास होनेवाली कुरीतियों पर उनकी भी राय जानें और उस पर विचार-विमर्श करें। अपनी राय भी साझा करें। महिलाओं पर होते हुए शोषण, दहेज-प्रथा, दलित समुदाय के अधिकार, इन सब विषयों से बात शुरू की जानी चाहिए।

यह समझना चाहिए कि हमारे और हमारे माता-पिता के विचार अलग ज़रूर हो सकते हैं पर उन पर इस बात के लिए गुस्सा करने से कोई फायदा नहीं। दिक़्क़त तो उतनी ही रहेगी। बेहतर होगा अगर हम उन्हें समझाएं की उनका मानना क्यों गलत है, वह भी संवाद के ज़रिये। बातों की ‘टोन’ काफी मायने रखती है। ऐसे है धीरे-धीरे समझते-समझाते बात करते-करते हम एक बेहतर और समावेशी समाज की और अग्रसर हो सकते हैं। बदलाव एक दिन में नहीं आएगा पर एक बेहतर बदलाव की ओर बढ़ना अब बेहद ज़रूरी है। 

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तस्वीर साभार : dichotomy

About the author(s)

सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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