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सितंबर के आखिरी हफ्ते में जीवित्पुत्रिका व्रत उत्तर भारत में मनाया जाएगा। बचपन से ही मैंने अपने घर की महिलाओं को यह व्रत करते हुए देखा लेकिन सिर्फ़ उन्हीं महिलाओं को जिनके बेटे हो, जिन महिलाओं को बेटियां होती वे महिलाएं यह व्रत नहीं करती और न ही विधवा महिलाएं ये व्रत करतीं। कहा तो जाता है कि इस व्रत का मतलब संतान की सलामती है, लेकिन व्यवहार में इसे सिर्फ़ बेटे के लिए रखा जाता है। पहले मुझे लगता था कि बाक़ी व्रतों की तरह यह व्रत भी सिर्फ़ बेटों के लिए रखा जाता है, लेकिन जब इस व्रत के बारे में अपनी मां से इसके बारे में सवाल किया तो उन्होंने साफ़ कहा, “जो हम लोगों के बड़े-बुजु़र्ग करते आए है, हमें भी वही करना होगा। किताब में लिखने से क्या होता है।”

धर्म को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचाने में महिलाओं को हमेशा एक ज़रिया बनाया गया है। अब ज़माना भले ही बदल गया है, लेकिन धर्म को लेकर हमारी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है। यह वह धर्म है जिसे हमारे समाज ने अपने मतलब के लिए तैयार किया है। जीवित्पुत्रिका व्रत में मैंने सबसे ज़्यादा महिलाओं के साथ भेदभाव देखा, सिर्फ़ लैंगिक भेदभाव के आधार पर क्योंकि किसी महिला की बेटी है इसलिए वह ये व्रत नहीं कर सकती हैं। वह पूजा में शामिल तो होती हैं लेकिन उसकी भूमिका उन महिलाओं की अपेक्षा कमतर होती है जिनके बेटे हैं।

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बेटा-बेटी एक समान जैसे नारों और विचारों की हम लोग कितनी बातें कर लें, लेकिन व्रत और धर्म के नाम पर हमें बार-बार लैंगिक भेदभाव को क़ायम रखने और इसके तथाकथित फ़ायदे के बारे में बताया जाता है। ये व्रत-पूजन अपने आप में एक विशेषाधिकार जैसे होते हैं, जो महिलाओं को आपस में मज़बूती से बांटने का काम करते हैं। जो महिला पितृसत्ता की मज़बूत वाहक बनाना स्वीकार करती है, वह पूरे रौब के साथ इन व्रतों में हिस्सा ले सकती है। वहीं, जो महिलाएं विधवा हैं या इन व्रतों को नहीं मानती उन्हें ‘बुरी महिलाओं’ के ख़ेमे में खड़ा कर दिया जाता है।

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बेटा-बेटी एक समान जैसे नारों और विचारों की हम लोग कितनी बातें कर लें, लेकिन व्रत और धर्म के नाम पर हमें बार-बार लैंगिक भेदभाव को क़ायम रखने और इसके तथाकथित फ़ायदे के बारे में बताया जाता है।

हमारे गांव में परिवारों में यह भी रिवाज़ होता है कि जैसे ही बहु को बेटा पैदा होता है, उस साल बहुत धूमधाम से सास जीवित्पुत्रिका व्रत से जुड़ी चीज़ें अपनी बहु को देती है, इसमें गहने और कपड़े भी दिए जाते हैं। वहीं, अगर उस परिवार की दूसरी बहु को सिर्फ़ बेटी हो तो वह इस सम्मान से दूर हो जाती है। यह अनुभव अपने आप में स्त्रीद्वेष को बढ़ावा देता है। इस व्रत को वे बूढ़ी महिलाएं भी पूरी निष्ठा से निभाती हैं जिनके बेटे ने उन्हें घर से निकाल दिया या उन्हें किसी भी तरह का कोई सहयोग नहीं करता।

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धर्म के नाम पर हम पितृसत्ता को मज़बूत करते और पोसने वाले ऐसे कई व्रत, पूजन देख सकते हैं। वे पितृसत्ता के नियम को समाज में आज भी बनाए रखने के लिए मज़बूती से काम करते हैं और हम लोग सिर्फ़ यह कहकर इन व्रतों को करते हैं, “अरे सालभर का त्योहार है। एक दिन पूजा-व्रत कर ही लिए तो क्या हुआ?” बिल्कुल कुछ नहीं हुआ, लेकिन आपके इसदिन के व्रत से हमारी आने वाली पीढ़ियों को कितना नुक़सान होगा इसका अंदाज़ा हमें नहीं होता है।

हम यह भूल जाते हैं कि आने वाली पीढ़ियां भी शादी में बने रहने के लिए परी ज़िंदगी घरेलू हिंसा सहती रहेंगी क्योंकि अगर वे शादी से बाहर जाने का फ़ैसला लेती हैं तो व्रत-पूजन से भी उनका दामन छूट जाएगा और साल भर में आने वाले एक दिन पर्व उनके ज़िंदगी के हर दिन को हिंसा और भेदभाव झेलने को मजबूर करेंगे। इतना ही नहीं, आने वाले समय में इसी तरह बेटियां अनचाही होती रहेंगीं और फिर इस पितृसत्ता को ढोते हुए, बहु बनकर अपनी आने वाली बेटियों को अनचाही बनाएंगी।

पितृसत्ता बहुत बारीकी से भेदभाव और हिंसा को पोसने का काम सदियों से करती आ रही है जिसकी पहचान करना और उसे दूर करना हम लोगों की ज़िम्मेदारी है। मैं ख़िलाफ़ हूं इसके विशेषाधिकार के नियम से, जो दूसरे ही पल आधे से ज़्यादा लोगों के लिए मानसिक और शारीरिक हिंसा साबित होते हैं।

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तस्वीर साभार : Latestly

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