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हमारे समाज में यह माना जाता है कि विज्ञान की जटिलताएं समझना महिलाओं के बस से बाहर की बात है। महिलाएं केवल कला और संस्कृति में ही पारंगत होती हैं। विज्ञान के प्रति अपनी लगन और जिज्ञासा जाहिर करती किसी लड़की को आज भी यह सुनने को मिल जाता है, “लड़की हो विज्ञान कम ही समझ आएगा।” इससे अलग देश में कई महिलाओं ने विज्ञान के क्षेत्र में अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर कई उपलब्धियां अपने नाम की हैं। अंतरिक्ष की सैर से लेकर समुद्र की गहराई को नापने में वे किसी से पीछे नहीं रही हैं। वर्तमान में विभिन्न खोज, मिसाइल कार्यक्रम और अनेक वैज्ञानिक अभियानों में महिला वैज्ञानिक अहम भूमिका निभा रही हैं। ऐसा ही एक नाम है मंगला मणि, जिन्होंने उम्र और लिंग के भेद को मिटाकर विज्ञान जगत में कई कीर्तिमान अपने नाम किए हुए हैं।

हैदराबाद के एक साधारण से परिवार से ताल्लुक रखने वाली मंगला मणि की विज्ञान में विशेष रुचि थी। वह इसी क्षेत्र में मानव उत्थान के लिए कुछ करना चाहती थीं। उनकी जिज्ञासाओं को पंख लगाने का काम उनके परिवार ने किया। छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी मंगला के घर में हमेशा से शिक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया गया। इनकी प्रारंभिक शिक्षा होली मैरी गर्ल्स हाई स्कूल, सैफाबाद से हुई। बचपन में स्कूल और घर में सिखाई सीख कि केवल अच्छे से पढ़ाई करके ही एक बेहतर नागरिक बनकर समाज की सेवा की जा सकती है, इस बात को उन्होंने हमेशा अपने दिमाग में रखा और समाज के लिए बेहतर करने की ठान ली।

बचपन से ही उनका ध्यान विश्लेषणात्मक, तर्क कौशल और भूगोल में था। इसी रुचि के कारण कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग के क्षेत्र की पढ़ाई चुनी। मंगला की रुचि देखते हुए इनके माता-पिता ने हैदराबाद के एक सरकारी पॉलटेक्निक कॉलेज में मॉडल डिप्लोमा फॉर टेक्नीशियन में इनका दाखिला करा दिया। चार वर्षीय डिप्लोमा की प्रवेश परीक्षा मंगला ने पास कर ली थी। 80 लड़कों के बैच में मंगला अकेली लड़की थीं। पढ़ाई के दौरान ही मंगला ने एक दिन इसरो में शामिल होने का सपना देखा था।

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कॉलेज के खत्म होने के बाद मंगला के करियर की शुरुआत भी साधारण थी। पढ़ाई खत्म होने के बाद वह नौकरी की तलाश में लग गई थी। डिप्लोमा पूरा होने के बाद हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड, बालानगर में उन्होंने अपनी अप्रेंटिशिप पूरी। इसके बाद उन्हें सतीश धवन स्पेस सेंटर, इसरो के लिए इंटरव्यू देने का मौका मिला। तीन हफ्तों के भीतर ही मंगला मणि का इसरो के लिए चयन हो गया। वह बहुत खुश हुईं लेकिन जल्द ही यह सब धुंधला भी हो गया। उनके माता-पिता ने उन्हें दूर जगह पर जाकर काम करने के लिए मना कर दिया। अंत में उनके एक अकंल के द्वारा उनके पिता को बहुत समझाने पर वह राज़ी हुए। आखिर में इस तरह की परेशानी और उलझन झेलने के बाद उनका इसरो जाने की यात्रा शुरू हुई।

2016 नवंबर वह समय था जब मंगला मणि अंटार्कटिक पर भारत के मिशन के लिए रवाना हुईं। 56 साल की उम्र में अंर्टाकटिका में एक साल से भी अधिक का समय बिताकर उन्होंने अपने नाम यह रिकॉर्ड दर्ज किया।

