समाजराजनीति उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव : हमेशा की तरह आज भी मुसहर समुदाय के नेतृत्व का ज़िक्र तक नहीं है

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव : हमेशा की तरह आज भी मुसहर समुदाय के नेतृत्व का ज़िक्र तक नहीं है

इन सभी मुसहर बस्तियों में न तो शौचालय की योजना पहुंच पाई है न उनके सिर पर छत मिल पाई है। यहां तक कि इन बस्तियों में साफ़ पानी पीने तक की कोई व्यवस्था नहीं है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 की तारीखों का ऐलान किया जा चुका है। हर पांच साल में प्रदेश में नयी सरकार बनती है। नयी-नयी योजनाओं के साथ नये-नये एजेंडों के साथ। इन सरकारी वादों-योजनाओं का प्रभाव कहीं-कहीं में देखने को मिलते हैं। लेकिन आज भी समाज का एक तबका ऐसा भी है जहां तक पहुंचते-पहुंचते सरकार ही हर नीति और हर योजना का कभी फंड ख़त्म हो जाता है तो कभी समय।

उत्तर प्रदेश में मुसहर समुदाय इन्हीं समुदायों में से एक है। जहां अभी तक सत्ता नहीं पहुंच पाई है। अगर बात करें उत्तर प्रदेश में मुसहर समुदाय के नेतृत्व की तो प्रदेश में मुसहर समुदाय का कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं है। बड़ा चेहरा क्या, पंचायत स्तर पर भी मुसहर प्रधान होना भी बेहद दुर्लभ है। यूं तो उत्तर प्रदेश में मुसहर जाति को अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन मुसहर समुदाय की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति इस वर्ग में भी हाशिएबद्ध है।

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मैं बनारस, सेवापुरी ब्लॉक के चित्रसेनपुर गांव की मुसहर बस्ती में बच्चों को पढ़ाने और महिला-किशोरी समूह के माध्यम से महिला विकास, जागरूकता और सशक्तिकरण के मुद्दे पर काम कर रही हूं। सेवापुरी ब्लॉक के ही बसुहन और तेंदुई गांव में भी हम काम करते हैं। इन सभी मुसहर बस्तियों में न तो शौचालय की योजना पहुंच पाई है न उनके सिर पर छत मिल पाई है। यहां तक कि इन बस्तियों में साफ़ पानी पीने तक की कोई व्यवस्था नहीं है।

चित्रसेन गांव की मुसहर बस्ती, तस्वीर साभार: रेणु

चित्रसेनपुर गांव की मुसहर बस्ती में रहने वाली पचीस वर्षीय सोनी बताती हैं, “हम लोगों की बस्ती में एक छोटा तालाब है, जिसमें सभी अपने जानवर नहलाने लाते हैं। बस्ती के लोग अपने घरों का बर्तन और कपड़े भी यहीं धोते हैं और हम लोग इसी तालाब का पानी पीने को मजबूर है। यहां आस-पास कहीं भी साफ़ पानी पीने की कोई सुविधा नहीं है। गंदा पानी पीने की वजह से यहां की महिलाओं और बच्चों को कई तरह की गंभीर बीमारियों से जूझना पड़ता है। यहां बहुत से ऐसे परिवार हैं, जिनके पास न तो आधार कार्ड और न वोटिंग कार्ड। ये सभी पहचान पत्र और वोटिंग कार्ड न होने की वजह से ग्राम प्रतिनिधि भी हमलोगों की कोई बात नहीं सुनते है।”

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बनारस की इन सभी मुसहर बस्तियों में न तो शौचालय की योजना पहुंच पाई है न उनके सिर पर छत मिल पाई है। यहां तक कि इन बस्तियों में साफ़ पानी पीने तक की कोई व्यवस्था नहीं है।

