नर्सिंग की किताबों में पढ़ाया जा रहा,
नर्सिंग की किताबों में पढ़ाया जा रहा, "बदसूरत लड़कियों की शादी में मदद करता है दहेज"
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यह एक चौंकाने वाली बात है कि किसी कोर्स की किताब में दहेज प्रथा को समाज के लिए एक अच्छी रवायत बताया जाए। साथ ही कहा जाए कि दहेज ‘बदसूरत’ दिखनेवाली लड़कियों के माता-पिता को उनकी शादी करवाने में मदद करता है। दहेज प्रथा की ख़ासियत और फायदे को बतानेवाली एक किताब की तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। यह किताब नर्सिंग के विद्यार्थियों के लिए है, जिसे भारतीय नर्सिंग परिषद के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। यह बात ‘टेक्स्ट बुक ऑफ सोशोलॉजी फॉर नर्सिंग’ में लिखी गई है, जिसे टी.के. इंद्राणी ने लिखा है। किताब को नई दिल्ली स्थित जेपी. ब्रदर्स मेडिकल पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड से प्रकाशित किया गया है।

एनडीटीवी में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक दहेज के फायदे बतानेवाली इस किताब के इस हिस्से की फोटो को शिवसेना नेता और राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर किया है जिसमें उन्होंने शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान से ऐसी चीजों को हटाने का आग्रह किया है। उन्होंने पाठ्यक्रम में ऐसी बातों के लिखे होने को देश और संविधान के लिए शर्म की बात तक कहा है।

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सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीर में लिखा है कि फर्नीचर, वाहन और रेफ्रिजरेटर जैसे उपकरणों के साथ दहेज नया घर स्थापित करने में मददगार है। दहेज का एक लाभ बताते हुए यह लिखा गया है कि यह लड़कियों के माता-पिता की संपत्ति में हिस्सा पाने का एक तरीका है। इसी तस्वीर में सबसे आखिरी प्वाइंट में यह बताया गया है कि दहेज प्रथा बदसूरत दिखने वाली लड़कियों की शादी करने में मदद कर सकती है। दहेज को अप्रत्याशित लाभ बताया गया है।     

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डेक्कन हेराल्ड के अनुसार भारतीय नर्सिंग परिषद ने वायरल तस्वीर पर एक नोटिस जारी किया है। नर्सिंग पाठ्यक्रम की किताब के इस पेज के बारे में लिखते हुए भारतीय नर्सिंग परिषद ने कहा है कि देश के कानून के खिलाफ किसी भी अपमानजनक सामग्री की कड़ी निंदा करता है। साथ ही लिखा है कि भारतीय नर्सिंग परिषद की नीति के अनुसार किसी भी ऐसे लेखक या प्रकाशन का भी समर्थन नहीं करती है और न ही किसी लेखक को अपने प्रकाशनों के लिए भारतीय नर्सिंग परिषद के नाम का उपयोग करने की अनुमति देती है। 

सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीर में लिखा है कि फर्नीचर, वाहन और रेफ्रिजरेटर जैसे उपकरणों के साथ दहेज नया घर स्थापित करने में मददगार है। दहेज का एक लाभ बताते हुए यह तक लिखा गया है कि यह लड़कियों के माता-पिता की संपत्ति में हिस्सा पाने का एक तरीका है। इसी तस्वीर में सबसे आखिरी प्वाइंट में यह बताया गया है कि दहेज प्रथा बदसूरत दिखने वाली लड़कियों की शादी करने में मदद कर सकती है।  

