क्यों बॉलीवुड फिल्मों के 'नायक' हमेशा सवर्ण होते हैं?
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जब हम हिंदी फिल्में देखतें हैं तो गौर करने पर एक बड़ा तथ्य यह निकलकर आता है कि हमारी फिल्मों के हीरो अधिकतर ऊंची जाति के ही होते हैं। जितनी भी फिल्में हम देखते हैं उन सभी में यह बात एक जैसी होती है। फिल्म में काम करनेवाले अभिनेता और उनके किरदार तक सवर्ण जाति के ही होते हैं। यह बात फिल्मों के किरदारों के उपनाम पर गौर करने पर साफ नज़र आती है।

भारतीय समाज में जाति व्यवस्था की जड़ें बरगद के पेड़ की तरह गहरी और विस्तृत बसी हुई हैं। सदियों से भारत में हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था है जिसने लोगों को उच्च, निम्न जाति में विभाजित किया है। खैर, इस लेख का मुख्य मकसद आपको जाति व्यवस्था को समझाना नहीं बल्कि आज भी भारत में जातिवाद किस तरह फल-फूल रहा यह बताना है। वैसे तो हम आधुनिक भारत के 21वीं सदी में जी रहे हैं लेकिन परंपरा और संस्कृति के नाम पर हमारे यहां कई कुप्रथाएं समय के साथ बढ़ती चली जा रही हैं। भारत में जाति व्यवस्था भी ऐसी ही है। समाज के साथ-साथ सिनेमा में भी जाति व्यवस्था कैसे कायम है इसके तमाम उदाहरण लगभग सभी फिल्मों को देखकर पता चलते हैं।

भारतीय सिनेमा में एक दिलेर, हैंडसम पर्सनलिटी के साथ-साथ ऊंची जाति से संबंध रखता हुआ हीरो दिखाया जाएगा। फिल्म की कहानी में लेखक हीरो को हमेशा ऊंची जाति का दिखाकर ही कहानी लिखते हैं। अब ऐसा करने के पीछे लेखक और निर्देशक का कोई खास उद्देश्य होता है या यह कोई नियम है जिसका पालन करना होता है या उनकी सोच। फिल्मों में हीरो के नाम के पीछे राठौर, चौहान, मिश्रा, सिंह, ठाकुर जैसे उपनाम होंगे तभी वह वज़नदार और ताकतवर लगेंगे, हमारा हिंदी सिनेमा इसी सोच पर आज भी कायम है। इस कथन में कितनी सच्चाई है इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि कई फिल्मों के नाम ही उच्च जाति के उपनाम के ऊपर रखे जाते हैं। वहीं, कई फिल्मों के डायलॉग ऐसे लिखे जाते हैं कि एक बार सुनते ही नायक की जाति की पहचान हो जाती है।

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फिल्मों में हीरो के नाम के पीछे राठौर, चौहान, मिश्रा, सिंह, ठाकुर जैसे उपनाम होंगे तभी वह वज़नदार और ताकतवर लगेंगे, हमारा हिंदी सिनेमा इसी सोच पर आज भी कायम है। इस कथन में कितनी सच्चाई है इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि कई फिल्मों के नाम ही उच्च जाति के उपनाम के ऊपर रखे जाते हैं।

साल 2012 में एक्शन से भरपूर फिल्म ‘राउडी राठौर’ सिनेमाघरों में आई। इस फिल्म में बतौर हीरो अक्षय कुमार ने काम किया। फिल्म में अक्षय कुमार बतौर इंस्पेक्टर विक्रम राठौर के किरदार में नज़र आए, जिसके नाम पर फिल्म का टाइटल राउडी राठौर रखा गया। फिल्म में विक्रम राठौर मसीहा बनकर आम लोगों को गुंडों और भ्रष्ट नेता से बचाते हुए दिखाए गए। राठौर उपनाम उच्च जाति से आता है। फिल्म में ताकतवर मसीहा के रूप में सिर्फ राठौर जाति के शख्स को दिखाया गया है, क्यों किसी पिछड़ी जाति के आनेवाले शख्स के नाम पर किरदार का और फिल्म का नाम नहीं रखा गया।

हमारी सोच में जाति व्यवस्था का मकड़जाल इस तरह बुन दिया गया है कि उससे बाहर निकलकर हम कुछ और सोच ही नहीं पाते हैं। फिल्म की कहानी में केवल उच्च-जाति के किरदारों को चित्रित करने की बात, जाति के स्थापित पूर्वाग्रह को दिखाती है। उच्च जातियों के किरदारों से सजी ऐसी फिल्में उत्तर भारत के हिंदी भाषी समाज में गहरे तौर पर स्थापित पूर्वाग्रह को दर्शाती हैं। ये फिल्में न सिर्फ अच्छे-खासे रिव्यू के साथ दर्शकों के बीच न अपनी जगह बनाती हैं बल्कि कमाई में भी आगे रहती हैं।