वहीं, बसुहन गाँव की मुसहर बस्ती में रहने वाले पंद्रह वर्षीय नागेश से जब उसकी पढ़ाई को लेकर बात की गई तो उसने बताया कि सरकारी स्कूल में जब अधिकारी जाँच के लिए आते हैं तो टीचर उन लोगों की बस्ती में आकर उन्हें ले जाते हैं और एडमिशन करवाते हैं पर स्कूल में मुसहर बस्ती के बच्चों की संख्या बनी रहे इसलिए एक ही बच्चे का अलग-अलग नाम से हर साल अलग-अलग क्लास में दाख़िला कर दिया जाता है। इसकी वजह से आज तक नागेश पाँचवी पास ही नहीं कर पाया।

नागेश आगे बताता है, “जब हम लोग सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते हैं तो वहां दूसरी जाति के बच्चे भी हम लोगों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। वहां, सभी हम लोगों की जाति के नाम से हम लोगों को बुलाते हैं और साथ बैठने में भी कतराते हैं। इसलिए हम लोगों का ख़ुद भी स्कूल जाने का मन नहीं करता अब। बता दें कि इस बस्ती में स्वास्थ्य सेवाएं भी नहीं पहुंच पाती हैं। इस बस्ती के अधिकतर बच्चों का कोई भी टीकाकरण नहीं हुआ है, जिसकी वजह से अक्सर बच्चे गंभीर बीमारी का शिकार हो जाते हैं।”

एक़ बार फिर उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं पर किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में मुसहर जाति के बारे में कोई योजना तो दूर उन तक पहुंचने की कोई बात नहीं है।

साल 2011 की ज़नगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश में मुसहर समुदाय की कुल आबादी 2,50,000 है। लेकिन इसके बावजूद मुसहर जाति तक सरकारी सेवाएं तो दूर भारत का नागरिक होने के नाते उन्हें मिले मौलिक अधिकार तक नहीं पहुंच पाते हैं। उत्तर प्रदेश में होनेवाले आगामी चुनाव के बारे में अलग-अलग जातियों का वोटिंग परसेंट क़रीब हर न्यूज़ चैनल में दिखाया जा रहा है, लेकिन इन सभी जातियों में कभी भी मुसहर जाति का कभी कोई ज़िक्र नहीं आता है। कहते हैं, मीडिया समाज का आइना होती है और जब सरकारें अपने प्रदेश के हाशिएबद्ध समुदाय को भूल जाए तो यह मीडिया का दायित्व होता है कि वह समाज के हाशिए पर बसनेवाले समुदाय की आवाज़ बने।

दूषित पानी पीने से बीमार पड़ते बच्चे, तस्वीर- रेणु

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डिजिटल इंडिया बनने का दावा करते हमारे देश की यह कड़वी सच्चाई है कि आज भी उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का सपना लेकर आनेवाली कोई भी सरकार आज तक इन मुसहर बस्तियों तक नहीं पहुंच पाई है। मुसहर समुदाय के अधिकतर परिवार ईंट भट्टों पर मज़दूरी का काम करते हैं। मज़दूरी के सबसे निचले तबके में काम करने को मजबूर मुसहर समुदाय को हिंसा और शोषण का सामना करना पड़ता है। रोज़गार के तमाम अवसरों से दूर आज भी मुसहर समुदाय हर दिन कुँआ खोदकर पानी पीने को मजबूर हैं। गाँव के सबसे बाहरी हिस्से में सदियों से बसाए गए मुसहर समुदाय को आज तक समाज तो क्या गांव तक की मुख्यधारा में शामिल नहीं जा सका है। स्वच्छता-स्वास्थ्य-रोज़गार की तमाम योजनाएं इन बस्तियों के पास से गुजरती तो हैं लेकिन इनके घरों और जिंदगियों तक पहुंचती नहीं हैं।

एक़ बार फिर उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं पर किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में मुसहर जाति के बारे में कोई योजना तो दूर उन तक पहुंचने की कोई बात नहीं है। इसीलिए न तो किसी भी पार्टी ने प्रदेश में मुसहर आबादी की संख्या का उल्लेख करना भी ज़रूरी नहीं समझा, क्योंकि ये उन्हें भी मालूम है कि अधिकतर मुसहर परिवारों का वोटिंग अधिकार तक सरकारें सुनिश्चित नहीं कर पाई हैं।

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तस्वीर साभार: रेणु

About the author(s)

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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