घरों के अंदर होनेवाली यौन हिंसा पर चुप्पी
तस्वीर: अर्पिता विश्वास फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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घरेलू हिंसा पर अगर हम अपने आसपास के लोगों से बात करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे सब कुछ ठीक है, किसी महिला के साथ घरेलू हिंसा नहीं हो रही है मगर ऐसा है नहीं। घरेलू हिंसा की पकड़ हमारे पितृसत्तात्मक सामाजिक ढ़ाचे में बहुत मज़बूत है, ज़रूरत है आपको यह समझने की कि घरेलू हिंसा है क्या। घरेलू हिंसा के अंतर्गत  किसी महिला को मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक रूप से प्रताड़ना देना शामिल है। इसके लिए ज़रूरी नहीं कि महिला शादीशुदा हो। अपने ही मां-बाप द्वारा लड़की को घर से निकाल दिया जाना या उसकी पढ़ाई के लिए पैसे न देना भी घरेलू हिंसा में शामिल है। घरेलू हिंसा को लोगों ने अपना लिया है मानो यह हिंसा उनके जीवन का एक हिस्सा है जिसे मिटाया नही जा सकता। कुछ औरतें अब भी इस बात को अपनी प्रगति का हिस्सा मानती हैं कि उनका पति कम से कम उनको मारता नहीं है।  

शादी से पहले घरों में लड़कियों पर घर का काम करने का दबाव रहता है। शुरू से ही उनकी रोज़ाना की दिनचर्या में घर के काम ऐसे शामिल कर दिए जाते हैं जैसे कि ये उनकी ही ज़िम्मेदारी हो। यह पितृसत्तात्मक समाज का दबाव होता है। हर लड़की को यह उदाहरण हमेशा दिया जाता है, “देखो फलाने की लड़की सुबह-सुबह उठकर घर का सारा काम करवाती है।” इसके अलावा लड़कियों के बाहर आने-जाने से लेकर उनकी पढ़ाई तक को मां बाप बहुत सीमित कर देते हैं। जैसे ही लड़की 19-20 साल की हुई नहीं कि उसके ऊपर शादी के लिए दबा बनाने लगते हैं। कुछ घरों में तो इस उम्र तक शादी भी कर देते हैं। उसको हर कदम पर संघर्ष करना पड़ता है हर छोटी चीज जो बहुत सामान्य होनी चाहिए थी उसके लिए उसे लड़ना पड़ता है।

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क्या कहते हैं NHFS-5 के आंकड़े ?

नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि गर्भावस्था के दौरान 18 से 49 साल की उम्र की महिलाओं के साथ शारीरिक शोषण साल 2015-16 के मुकाबले साल 2020-21 में कम हुआ है। आकड़ों की माने तो पहले गर्भवती महिलाओं के साथ यह शारीरिक शोषण 3.9 फीसद था जो अब 3.1 फीसदी हो गया है। जिस समय एक महिला को परिवार की सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है जिस समय अपने साथी पर उसकी निर्भरता कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है ऐसे में शारीरिक शोषण पितृसत्ता का एक स्याह पक्ष दर्शाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के डिपार्टमेंट ऑफ रिप्रोडक्टिव हेल्थ एंड रिसर्च  के मुताबिक गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को यह आश्वासन होना चाहिए कि उन्हें पूरी देखभाल और सम्मान मिलेगा। वेबसाइट हेल्थशोट के अनुसार एक नए अध्ययन में पता चला है कि घरेलू हिंसा वाले घरों से आनेवाले शिशुओं में अक्सर न्यूरोडेवलपमेंटल लैग के कारण स्कूलों में उनका खराब प्रदर्शन होता है। साथ ही यह विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य मुद्दों का भी एक कारक है। 

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तस्वीर साभार: NHFS-5

NHFS-5 की रिपोर्ट यह भी बताती है कि विवाहित महिलाओं के बीच हिंसा के आंकड़ों में कुछ कमी आई है। साल 2015 -16 में जहां यह आंकड़ा 31.2 फीसद तक था, वहीं 2019-21 में घटकर 29.3 फीसदी तक हो गया है। यह आंकड़े कुछ हद तक राहत देते हैं लेकिन यह खुश होने वाली बात नहींं है क्योंकि यहां हिंसा होने या ना होने की बात हो रही है। अभी भी महिलाओं के साथ मारपीट गाली-गलौच होती है जिससे बड़ी संख्या में युवा महिलाएं व शादीशुदा महिलाएं जूझ रही हैं। उनका यह संघर्ष तब तक चलता रहेगा जब तक हर घर महिला का सम्मान करना नहीं सीख जाता। महिला के गाल पर आसानी से चांटा मार देना, उसको सबके सामने गाली दे देना, परिवार के साथ मिलकर परेशान करना पुरुषों के उस विशेषाधिकार को दिखाता है जिसे उन्होंने अपना अधिकार समझ लिया है।

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हिंसा को जायज़ ठहराती महिलाएं

नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 30 फीसद औरतें यह मानती हैं कि उनके पति के द्वारा मारा जाना सही है। रिपोर्ट के अनुसार तेलंगाना में 85 फीसद महिलाएं, आंध्र प्रदेश में 84 फीसद और कर्नाटक में 77 फीसदी महिलाएं ऐसा मानती हैं कि पत्नी द्वारा कुछ गलती किए जाने पर पति के द्वारा मारा जाना सही है। सर्वे में घरेलू शोषण का समर्थन करने का सबसे आम कारण ससुरालवालों का अनादर करना, घर और बच्चों की अनदेखी करना बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार सर्वे में यही सवाल पूछा गया और जवाब देने वालों के सामने 7 स्थितियां रखी गई। इनमें शामिल था, अगर कोई लड़की या महिला उसे बगैर बताए घर से बाहर जाए तो, महिला घर या बच्चों को नज़रअंदाज़ करे तो, महिला उसके साथ बहस करें तो, अगर महिला उसके साथ संबंध बनाने से इनकार कर दे तो, अगर वह खाना ठीक तरह से ना पकाए तो, अगर पुरुष को पत्नी के धोखा देने का शक हो जाए। यह स्थितियां ज़ाहिर करती हैं कि समाज में कब और किस पैमाने पर हिंसा की जाती है। 

सबसे पहली बात तो यह कि किसी भी परिस्थिति में पत्नी को मारा जाना एक अपराध है। अगर अब भी इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं ऐसा समझती हैं तो यह नाकामी है उन लोगो के लिए तो महिलाओं हिंसा के ख़िलाफ़ सालों से लड़ रहे हैं। सबसे बड़ी नाकामी तो सरकार की है जिसने कानून तो बना दिया पर उसका उपयोग कब कहां क्यों किया जाना है, इसे नहीं बताया। हम ऐसे माहौल में रहते हैं जहां एक औरत को पत्नीधर्म निभाना सिखाया जाता है। जहां औरतों को यह बताया जाता है कि पति को खुश कैसे करना है। 

महिलाओं को शुरू से ही समझौता करना सिखाया जाता है। इन्हें बताया जाता है कि परिवार की खुशी में ही उनकी खुशी होती हैं। इसकी जड़ें पितृसत्ता समाज में बहुत गहराई से जुड़ी हैं। भारत एक पुरुष प्रधान देश है।  शुरू से ही यहां एक लड़की को घर की ज़िम्मेदारियां समझा दी जाती हैं। वही ज़िम्मेदारियां आगे चलकर उसका बोझ बन जाती हैं क्योंकि उसे यह बताया गया है कि अगर वह घर का काम नहींं करती है तो वह एक ‘अच्छी बेटी अच्छी बहू और अच्छी मां’ नहींं है। पितृसत्तात्म समाज की ऐसी ही उम्मीदें आगे चलकर घरेलू हिंसा का कारण बनती हैं। 

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जो महिलाएं नौकरी करती हैं वे भी घर आकर बच्चों को देखती हैं, सबका खाना-पीना देखती हैं और अगर वे ऐसा नहीं करती हैं तो उनसे कहा जाता है कि उन्हें क्या जरूरत है नौकरी करने की। इस तरह से जब वे अपनी मर्जी से घर की ज़िम्मेदारियों से अलग अपने लिए या घर के लिए भी कुछ करती हैं उन्हें तनाव दवाब और शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ता है। कई बार महिलाएं परेशान होकर यह तक सोच लेती हैं कि अब इस रिश्ते में नहींं रहेंगी लेकिन बच्चों के कारण या अकेले हो जाने के डर से वे ऐसा नहींं कर पाती। अर्थिक रूप से सम्पन्न महिलाएं भी ऐसा करने से हिचकिचाती हैं क्योंकि तलाकशुदा महिला या अकेले रहने वाली महिला को पितृसत्तात्मक समाज सम्मान की नज़रों से नहींं देखता।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017 में वैश्विक स्तर पर 87,000 महिलाओं को जानबूझकर मार दिया गया था जिनमें से 50,000 अधिक महिलाओं को उनके परिवार या परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा मार दिया गया था। एक तिहाई करीब 30,000 से अधिक महिलाओं को उनके वर्तमान साथी (पति) या पूर्व साथी द्वारा मार दिया गया। संयुक्त का यह एक अनुमानित आंकड़ा है जो यह भी बताता है कि हर दिन 137 महिलाएं अपने परिवार के किसी सदस्य द्वारा मारी जाती हैं। क्या आपने पुरुषों के लिए इस तरह के आकड़े देखे हैं? 

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तस्वीर साभार : अर्पिता विश्वास फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

सीखने की प्रक्रिया में हूं, आधी पत्रकार आधी एक्टिविस्ट । लड़की जात हूं मगर कमज़ोर नहीं, समता और समानता ही मेरा धर्म है।

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1 COMMENT

  1. हेलो मैं दर्शिका चौहान, मुझे यह लेख बहुत पसंद आया है। क्योंकि इस लेख के अंदर नारी शक्ति और समानता जानकारियां दी गई हैं। इस पोस्ट को मुस्कान जी ने बहुत ही खूबसूरती से लिखा है। जो अपने आप में ही काबिले तारीफ है। मैं मुस्कान जी को धन्यवाद बोलना चाहती हूं। इस पोस्ट को हमारे साथ शेयर करने के लिए।

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