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“इसकी तो शादी नहीं हुई, अभी लड़की है, इसको क्या जानकारी होगी।” आपने भी शादीशुदा होने या न होने को लेकर कभी न कभी ऐसी बातें ज़रूर सुनी होंगी। जब महिलाओं के मैरिटल स्टेटस के आधार पर उनकी योग्यता का आंकलन किया जाता है। एक कुंवारी लड़की की अपेक्षा जब कोई बात शादीशुदा महिला करे तो उसे काफ़ी गंभीरता से लिया जाता है क्योंकि कहीं न कहीं समाज में कई मायनों में आज भी शादीशुदा महिला को कुँवारी लड़की की अपेक्षा बेहतर माना जाता है।

शादीशुदा होने या न होने के बीच में कितना ज़्यादा फ़र्क़ है इसका अंदाज़ा पहले हम अपनी भाषा से ही लगा सकते हैं, जिसमें शादी से पहले लड़की को कुँवारी या लड़की कहा जाता है, लेकिन शादी होने के बाद वही लड़की ‘महिला’ कहलाने लगती है। उसकी उम्र चाहे जो भी हो लेकिन उसे महिला ही कहा जाता है। ऐसा लगता है मानो शादी के बाद सिंदूर, चूड़ी और मेहंदी जैसे ऋंगार महिलाओं के अनुभव, समझ और विकास को बढ़ा देते है।

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ये तो बात हुई भाषा की। अब जब हम लोग बात करते हैं व्यवहार की। मेरी एक दोस्त जो एक अस्पताल में नर्स है, उसने बताया कि जब उसने अपनी नौकरी शूरू की थी तब उसकी शादी नहीं हुई थी, ऐसे में जब कोई गर्भवती महिला रेगुलर चेकअप या फिर डिलीवरी के लिए आती तो वह या कई बार उसके परिजन डॉक्टर से कहते कि इस नर्स की तो शादी नहीं हुई है, ये अच्छे से डिलीवरी नहीं करवा पाएगी इसलिए आप कोई शादीशुदा नर्स को कहिए। इतना ही नहीं, उसने बताया कि पढ़ाई के दौरान जब उसे फ़ील्ड में जाकर महिलाओं को परिवार नियोजन के बारे में बताना था तब बहुत सी महिलाएं उसे बुरी नज़र से देखती और कहती कि आपको परिवार नियोजन के बारे ये सब कैसे मालूम? आपकी तो शादी भी नहीं हुई। अब समाज को कौन समझाए कि डॉक्टर या नर्स बनने के लिए तैयार किए गए कोर्स और किताबें महिला-पुरुष और उनके शादीशुदा होने के हिसाब से नहीं बल्कि एक स्टूडेंट के हिसाब से लिखी गई हैं, जिसे जो पढ़ेगा उसे जानकारी होगी।

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यह तो बात हुई चिकित्सा के संदर्भ में। अब अगर मैं अपने अनुभव के बारे में बात करूं तो जब भी गाँव में वहां की महिलाओं के साथ महिला हिंसा या लैंगिक भेदभाव के मुद्दे पर बात करती हूं तो महिलाओं का मेरे प्रति एक अलग ही नज़रिया देखने को मिलता है। पहले तो वे यह कहती हैं कि मेरी शादी नहीं हुई तो मुझे कैसे मालूम होगा कि घर में कैसी हिंसा होती है। दूसरा जब भी मैं महिलाओं को हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए प्रोत्साहित करती हूं तो वे कहती है कि मेरी शादी नहीं हुई इसलिए ये कहना मेरे लिए आसान है। ये अनुभव मुझे कहीं न कहीं आंतरिक स्त्रीद्वेष का वे आधार लगते है, जिससे महिलाओं को अलग-अलग करने की राजनीति की जाती है।

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अक्सर मेरे सहकर्मी ये कहते हैं कि मेरी तो शादी नहीं हुई और मुझ पर भला कौन सा काम का बोझ, तुम्हें घर में कोई दिक़्क़त नहीं होती होगी। ऐसी बातें सिर्फ़ मैं ही नहीं मुझ जैसी हर उस लड़की को अक्सर सुनने को मिलती हैं जिसकी शादी नहीं हुई पर क्या वास्तव में ऐसा है?

शादी के आधार पर महिलाओं की योग्यता को आंकने और उन्हें महत्व देने की प्रकृति कई बार उनके साथ होने वाली हिंसा को भी नज़रंदाज़ करती है। जैसे, अक्सर मेरे सहकर्मी और साथी ये कहते हैं कि मेरी तो शादी नहीं हुई और मुझ पर भला कौन सा काम का बोझ, तुम्हें घर में कोई दिक़्क़त नहीं होती होगी। ऐसी बातें सिर्फ़ मैं ही नहीं मुझ जैसी हर उस लड़की को अक्सर सुनने को मिलती हैं जिसकी शादी नहीं हुई पर क्या वास्तव में ऐसा है? अगर यह सही होता तो कभी भी लड़कियों के स्कूल घर के काम के नाम पर नहीं छुड़वाए जाते। उन्हें घर का काम करने के बाद स्कूल जाने की अनुमति वाले चलन में लड़कियां पढ़ने में कमज़ोर नहीं होती या फिर क्या कभी हम किसी बिना शादीशुदा महिला को उसके मायके में होने वाली घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते देखते हैं?

वास्तविकता यह है कि शादी के आधार पर यह आंकलन करना कि शादीशुदा महिला का संघर्ष एक बिना शादीशुदा महिला के संघर्ष के ज़्यादा है। पितृसत्ता में अपने बुनियादी अधिकारों के लिए महिला संघर्ष हर स्थिति में देखने को मिलता है, उनके रूप अलग हो सकते है पर मूल एक ही होता है। महिलाएं मायके हो या ससुराल में, घर संभालना, खाना पकाना और परिवार बसाना यही उनका काम माना जाता है। जैसे ही कोई बेटी या बहु आगे पढ़ने या बढ़ने का सपना देखती है तो पूरा समाज उसके कदम को रोकने में जुट जाता है। इसके साथ ही हमें यह बात अच्छे से समझनी होगी कि शादी कभी भी किसी भी इंसान की योग्यता का मानक नहीं हो सकती है, क्योंकि किताबें और अनुभव शादी के आधार पर नहीं बल्कि अवसर के आधार पर मिलते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि शादीशुदा होने या शादीशुदा न होने या शादीशुदा होने के बाद तलाकशुदा होने, ये सब सामान्य है और महिलाओं का संघर्ष और चुनौतियां हर जगह हैं, जिसे हमें आतंरिक स्त्रीद्वेष का बीज डालने वाले शादी के आधार से परे हटकर समझने और एकजुट होकर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की ज़रूरत है।

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तस्वीर साभार : रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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