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कोरोना महामारी के बाद जहां धीरे-धीरे व्यवसाय, आम चिकित्सा, रोज़मर्रा की ज़िंदगी शुरू हो चुकी है। वहीं, बड़ी तादाद में बच्चों की शिक्षा पीछे छूट गई है। भले आज चुनिंदा राज्यों में स्कूल फिर से खुल रहे हो, लेकिन लगभग दो साल के लंबे अंतराल में बच्चों का पहले का पढ़ा या सीखा भूल जाना स्वाभाविक तौर पर सामने आ रहा है। बच्चों की शिक्षा सिर्फ उनके स्वावलंबी होने के लिए ही नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन, अपने दायित्व या अधिकारों के प्रति जागरूकता और आर्थिक, शारीरिक या यौन शोषण से बच पाने के अहम कारक के रूप में आगे के जीवन में अहम भूमिका निभाती है। पिछले दो सालों में कोरोना से त्रस्त आम लोगों में बड़ी संख्या में लोगों ने अपनों को खोया। लाखों ने नौकरियां खोई तो कुछ ने आगे बढ़ने की उम्मीद। लेकिन इस पूरी जद्दोजहद में बच्चों के जीवन बचाने के चक्कर में, संभवतः उनकी शिक्षा और उनका बचपन भी काफी हद तक खो गए।

हाल ही में अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और रीतिका खेरा के साथ शोधकर्ता विपुल पैकरा और निराली बाखला ने ‘लॉक्ड आउट: इमरजेंसी रिपोर्ट ऑन स्कूल एजुकेशन’ नामक एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें बच्चों की शिक्षा का ऑनलाइन और ऑफलाइन स्थिति पर जायज़ा लिया गया। देश के 15 राज्यों के वंचित घरों पर किए गए इस रिपोर्ट के अनुसार:

1- सर्वेक्षण के समय ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 28 फ़ीसद बच्चे नियमित रूप से पढ़ने की सूचना दी।

2- इसके अलावा इन इलाकों में पहली से आठवीं कक्षा तक के 37 फ़ीसद बच्चे किसी भी प्रकार की कोई पढ़ाई नहीं कर रहे थे।

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3- स्कूल बंद होने और ऑनलाइन शिक्षा के चलन से हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि सर्वेक्षण में शामिल सभी बच्चों में से लगभग आधे बच्चे ही कुछ शब्द पढ़ने में समर्थ पाए गए।

4- जिन बच्चों के मामले में ऑनलाइन पहुंच की पुष्टि की गई, उनमें भी 65-70 फ़ीसद ग्रामीण और शहरी माता-पिता को लगता है कि लॉकडाउन के दौरान उनके बच्चे की पढ़ने और लिखने की क्षमता में गिरावट आई है।

5- सिर्फ 34-35 फ़ीसद ग्रामीण या शहरी क्षेत्र के बच्चों ने बताया कि वे समय-समय पर पढ़ाई कर रहे हैं।

6- स्कूली बच्चों में ‘नियमित रूप से’ ऑनलाइन पढ़ाई करने वालों का फ़ीसद शहरी क्षेत्रों में 24 और ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 8 फ़ीसद रहा। 

7- इस सर्वेक्षण में शामिल हुए आधे से ज्यादा ग्रामीण परिवारों ने स्मार्टफोन न होने की सूचना दी। ऐसे घर जहां स्मार्टफोन पाए गए, वहां भी 31 फ़ीसद शहरी बच्चों और महज 15 फ़ीसद ग्रामीण बच्चों ने ऑनलाइन पढ़ाई करने की सूचना दी।

8- इस सर्वेक्षण में शामिल हुए परिवारों में शहरी क्षेत्र के 23 फ़ीसद और ग्रामीण क्षेत्र के महज 8 फ़ीसद माता-पिता ने महसूस किया कि उनके बच्चों के पास पर्याप्त ऑनलाइन पहुंच है।

यह सर्वेक्षण स्पष्ट करता है कि ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच हमारे देश में कितनी सीमित है। यह ध्यान देने वाली बात है कि यह सर्वेक्षण आर्थिक रूप से वंचित एकल परिवारों पर किए गए। इनमें से लगभग 60 फ़ीसद परिवार ग्रामीण क्षेत्रों के थे जिनमें लगभग 60 फ़ीसद दलित या आदिवासी समुदाय के थे। इन नतीजों से यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि आज भी भारतीय घरों में बच्चों के पढ़ाई के लिए स्कूल ही एकमात्र उपाय है। इसके अलावा यह भी स्पष्ट है कि दलित और आदिवासी समुदायों के जीवन को कोविड-19 और सरकारी नीतियों ने और कितना अधिक कठिन बना दिया है। ग्रामीण वंचित तबके आज भी शहरी चकाचौंध और आम हो चुके कई सुविधाओं से कोसो दूर हैं।