जब सपने हुए साकार

अपने करियर की शुरुआत मंगला मणि ने उसी जगह से की जहां वह हमेशा काम करना चाहती थीं। इसरो में चयन होने के बाद उन्होंने पूरी लगन और मेहनत से काम किया। विज्ञान की दुनिया में वह लगातार डूबती रही और मानव विकास के उत्थान के लिए काम करती रही। वर्तमान में वह राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर, शादनगर हैदराबाद में कार्यरत हैं। जहां वह आपदा सहायता प्रणालियों के लिए सेटेलाइट से पृथ्वी संसाधनों का डाटा एकत्र करती हैं। आपदा स्थितियों को जानने के लिए इस तरह के डाटा की आवश्यकता पड़ती है। आज अपने ज्ञान व काम के माध्यम से वह अपने बचपन के सपने को साकार करने में सफल हुई।  

अंटार्कटिक मिशन की चुनौतियों को किया पार

2016 नवंबर वह समय था जब मंगला मणि अंटार्कटिक पर भारत के मिशन के लिए रवाना हुईं। 56 साल की उम्र में अंर्टाकटिका में एक साल से भी अधिक का समय बिताकर उन्होंने अपने नाम यह रिकॉर्ड दर्ज किया। सात महाद्धीपों में अंटार्कटिक सबसे ठंडा महाद्धीप है। यहां की जलवायु इंसानों के रहने के प्रतिकूल है। मनुष्य के लिए विषम परिस्थितियों वाले इस मिशन पर वह गई। भारत के रिसर्च स्टेशन ‘भारती’ में उन्होंने 403 दिन का वक्त बिताया। 23 वैज्ञानिक सदस्यों के दल में मंगला मणि अकेली महिला थीं। उस समय अंटार्कटिका पर भारत से अलग देश चीन और रूस के रिसर्च स्टेशन पर भी किसी अन्य महिला वैज्ञानिक की मौजूदगी नहीं थी।

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अंटार्कटिक मिशन पर मंगला मणि, तस्वीर साभार- The Hindu

अंटार्कटिक के मिशन पर जाने से पहले मंगला सहित पूरी टीम को अनेक परीक्षणों का सामना करना पड़ा। राष्ट्रीय धुव्रीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र के अन्तर्गत उनके मिशन से जाने से पहली की तैयारियों को पूरा किया गया। मिशन पर जाने से पहले न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी जांचा गया। अंटार्कटिक के बेहद ठंडे माहौल में जाने से पूर्व 9000 फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्र औली और 10000 फीट की उंचाई वाले क्षेत्र बद्रीनाथ में इस टीम की ट्रेनिंग की गई। ठंड के माहौल से परिचित कराने और शारीरिक सहनशक्ति के लिए भार के साथ बर्फ में लंबी दूरी तय करने का प्रशिक्षण दिया गया। अंटार्कटिक मिशन पर जाने से पूर्व मंगला ने कभी भी बर्फ नहीं देखी थी।

काम के अलावा कलात्मक काम से बिताया वक्त

मिशन के तकनीकी काम के अलावा उन्होंने वहां पर अन्य काम लिखाई और प्रस्तुति भी सीखी। घर से दूर रहकर न केवल अपना काम पूरा किया बल्कि टीम के अन्य सदस्यों को भी भावनात्मक सहारा दिया। मंगला ने मिशन में खाली समय में अपनी मां को अंटार्कटिक दिखाने के लिए एक तकिये के कवर पर अंटार्कटिक के दृश्य की कढ़ाई कर तस्वीर बनाई। इसके अलावा मिशन पर गई चीन और रूस की टीमों के साथ होने वाली खेल प्रतियोगिताओं में भाग लिया।

महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। विज्ञान के क्षेत्र में पहले के मुकाबले महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी हैंउनके अनुसार महिलाओं को केवल इच्छाशक्ति की जरूरत है और मौके उनके सामने हैं। ज्ञान के संसार के आकाश की कोई सीमा नहीं है। इसलिए ज़रूरत है कि विज्ञान क्षेत्र में बहुत महिलाएं आएं और नये-नये कीर्तीमान अपने नाम करें।

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स्रोत : The Hindu

तस्वीर साभार : Logical Indian

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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