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किसी भी मीडिया का एक प्रमुख काम सूचना को एकत्रित करना और उसे जन-जन तक पहुंचाना है। मीडिया किसी भी लोकतंत्र का एक ज़रूरी हिस्सा है जिसे अक्सर ‘चौथा स्तंभ’ माना जाता है। हालांकि, जिस चीज़ की अक्सर अनदेखी की जाती है वह यह है कि मीडिया का शासन किसके हाथों में है। भारत में मीडिया और भी अधिक विवादास्पद हैं। जवाहरलाल नेहरू ने मीडिया को लोकतंत्र का ‘वाचडॉग’ कहा था क्योंकि यह अपने नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने के साथ-साथ सरकार की जवाबदेही तय करता है। हालांकि, हम जानते हैं कि आज के दौर में कोई भी मीडिया किसी एजेंडा से मुक्त नहीं है। फ्रांस स्थित एनजीओ ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ द्वारा जारी 2021 वर्ल्ड फ्रीडम इंडेक्स कुल 180 देशों में से भारत को 142वीं रैंकिंग दी गई और भारत को पत्रकारिता के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक करार दिया गया।

पारंपरिक मीडिया जैसे कि रेडियो, टेलीविजन और समाचार पत्र दिन-प्रतिदिन अधिक संदिग्ध होते जा रहे हैं। न्यू मीडिया का उन मुद्दों को कवर करने और लोगों तक पहुंचाने की उम्मीद देता है जिन्हें अक्सर मुख्यधारा की मीडिया में अनदेखा कर दिया जाता है। एक अहम पहलू जिसकी अनदेखी अक्सर न्यू मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया दोनों जगह नज़रअंदाज़ किया जाता है वह है- जाति

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हमारे देश का पारंपरिक मीडिया पक्षपाती है और जाति-आधारित तथ्यों को अदृश्य करने पर आमादा है। इस कारण, ‘ऑनलाइन स्पेस’ यानि सोशल मीडिया लोगों को अपना असंतोष जताने के लिए एक अहम मंच प्रदान करता है।

पारंपरिक मीडिया से असहमति

प्रमुख पारंपरिक भारतीय मीडिया का संचालन उच्च जातियों द्वारा किया जाता है। ऑक्सफैम इंडिया NGO और न्यूज़लॉन्ड्री द्वारा किए गए एक संयुक्त शोध में यह पाया गया कि कुल 40 हिंदी-भाषा और 47 अंग्रेजी-भाषा के एंकरों में से चार में से हर तीन एंकर उच्च जातियों से थे। यह स्पष्ट रूप से हमारे देश की आबादी का अनुचित प्रतिनिधित्व है। यहां तक ​​​​कि दलित, बहुजन और आदिवासी संबंधित मुद्दों पर भी चर्चाएं, बहस, प्रोग्राम आदि उच्च जाति के ही एंकर करते हैं। अखबारों से लेकर चैनलों तक के संपादक अधिकतर उच्च जाति के ही पाए जाते हैं। हमारे देश का पारंपरिक मीडिया पक्षपाती है और जाति-आधारित तथ्यों को अदृश्य करने पर आमादा है। इस कारण, ‘ऑनलाइन स्पेस’ यानि सोशल मीडिया लोगों को अपना असंतोष जताने के लिए एक अहम मंच प्रदान करता है।

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जाति-पहचान ऑनलाइन व्यक्त करना

जाति और इसपर आधारित भेदभाव जितनी ज़्यादा बड़ी समस्या है, इस विषय पर उतनी ही कम चर्चा होती है। न तो पारंपरिक मीडिया इस पर ज़रूरी चर्चा करता है और न ही स्कूलों के पाठ्यक्रम में जाति के बारे में बच्चों को जागरूक किया जाता है। ऐसे में ऑनलाइन स्पेस में लोगों को वह मंच मिला है जहां वे अपनी बात रख सकते हैं। कई दलित, बहुजन और आदिवासी कलाकारों, संगीतकारों और लेखकों ने अपनी कला को प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर, रेडिट आदि का सहारा लिया है। उन्होंने विशेष रूप से अपनी जातिगत पहचान और जाति व्यवस्था के इर्द-गिर्द महत्वपूर्ण चर्चाएं शुरू की हैं। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर ऐसे ही कुछ अकाउंट्स हैं जो फिलहाल बेहतरीन काम कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर- अनुराग (माइनस) वर्मा, बफेलो इंटेलेक्चुअल, दलित कैमरा the big fatbao, योगेश मैत्रेय, Artedkar (राही पुण्यश्लोक), Bakery Prasad (सिद्देश गौतम)। ये तो सिर्फ चंद उदाहरण हैं, इनके अलावा भी कई दलित-बहुतन-आदिवासी सोशल मीडिया अकाउंट्स हैं जो बेहतरीन काम कर रहे हैं।

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इन प्लैटफॉर्म्स ने सोशल मीडिया के ज़रिये ब्राह्मणवादी अत्याचारों, जातिगत भेदभाव आदि के बारे में ऑनलाइन एक्टिविज़म को एक नया आयाम को दिया है। इसने सवर्ण लोगों के हाथों से जानकारी बनाने और उसे अपने तरीके से प्रचारित करने के विशेषाधिकार को चुनौती दी है। जाति व्यवस्था के बारे में जागरूकता पैदा करने वाले सोशल मीडिया अकाउंट्स ने शिक्षा को मजेदार और आकर्षक बना दिया है। इस के लिए वे मीम्स, रील्स, कहानियां, गाने, रैप, वीडियो निबंध और कला और मीडिया के ऐसे कई नए रूपों की मदद लेते हैं। तमिल दलित गीतकार और कलाकार अरिवु के गीत ‘एनजामी’ ने बीते दिनों काफी हलचल मचाई। यह गीत ‘वल्लियामल’ समुदाय द्वारा झेले जा रहे सदियों पुराने उत्पीड़न का विरोध है। इस गीत ने एक समुदाय के उत्पीड़न की ओर ध्यान आकर्षित करने के साथ-साथ संगीत के क्षेत्र में लोकप्रियता के कई मुकाम हासिल किए हैं।

बराबरी की राह अभी भी दूर है

हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि ऑनलाइन स्पेस किसी भी ब्राह्मणवादी आधिपत्य और जातिगत भेदभाव से मुक्त हैं। किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जातिगत ‘प्रिविलेज’ का खुला प्रदर्शन होता है। सोशल मीडिया के सामान्य ‘aesthetics’ उच्च जाति के लोगों के अनुसार ही होते हैं। विदेशी जगहों पर शूटिंग या ऐसे बैकग्राउंड का उपयोग करना, खुद को आकर्षक दिखाने के लिए फिल्टर का उपयोग करना, पश्चिमी गाने बजाना इत्यादि। द प्रिंट में लिखे एक लेख में अनुराग (माइनस) वर्मा इसे ‘mono-culture’ कहते हैं जो कि केवल सवर्ण के मानकों का सख्ती से पालन करती है ।

हालांकि एक बदलाव आ ज़रूर रहा है। धीरे-धीरे अधिक से अधिक लोग अपनी जातिगत पहचान के साथ सामने आ रहे हैं और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। दलित, बहुजन और आदिवासी अपने साथियों के हितों की पैरवी करने के लिए दूर-दूर तक अपने समुदाय के साथ एकजुट हो रहे हैं। सवर्ण राजनीतिक पहचान को चुनौती दी जा रही है। एक क्रांति उबल रही है।

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तस्वीर : रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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