कोरोना महामारी के बाद जहां धीरे-धीरे व्यवसाय, आम चिकित्सा, रोज़मर्रा की ज़िंदगी शुरू हो चुकी है। वहीं, बड़ी तादाद में बच्चों की शिक्षा पीछे छूट गई है। भले आज चुनिंदा राज्यों में स्कूल फिर से खुल रहे हो, लेकिन लगभग दो साल के लंबे अंतराल में बच्चों का पहले का पढ़ा या सीखा भूल जाना स्वाभाविक तौर पर सामने आ रहा है।

डिजिटल दुनिया तक पहुंच न होने के कारण ग्रामीण और हाशिए पर जी रहे समुदाय न सिर्फ सरकारी नीतियों बल्कि शिक्षा, चिकित्सा और बुनियादी जरूरतों से भी दूर होते हैं। अक्सर आर्थिक रूप से वंचित परिवार में एक से अधिक स्मार्टफोन लेना मुश्किल होता है और स्वाभाविक तौर पर इसे कामकाजी पुरुष को दे दी जाती है। ऐसी स्थिति में बच्चों के पास खुद का मोबाइल होना और उससे ऑनलाइन शिक्षा असंभव ही होता है। एक ऐसे समय में जब सरकार खुद डिजिटल इंडिया की रट लगाए हुए है, साल 2017-18 की एनएसएस की 75वीं दौर की रिपोर्ट बताती है कि देश में सिर्फ 24 फ़ीसद परिवारों के पास इंटरनेट की पहुंच है। इनमें 15 फ़ीसद ग्रामीण परिवार की तुलना में 42 फ़ीसद शहरी घर हैं।

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कोरोना से पहले शिक्षा की स्थिति और शैक्षिक असमानता

हालांकि ऐसा नहीं है कि भारत में बच्चों का संज्ञानात्मक विकास उल्लेखनीय रहा है, लेकिन कोरोना महामारी मुश्किल से हासिल की गई उपलब्धियों को भी चुनौती दे रहा है। साल 2019 के न्युअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) के अनुसार पहली कक्षा के सभी बच्चों में 4 और 5 साल का कोई भी बच्चा पहली कक्षा के स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाता था। इसी तरह, पहली कक्षा में महज 41 फ़ीसद बच्चे 2 अंकों की संख्या को पहचान सकते थे और तीसरी कक्षा में 72 फ़ीसद बच्चे ऐसा कर सकते थे। गौरतलब हो कि एनसीईआरटी के सीखने के परिणामों (लर्निंग आऊटकम्स) के विवरण अनुसार, पहली कक्षा के बच्चों को 1 से 99 तक संख्याएं पहचानने में सक्षम होना चाहिए। हमारे समाज में अमीर और आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों में जन्म लेने वाले बच्चे अच्छे अंग्रेज़ी निजी स्कूलों में शिक्षा के लिए जाते हैं। ऐसे में उन्हें छोटी कक्षा की सुविधाएं, अच्छे शिक्षक और फलस्वरूप अच्छे परिणाम मिलते हैं। इन छात्रों को अपनी विरासत में मिले विशेषाधिकार को बढ़ाने के लिए कई अवसर मिलते हैं या दिए जाते हैं।

इसके विपरीत, गरीबी में जन्मे बच्चे पहले से ही कुपोषण या सुविधाओं से वंचित सरकारी या सस्ते निजी स्कूल तक पहुंचते हैं जहां प्रशिक्षित और योग्य शिक्षकों, पाठ्यपुस्तकों और यहां तक कि शौचालयों की भी कमी होती है। देश में सबसे अमीर परिवार की लड़कियों के लिए शिक्षा के औसतन 9.1 वर्षों की तुलना में सबसे गरीब परिवार की लड़कियों का शिक्षा प्राप्त करने की औसत वर्ष शून्य है। भारत में आम तौर पर शिक्षा व्यवस्था आय, जाति, लिंग या बहिष्कार के अन्य कारकों के बल पर चलती है और बच्चों के बीच भेदभाव करती है। इस तरह पंक्ति में खड़े सबसे आखिरी बच्चे तक शिक्षा के लिए सभी सुविधाओं को मुहैया कराना और भी कठिन हो जाता है। वैश्वीकरण और व्यावसायीकरण के दौर में आज अच्छी शिक्षा का मतलब सिर्फ स्कूल, शिक्षक और किताब नहीं रह गया है। अच्छे स्कूलों, शिक्षा और उसके संसाधनों पर पहला अधिकार आर्थिक, जातिगत और सामाजिक रूप से सम्पन्न परिवारों का हो चुका है जिससे सालों से चली आ रही असमानता को बढ़ावा मिलता है। ऑक्सफैम की पावर ऑफ एजुकेशन टु फाइट इनईक्वालिटी रिपोर्ट के अनुसार भारत जैसे विकासशील देशों में एक अमीर परिवार के बच्चे की तुलना में एक गरीब परिवार के बच्चे के माध्यमिक स्कूल की पढ़ाई करने की संभावना सात गुना तक कम होती है।

