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पिछले साल कोरोना की पहली लहर के बाद अचानक लॉकडाउन होने के कारण लाखों प्रवासी मजदूर पैदल घर लौटने को मजबूर हो गए थे। मेनस्ट्रीम मीडिया भी उनकी त्रासदी को नज़रअंदाज़ कर रहा था। कोरोना की स्थिति में थोड़ा ठहराव आने के बाद कई मजदूर रोज़गार की तलाश में दोबारा शहरों में लौट चले थे। लेकिन इस साल कोरोना की दूसरी लहर की शुरुआत होते ही प्रवासी श्रमिक लॉकडाउन की आशंका में वापस लौटने लगे। बस अड्डे और रेलवे प्लेटफॉर्म पर उमड़ी भीड़ और घर लौटने की जद्दोजहद को देख यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि दिहाड़ी मजदूर के लिए कोरोना काल कितना कठिन और भयावह है। विकिपिडिया में भले आज कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय कामगार प्रवासी के लिए एक अलग से पेज बन चुका हो, लेकिन एक साल बाद भी सुप्रीम कोर्ट को इनकी बुनियादी ज़रूरतों के लिए सरकार को निर्देश देने पड़ रहे हैं।

बीते सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को प्रवासी श्रमिकों और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वालों के पंजीकरण में तेज़ी लाने के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि न केवल प्रवासी कामगारों को पंजीकरण के लिए सरकार से संपर्क करना चाहिए, बल्कि सरकार को भी उनसे संपर्क करना चाहिए। द टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को यह भी निर्देश दिया कि वे देश में कहीं भी फंसे प्रवासी श्रमिकों को सूखा राशन या पका हुआ भोजन उपलब्ध कराए। इस अप्रैल श्रम और रोजगार मंत्रालय ने घोषणा की थी कि पिछले वर्ष लॉकडाउन के दौरान लाखों श्रमिकों द्वारा उपयोग किए गए 20 नियंत्रण कक्ष, श्रम विभाग के अधिकारियों के समन्वय से विभिन्न राज्यों में दोबारा शुरू किया जाएगा। प्रवासी मजदूरों के लिए काम कर रही संस्था स्ट्रानडेड वर्कर्स एक्शन नेटवर्क (स्वान) को अप्रैल से मई 2021 के बीच 10,092 श्रमिकों और उनके परिवारों से सहायता के लिए अनुरोध आए। इनकी मदद के लिए नियंत्रण कक्षों के संपर्क के माध्यम से प्रवासी श्रमिकों के आजीविका संकट की बेहद गंभीर तस्वीर सामने आई।

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स्वान के अनुसार इनसे संपर्क करने वाले श्रमिकों की कुल संख्या में से 6,176 महिलाएं और बच्चे थे। इन तक पहुंचने वाले कुल श्रमिकों की औसत दैनिक मजदूरी 425 रुपए थी। करीब 58 फीसद श्रमिकों के पास दो दिन से भी कम का राशन बचा था। लगभग 76 प्रतिशत लोगों के पास 300 रुपए बचे थे और 65 प्रतिशत लोगों के पास 200 रुपए थे। 55 प्रतिशत लोगों ने सिर्फ 100 रुपए होने की जानकारी दी। लगभग 33 प्रतिशत श्रमिकों ने जानकारी दी कि उनका बकाया वेतन नहीं दिया गया था जबकि 15 प्रतिशत को आंशिक भुगतान किया गया था। 92 फीसद श्रमिकों ने बताया कि काम बंद होने के बाद से उन्हें अपने मालिकों से कोई पैसा नहीं मिला है। काम, आय और सामाजिक सुरक्षा के बिना कोरोना महामारी ने पहले से हाशिए पर जी रहे देश की श्रम शक्ति को घोर गरीबी और अभाव को झेलने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि स्वान कार्यकर्ताओं को सरकार के किसी भी प्रवासी कामगार को हर तरह की मदद के वादे के विपरीत प्रतिक्रियाए मिली। नियंत्रण कक्ष के अधिकांश श्रम अधिकारियों ने कहा कि वे केवल उन श्रमिकों के मामलों को हल कर सकते हैं जो केंद्र सरकार की परियोजनाओं पर कार्यरत हैं।

