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स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक और जहां अंग्रेज़ों से आज़ाद होने का आंदोलन चल रहा था, वहीं दूसरी ओर समानता और मौलिक अधिकारों पर भी बात हो रही थी। इसी कड़ी में सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का भी अंत हुआ और बाल-विवाह पर रोक लगाने की मांग भी उठने लगीं। जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ी, वैसे-वैसे शिक्षित महिलाओं ने महिला वर्ग के कल्याण की जंग भी शुरू कर दी। इन्हीं महान महिलाओं की सूची में नाम आता है कामिनी रॉय का जिन्होंने महिलाओं की शिक्षा के लिए अहम योगदान दिया। कामिनी रॉय एक नारीवादी कवयित्री, समाज-सेविका के साथ-साथ भारत की पहली महिला ग्रेजुएट भी थीं। आगे चलकर उन्होंने महिलाओं के अधिकारों की वकालत की।

शुरुआती जीवन

12 अक्टूबर, 1864 को बंगाल के बसुन्दा (अब बांग्लादेश में) नाम के गांव में कामिनी रॉय का जन्म हुआ। वह एक उच्च वर्गीय परिवार से संबंध रखती थीं। उनके पिता एक प्रतिष्ठित वैद्य, जज, और लेखक थे। वह ब्रह्मो समाज के सदस्य थे। उनके भाई कलकत्ता के मेयर थे और उनकी बहन नेपाल के राज घराने की चिकित्सक थीं। उनका परिवार काफी संपन्न था। कामिनी ने साल 1886 में बेथून कॉलेज में दाखिला लिया जहां उन्होंने संस्कृत में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। डिग्री खत्म होने के बाद उन्होंने बेथून कॉलेज में पढ़ाया भी। कॉलेज में ही उनकी मुलाकात अबला बोस से हुई जो कि महिलाओं को शिक्षा दिलाने के लिए लगातार प्रयास में लगी थीं। वह विधवा महिलाओं के लिए भी काम करती थीं। उन्होंने कामिनी को भी महिलाओं के हक़ के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। कामिनी का मानना था कि महिलाओं की पढ़ाई का उद्देश्य है कि उनका सर्वांगीण विकास हो। 

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नारीवाद और लेखन

नारीवादी होना कोई उपाधि नहीं है। कोई नारीवादी शुरू से नहीं होता, यह एक प्रक्रिया होती है जिसमें लगातार सीखना होता है। कामिनी में नारीवाद का आभास बचपन से ही था। वह अपने पिता की ढेरों किताबें पढ़तीं। छोटी उम्र से ही उन्होंने औरतों पर कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। कॉलेज में आकर उन्हें अपना नारीवाद की इस विचारधारा को और आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। साल1889 में प्रकाशित उनका काव्य संग्रह ‘आलो ओ छाया’ बहुत चर्चा में रहा। एक निबंध, विद्या के पेड़ का फल – में वह लिखती हैं, “पुरुष की राज करने की इच्छा महिलाओं की जागरूकता में एक मुख्य (अगर इकलौती नहीं) अड़चन है। वे माहिलाओं की स्वतंत्रता को बड़ी शक की निगाह से देखते हैं। क्यों? वही पुराना डर कि कहीं वे हमारी तरह न बन जाएं।”

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साल 1921 में कुमुदिनी मित्रा और मृणालिनी सेन के साथ वह बंगिया नारी समाज की नेत्री बनीं और महिला कल्याण के क्षेत्र में बढ़चढ़ कर काम किया। इस समाज के ज़रिए उन्होंने महिलाओं के मताधिकरों के लिए वकालत की। आखिरकार बंगाल विधान परिषद ने साल 1925 में महिलाओं को सीमित मताधिकार दिया जिसके कारण साल 1926 के आम चुनाव में महिलाओं ने अपने मताधिकार का इस्तमाल किया। 

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पुरस्कार और सम्मान 

कामिनी उस दौर में लेखकों के लिए एक प्रेरणा थीं। वह सबको लिखने के लिए प्रोत्साहित करतीं। साल 1930 में वे बंगाली लिटरेरी कांफ्रेंस की अध्यक्ष बनीं और 1932-33 में बंगिया साहित्य परिषद की उपाध्यक्ष बनीं। टैगोर का उनके जीवन और लेखनी पर खास प्रभाव पड़ा। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने उन्हें जगत तारिणी गोल्ड मेडल से भी नवाज़ा। महाश्वेता, जीवन पथ, निर्मलया, अशोक संगीत उनकी प्रमुख रचनाओं में से है। साल 2019 में, उनके 155वें जन्मदिन पर गूगल ने उनकी स्मृति में गूगल डूडल भी बनाया। कामिनी रॉय ने भारत में नारीवाद के मुद्दे पर एक अहम योदगान दिया। उनका एक सवाल था कि महिला को समाज में अपने हक़ की जगह छोड़कर घर में क़ैद क्यों होना पड़ता है?” इस सवाल को पूछे हुए एक सदी गुज़र गई और अभी तक हमें इसका जवाब नहीं मिला।

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सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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