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हमारे समाज में अमीर और आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों में जन्म लेने वाले बच्चे अच्छे अंग्रेज़ी निजी स्कूलों में शिक्षा के लिए जाते हैं। ऐसे में उन्हें छोटी कक्षा की सुविधाएं, अच्छे शिक्षक और फलस्वरूप अच्छे परिणाम मिलते हैं। इन छात्रों को अपनी विरासत में मिले विशेषाधिकार को बढ़ाने के लिए कई अवसर मिलते हैं या दिए जाते हैं।

कोरोना, बच्चों की शिक्षा और उससे जुड़ी समस्याएं  

लॉकडाउन के बाद से भारत में अधिकतर स्कूल-कॉलेज लगभग 17 महीनों से बंद हैं। निश्चित तौर पर हर परिवार बच्चे को खुद पढ़ाने के लिए योग्य या संपन्न नहीं होता। इसलिए इतने लंबे अंतराल तक बंद रहे स्कूलों का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव होना ही स्वाभाविक है। शिक्षा का सीधा संबंध अच्छा स्वास्थ्य, अच्छे रोज़गार, बाल विवाह, बाल श्रम और लैंगिक असमानता जैसी मूलभूत समस्याओं से है। कोरोना महामारी ने भारत में हिंसा और गरीबी को अस्वाभाविक रूप में बढ़ा दिया है। महामारी के पहले साल के लॉकडाउन के बाद एकाएक लोगों के आय में या तो भारी कमी हुई या बंद हो गई। यूनिसेफ़ ने पिछले साल भारत में बच्चों के जीवन पर कोविड-19 के प्रभाव पर एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट के अनुसार परिवारों में मुख्य वेतन कमाने वालों में से लगभग तीन-चौथाई यानि 74 फ़ीसद लोगों ने बताया कि उनकी मासिक आय लॉकडाउन के पहले के समय से कम हो चुकी है। नकद सहायता प्राप्त करने वाले लगभग दो-तिहाई परिवारों ने बताया कि यह सहायता भोजन की लागत और अन्य घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं था। लगभग 75 फ़ीसद प्रतिभागियों ने बताया कि महामारी के कारण उनके परिवार पर कर्ज़ हो चुका है और लगभग आधे ने अपना निजी सामान बेचने की सूचना दी।

चूंकि पढ़ाई के लिए कई अन्य इंतज़ामों की जरूरत होती है, आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवारों के पास पैसे बचाने का सबसे आसान उपाय बच्चों की पढ़ाई बंद करवानी होती है। इसी तरह, आर्थिक तंगी में पढ़ाई नहीं कर रहे बच्चों को कमाने के लिए इस्तेमाल करने या लड़कियों की कम उम्र में शादी कर घर खर्च बचाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। यह ध्यान देने वाली बात है कि स्कूल सर्वेक्षण में अधिकतर माता-पिता बच्चों को दी गई ऑनलाइन अध्ययन सामग्री से संतुष्ट नहीं थे। लॉकडाउन के दौरान टीवी आधारित शिक्षा में केवल 1 फ़ीसद ग्रामीण और 8 फ़ीसद शहरी बच्चों ने टीवी कार्यक्रमों को नियमित या कभी-कभार अध्ययन के लिए देखने की बात बताई। कई परिवारों के पास टीवी या मोबाइल न होने के साथ-साथ खराब कनेक्टिविटी, इंटरनेट के लिए पैसों की कमी, ऑनलाइन अध्ययन बच्चों के समझ से परे होना, स्कूल द्वारा कोई ऑनलाइन सामग्री नहीं भेजा जाना या अन्य कई कारणों से बच्चों की शिक्षा बाधित होती रही। आर्थिक तंगी में माता-पिता ने अपने बच्चों के लिए निजी स्कूलों के बजाय सरकारी स्कूलों का रुख़ किया क्योंकि या तो ऑनलाइन शिक्षा उनकी आय से बाहर थी या बच्चों की समझ से परे। बहरहाल, अलग-अलग आर्थिक, सामाजिक पृष्ठभूमि से आ रहे बच्चों के लिए स्कूल का विकल्प केवल ऑनलाइन शिक्षा में तय करना कोई हल नहीं हो सकता।

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तस्वीर साभार : NDTV

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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