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समाज के वंचित तबकों के लिए कोरोना की दूसरी लहर बेरोजगारी, भुखमरी और आर्थिक तंगी की दूसरी लहर बनकर आई है।

भारत में साल 1979 से ही अंतर्राज्यीय प्रवासी कामगारों की सुरक्षा के लिए अंतर-राज्य प्रवासी कामगार (रोजगार और सेवा की शर्तों) का अधिनियम मौजूद है। यह पांच या उससे अधिक अंतर राज्यीय श्रमिकों को रोजगार पर रखने वाले सभी प्रतिष्ठानों और ठेकेदारों पर लागू होता है। इस अधिनियम को अब व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति (ओएसएच) कोड 2020 के तहत समाहित कर दिया गया है। ऐसी अलग-अलग योजनाओं के होने के बाद भी श्रमिकों या किसानों की दयनीय स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार होते नहीं दिख रहा। बीते साल लॉकडाउन के वक्त केंद्र सरकार का यह मानना कि कुल प्रवासी श्रमिकों का आधिकारिक आंकड़ा रखना संभव नहीं, उनके सामाजिक सुरक्षा के नियमों और सुविधाओं का लाभ ना उठा पाने का एक अहम कारण है। जहां कोरोना महामारी के शुरुआत से ही शहरों की चर्चा हुई, आज ग्रामीण भारत भी इससे अछूता नहीं है। द वायर में छपी एक खबर में दशकों से खाद्य सुरक्षा और गरीबी के मुद्दों पर काम कर रहे मेघना मुंगिकर, ज्यां द्रेज़ और रीतिका खेरा ने भारत की लगभग 8 फीसद आबादी यानी 108.4 मिलियन लोगों के पब्लिक डिस्ट्रब्यूशन सिस्टम से बाहर होने का अनुमान लगाया है। कई राज्यों में काम कर रहे श्रमिकों के पास तत्काल राशन कार्ड ना होने के कारण भी खाद्य संकट गहराता नजर आ रहा है। किसी भी प्रवासी श्रमिक नीति को प्रभावी तौर पर विकसित या लागू करने के लिए पुख्ता आंकड़े का होना महत्वपूर्ण है।

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कोरोना के साये में पिछले छह महीनों से चल रहा किसान आंदोलन की कवरेज भी लगभग धीमी हो गई हो लेकिन उनकी मांगों पर सरकार की ओर से अब तक कोई निश्चित जवाब नहीं आया है। किसान यूनियन संयुक्त मोर्चा ने आंदोलन के छह महीने के समापन पर 26 मई को ‘काला झंडा दिवस’ घोषित किया। बीबीसी की रिपोर्ट अनुसार 40 किसान संगठनों के समूह संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखकर तत्काल उनके साथ संवाद दोबारा शुरू करने को कहा है। बता दें कि बीते चार महीनों से सरकार और प्रदर्शन कर रहे किसानों के बीच कोई संवाद नहीं हुआ है। जबकि सीमाओं पर किसान अब भी आंदोलन कर रहे हैं, पर मेनस्ट्रीम मीडिया की खबरों और सरकार की एजेंडा से वे गायब हो चुके हैं। गांवों की ओर रुख करें, तो भी किसानों की स्थिति संतोषजनक नहीं है। लगातार लॉकडाउन के बीच अब किसानों को कहीं मजदूरों की कमी के कारण फसल की रोपाई और कटाई में समस्या एवं कहीं बाज़ार या मंडी के बंद रहने के कारण फसल को ना बेच पाने से आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। हालांकि महामारी के बाद कृषि ही एक ऐसा क्षेत्र था जो इससे सबसे कम प्रभावित हुआ था। लेकिन कोरोना की दूसरी लहर का असर रबी फसल पर पड़ा है और इसका असर आगामी खरीफ फसल पर भी पड़ सकता है।