नर्सिंग की किताब में छपने का क्या है संदेश

भारत में नर्सिंग के पेशे में बड़ी संख्या में महिलाएं जुड़ी हुई हैं। नर्सिंग से जुड़ी समाजशास्त्र की किताब में ऐसी बातों का सामने आना और भी बड़ी समस्या को दिखाता है। किताबों के ज़रिये सीधे-सीधे पितृसत्ता के पाठ को औपचारिक तरीके से पढ़ाया जा रहा है। साथ में दहेज देने के कारण ही ‘बदसूरत लड़कियों’ की शादी हो सकती है जैसी मानसिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है। सुंदरता और बदसूरती के पाठ को भी किताबों में पढ़ाया जाना लड़कियों को रूढ़िवाद की शिक्षा देना है। यह किताब सुंदरता के उन्हीं पैमानों में जाकर एक व्यक्ति को माप रही है जिसे पितृसत्ता द्वारा तय किया गया है। 

भारतीय समाज में सुंदरता के कई किस्म के रूढ़िवादी पैमाने बनाए हुए हैं। जो लड़कियां इन पैमानों पर नहीं खरी उतरती हैं उनको सीधे-सीधे ‘बदसूरत’ कहकर नकार दिया जाता है। लड़की छोटी, काली, सांवली और मोटी है तो उसके पिता को लड़की के बचपन से ही कहा जाता है कि दहेज का ज्यादा इस्तेमाल करना होगा। नर्सिंग किताब में दहेज पर लिखी बातें समाज की पितृसत्तात्मक, रंगभेदी सोच को सही ठहराने का भी काम करती दिखती हैं। साथ ही ‘बदसूरत’ जैसे शब्द का इस्तेमाल कर नस्लभेद को भी बढ़ावा देती नज़र आती है। गोरे रंग को सुंदरता से जोड़ा जाता है। ऐसे में इसी पाठ्यक्रम को पढ़ने वाली लड़की यदि गोरी नहीं है तो यह उसके आत्मविश्वास को भी कम करने का काम कर सकती है।

स्कूली पाठ्यक्रम में दहेज को लेकर इस तरह की बात छपना भारतीय संविधान की अवहेलना भी है। स्कूली पाठ्यक्रमों में अक्सर दहेज प्रथा के कानूनी पहलू के बारे जानकारी दी ही नहीं जाती है।     

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किताबों में यह छपना कितनी बड़ी लाहपरवाही

ऐसा कुछ विवादस्पद किताबों में छपा हो यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी कभी प्रश्नपत्रों में तो कभी किसी किताब में ऐसी गलतियां देखने को मिलती है जो साफ-साफ रूढ़िवादी सोच को बढ़ावा देने का काम करती है। किताबों में इस तरह की बातें छपना लाहपरवाही तो दिखाती है। पाठ्यक्रम में प्रगतिशीलता से अलग दकियानूसी बातों को बढ़ावा देना शिक्षा तंत्र में शामिल पिछड़ेपन को भी साफ दिखता है। साथ ही बड़े पदों पर बैठी पितृसत्तात्मक मानसिकता को भी। इस तरह की बातों को किताब में शामिल होने की खबरें लगातार आना यह भी समझाता है कि पाठ्यक्रम तय करने वाली कमिटी को ऐसी बातें इसलिए गलत नहीं लगती है क्योंकि उनके भीतर खुद रूढ़िवाद की गहरी पैठ है।  

स्कूली पाठ्यक्रम में दहेज को लेकर इस तरह की बात छपना भारतीय संविधान की अवहेलना भी है। स्कूली पाठ्यक्रमों में अक्सर दहेज प्रथा के कानूनी पहलू के बारे जानकारी दी ही नहीं जाती है। भारतीय संविधान के अनुसार भारत में दहेज लेना और देना दोनो अपराध है। मगर किताबों में दहेज प्रथा के कानून पर बेसिक नोट्स को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया जाता है। वर्तमान समय में किताबों में दहेज प्रथा के पक्ष में छपी ये बातें भारतीय समाज का असली चेहरा भी दिखाता है जो दहेज को परंपरा मानता है। इसलिए किताबों में इसके पक्ष में लिखी बातें सिर्फ दहेज जैसी कुरीति का प्रचार है।

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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