मृत्यु भोज की प्रथा पर रोक है ज़रूरी
तस्वीर साभार: Patrika
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मेरा जन्म बिहार राज्य में तो नहीं हुआ लेकिन मेरी शादी बिहार के वैशाली ज़िले के महुआ ब्लॉक में हुई है। गांव का नाम है भागवतपुर तरौरा। यहां मैंने मृत्यु भोज की व्यवस्था को बेहद करीब से देखा है। कुछ समय पहले मेरे दादा ससुर की मौत हुई थी, इस कारण मैं इस प्रथा को करीब से देख पाई। हालांकि, जीवन और मृत्यु पर किसी का वश नहीं चलता लेकिन फिर भी किसी भी परिवार के लिए ये बहुत ही दुख की घड़ी होती है जिससे उबरने में समय लगता है। परिवार-समाज के लोग आपके दुख में शामिल होकर इसे कम करने में मदद करते हैं जो कि काफी सराहनीय है। जब भारत में किसी की मृत्यु होती है ख़ासकर हिंदू धर्म में तो देश के हर हिस्से में कुछ रीति रिवाज हैं जो मौत के बाद किए जाते हैं। मुखाग्नि से लेकर अस्थि विसर्जन तक की अलग-अलग प्रकियाएं शामिल होती हैं। इसके बाद बारी आती है मृत्यु भोज की जो की अगल-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रकार से सम्पन्न होती है।

मैं बार-बार बिहार का ही ज़िक्र इसलिए कर रही हूं क्योंकि मैं जिस राज्य (मध्य प्रदेश) आती हूं वहां मैंने इस प्रकार की प्रथा नहीं देखी, इसलिए मेरा ध्यान इस ओर गया। मैंने सबसे पहले देखा की जब मृत्यु प्राप्त कर चुके व्यक्ति को दाह-संस्कार के लिए गंगा के घाट ले जाया जाता है तो साथ में समाज के लोग भी जाते ही हैं। जब क्रिया पूरी हो जाती है तब लोग घाटों पर मौजूद जलपान की दुकानों के आसपास इकट्ठे होकर नास्ता (समोसा, जलेबी, लिट्टी) जो भी उपलब्ध हो खाते हैं। इसके पैसे उस व्यक्ति को अदा करने होते हैं जिसने कुछ समय पहले अपने प्रियजन को इस दुनिया से अलविदा किया है। यह कैसी प्रथा है, यह बात मेरी समझ से परे है।

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इस दुख की घड़ी में बजाय किसी प्रकार की मदद के लोग उन पर आर्थिक बोझ और डाल रहे होते हैं। इतना ही नहींं यह प्रकिया यहीं नहीं रुकती। इसके बाद जिस दिन ‘शुद्धता’ होती है उस दिन से खाने की जो शुरुआत होती है वह 13वें दिन तक चलती है। लगभग चार दिन का दोनों वक्त का भोजन पूरे खानदान और रिश्तेदार को खिलाया जाता है। और तो और हर घर के मर्द उनके घर पर खाने जाते हैं और औरतों के लिए भी समय से खाने को घर पर पहुंचाया जाता है। यह कैसी प्रथा है जिस में लोगों ने किसी की मृत्यु को बढ़िया खाना खाने का एक अवसर बना लिया है। 

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मृत्यु भोज आज लोगों के ऊपर आर्थिक बोझ बढ़ा रहा है। समाज के प्रभाव में आकर हर व्यक्ति को यह करना पड़ रहा है चाहे वह इसमें समर्थ हो या न हो। 

किसी की मौत हो जाने पर कोई भी परिवार वैसे भी बहुत दुख की स्थिति में होता है क्योंकि उन्होंने अपने परिवार के एक सदस्य को खोया है। वह व्यक्ति ढंग से इसका दुख नहीं मना पाता क्योंकि उसे समाज के लोगों को भोज करवाने की चिंता सता रही होती है। कई दफा तो सुना होगा आपने कि कुछ लोग ज़मीन बेचकर या उधार लेकर मृत्यु भोज करवाते हैं। ये सब कितना दुखद है। 