1994 में नाना पाटेकर की ‘क्रांतिवीर’ नाम से फिल्म आई। नाना पाटेकर ‘प्रताप नारायण तिलक’ नाम के किरदार की भूमिका में नजर आए। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर काफी कमाई की और कई अवार्ड अपने नाम किए। लोगों के बीच फिल्म इतनी हिट रही कि आज भी फिल्म के डायलॉग लोगों की जुबान पर है पर क्या किसी ने गौर किया कि नाना पाटेकर जिस किरदार को निभा रहे हैं उसका नाम है ‘प्रताप नारायण तिलक’ जो कि ब्राह्मण जाति से है। ब्राह्मण जाति का एक शख्स जो पूरी भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ लड़ता है लोगों के बीच मसीहा बनकर उभरता है। इन फिल्मों में उच्च जाति के नामों को मुख्य किरदार में नायक बनाकर दिखाया जाना उस जातिवादी सोच को दर्शाता है, जो आधुनिक भारत में भी फल -फूल रहा है। समाज से उठकर सिनेमा में भी जातिवादी सोच नज़र आती है।

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इसी कड़ी में आगे आती हैं फिल्में अग्निपथ, सिंह इज़ किंग, सिंघम आदि। “सिंह इस किंग” यानि सिंह ही राजा है। मुख्य किरदार में अक्षय कुमार नजर आते हैं जिसका नाम हैप्पी सिंह है। फिल्म का मुख्य किरदार विदेश में जाकर अपने साथियों को काले धंधे से निकाल कर एक बेहतर इंसान बनाने का काम करता है। एक किंग की तरह लीड करता है और सारी परेशानियों को दूर करने के उपाय ‘सिंह’ नाम के किंग के पास ही होते हैं। भारत के इतिहास में पूर्व में जो राजतंत्र का शासन था उसमें क्षत्रिय कुल के लोग राजा होते थे। उसी राह पर चलते हुए फिल्मों में सिंह उपनाम के क्षत्रिय को राजा और श्रेष्ठ की उपाधि दी जाती है।

ऐसी एक-दो फिल्में नहीं बल्कि कई फिल्में हैं जो ग्रसित हैं जाति व्यवस्था कि उस प्रणाली से जो कल्पना में भी नायक को पिछड़ी जाति का नहीं देख पाती हैं। विविधता से दूर हिंदी सिनेमा सवर्णों पर केंद्रित एक दुनिया को ही अपनी कल्पनाओं में दोहराने का काम करता जा रहा है।

सिंह शब्द के साथ ही कुछ बदलाव करके ‘सिंघम’ शब्द का इजाद किया गया। जिसके नाम पर 2011 में फिल्म बनी ‘सिंघम’। एक ईमानदार पुलिसवाला जिसका नाम है ‘बाजीराव सिंघम’। सिंघम ऊंचें पद पर बैठा ऊंची जाति का एक शख्स है जो अपने काम के प्रति इमानदार दिखाया गया है। जो कहानी में लोगों के बीच एक आदर्श मसीहा बनता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अकेले लड़ाई लड़ता है और हीरो बनकर उभरता है।

ऐसी एक-दो फिल्में नहीं बल्कि कई फिल्में हैं जो ग्रसित हैं जाति व्यवस्था कि उस प्रणाली से जो कल्पना में भी नायक को पिछड़ी जाति का नहीं देख पाती हैं। आज भी जातिवादी व्यवस्था का अनुसरण फिल्मों में किया जा रहा है जो हमारी सोच में कोई परिवर्तन नहीं लाता। विविधता से दूर हिंदी सिनेमा सवर्णों पर केंद्रित एक दुनिया को ही अपनी कल्पनाओं में दोहराने का काम करता जा रहा है।

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पेशे से एक पत्रकार ,जज्बातों को शब्दों में लिखने वाली 'लेखिका'
हिंदी साहित्य विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय से BA(Hons) और MA(Hons) मे शिक्षा ग्रहण की फिर जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में शिक्षा ली । मूलतः उत्तर प्रदेश से सम्बद्ध रखती हूँ और दिल्ली में परवरिश हुई । शहरी और ग्रामीण दोनों परिवेशों में नारी आस्मिता पर पितृसत्ता का प्रभाव देखा है जिसे बेहतर जानने और बदलने के लिए 'फेमनिज़म इन इंडिया' से जुड़ी हूँ और लोगों तक अपनी बात पहुँचाना चाहतीं हूँ।

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