ग्रामीण भारत की बेरोज़गारी की बात करें, तो सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) के आंकड़ों के मुताबिक, 9 मई को खत्म हुई सप्ताह में ग्रामीण भारत का बेरोजगारी दर 7.29 प्रतिशत से बढ़कर 16 मई को खत्म हुई सप्ताह में 14.34 प्रतिशत पर पहुंच चुका था। CMIE की एक रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल में ग्रामीण भारत में रोज़गार को केंद्र सरकार के मनरेगा से पर्याप्त समर्थन मिला। इस दौरान मनरेगा योजना के अंतर्गत जुलाई 2020 के बाद से सबसे अधिक 341 मिलियन लोगों को रोजगार मिला। जबकि ग्रामीण भारत की बेरोजगारी दर शहरों के मुकाबले संभली हुई थी, पर मई के महीने से इसमें अचानक बढ़ोतरी दिखाई देने लगी। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2021: वन इएर ऑफ कोविड-19 अध्ययन अनुसार पिछले एक वर्ष में कोविड-19 के परिणामस्वरूप देश में गरीब परिवारों की संख्या में 77 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। यह हैरान और परेशान करने वाली बात जरूर है कि आधी से अधिक आबादी का ग्रामीण भारत में रहने के बावजूद पिछले दिनों सरकार की कुछ योजनाओं के अलावा इनकी मदद के लिए ना तो सोशल मीडिया पर गुहार लगाई गई। ना तो कोई खिलाड़ी या बॉलीवुड सितारों ने इनके लिए चंदा इकट्ठा करने कोई कार्यक्रम आयोजित किए। विभिन्न देशों से मिले दान भी आक्सिजन कॉन्सेनट्रेटर, सिलिन्डर या दवा के लिए थे। जहां सरकार मीडिया द्वारा सवाल उठाए जाने पर अब इन चीजों के वितरण की जानकारी दे रही है, वहीं ग्रामीण भारत की कड़वी छवि स्वीकारने को सरकार खुद भी तैयार नहीं है।

भारत में कोरोना की दूसरी लहर पहले से कहीं अधिक घातक सिद्ध हो रही है। जहां शहरों में आम जनता चिकित्सकीय कमी, कुशासन और अनिश्चितता के चपेट में है। वहीं ग्रामीण भारत सिर्फ वैक्सीन की होड़ में ही पीछे नहीं छूट रहे। इनके आय और संसाधनों तक पहुंच की कमी के कारण आने वाले दिनों में स्थिर अर्थव्यवस्था और सुनहरे भारत के परिदृश्य में इनका ना दिखना ही स्वाभाविक होगा। ग्रामीण भारत में वैक्सीन या कोरोना को लेकर अंधविश्वास, वैक्सीन के प्रति झिझक या अस्पताल का ही नदारद होना, इनको नजरंदाज़ किए जाने की गवाही दे रही  है। हालांकि अब सोशल मीडिया पर एस ओ एस कॉल की कमी हो रही है, लेकिन डिजिटल दुनिया से दूर गांवों की जरूरत की पुकार ट्विटर या इंस्टाग्राम पर सुनाई नहीं देती। समाज के वंचित तबकों के लिए कोरोना की दूसरी लहर बेरोजगारी, भुखमरी और आर्थिक तंगी की दूसरी लहर बनकर आई है। आज इन लोगों की स्थिति एक दूसरे की तुलना में कुछ अच्छी या बदतर होने के बावजूद, समान सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में बंधे होने के कारण इन्हें एक गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए किए जाने वाले संघर्ष के अनुभव एकजुट करती है। 

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तस्वीर साभार : Indian Express

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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