जो व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत है उसके लिए तो ये सब करना कोई समस्या नहीं है वह एक गांव नहीं पूरे 12 गाँव का भोज करवाए। ऐसा करने के लिए वह स्वतंत्र है लेकिन जो आर्थिक रूप से कमजोर है उनका क्या? आज हर कोई सिर्फ दिखावे के नाम पर इस प्रथा को आगे बढ़ाने के लिए मजबूर है। मृत्यु भोज आज लोगों के ऊपर आर्थिक बोझ बढ़ा रहा है। समाज के प्रभाव में आकर हर व्यक्ति को यह करना पड़ रहा है चाहे वह इसमें समर्थ हो या न हो। 

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सामाजिक बहिष्कार की ज़रूरत

जब कोई सामाजिक बुराई किसी भी गांव या शहर पर पूरी तरह से हावी हो जाए तो उस बदलने के लिए समाज के हर व्यक्ति को एकजुट होकर इसके लिए पहल करनी पड़ती है। तभी जाकर ऐसी प्रथाओं को खत्म किया जा सकता है। ज़रूरत है कि न लोग अब मृत्यु भोज खाएं और न ही खिलाएं। अगर कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से सबल है तो वह अपने प्रियजन की मृत्यु के बाद उनकी याद में समाज के विकास में किसी भी प्रकार का योगदान दे सकता है। जैसे गांव के लिए एंबुलेंस की सुविधा, सार्वजनिक पुस्तकालय का निर्माण, सार्वजनिक भवन निर्माण, स्कूल में ड्रेस वितरण पौधारोपण, ज़रूरतमंदों की मदद। कहने का तात्पर्य है कि किसी की प्रियजन की मौत के बाद उनके लिए बहुत कुछ है जो किया जा सकता है, अगर समाज के लोग करना चाहे तो। इसके लिए सभी को एकजुट होकर इस व्यवस्था को चुनौती देनी होगी। इस प्रथा का सभी को इसके विरोध करना होगा और इसके बारे में जागरूकता फैलानी होगी।

किसी की मौत हो जाने पर कोई भी परिवार वैसे भी बहुत दुख की स्थिति में होता है क्योंकि उन्होंने अपने परिवार के एक सदस्य को खोया है। वह व्यक्ति ढंग से इसका दुख नहीं मना पाता क्योंकि उसे समाज के लोगों को भोज करवाने की चिंता सता रही होती है। कई दफा तो सुना होगा आपने कि कुछ लोग ज़मीन बेचकर या उधार लेकर मृत्यु भोज करवाते हैं।

सरकार के हस्तक्षेप की ज़रूरत

जब  किसी समाज में कोई कुरीति या कुप्रथा बुरी तरह से फैली हुई होती है तब सरकार को इसमें आगे आकर इसके खिलाफ़ कानून बनाने की आवश्यकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर कोई सामाजिक कार्यकर्ता या कोई भी व्यक्ति लोगों को इस बारे में समझता है तो ज़रूरी नहीं है कि लोग उनकी बात मानें। ऐसे में सरकार का हस्तक्षेप इन प्रथाओं को खत्म करने में अहम भूमिका निभा सकता है। इसलिए सरकार को मृत्यु भोज पर प्रतिबंध लगाने की ज़रूरत है। तभी जाकर इस कुप्रथा से समाज को छुटकारा मिलेगा। देश में अन्य राज्यों को राजस्थान सरकार से प्रेरणा लेने की ज़रूरत है जिसने अपने राज्य में मृत्यु भोज पर प्रतिबंध लगाया है। राजस्थान ऐसा करनेवाला देश का पहला राज्य भी है।

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तस्वीर साभार: Patrika

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