केरल नन रेप केसः कोर्ट के फैसले में सर्वाइवर के आचरण पर सवाल और फैसले की आलोचना करता समाज
तस्वीर साभार: BBC
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बीती 14 जनवरी केरल की एक निचली अदालत ने बिशप फ्रैंको मुलक्कल को नन के बलात्कार के आरोप से बरी किया गया है। इस फैसले के विरोध और सर्वाइवर नन के समर्थन में सोशल मीडिया पर एक कैंपेन चलाया जा रहा है। इसमें लोग अपने हाथों से लिखे पत्रों को अपने सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। “हम आपके साथ हैं, आप इस लड़ाई में अकेली नहीं हैं, हम सब जानते हैं कि आप यह लड़ाई हर उस महिला के लिए लड़ रही हैं जिसने चुपचाप यौन उत्पीड़न का सामना किया है और यह लड़ाई उनके लिए हैं जो हिंसा की बात सबके सामने नहीं रख पाई।” इस तरह के हाथों से लिखे संदेशों के बहुत से पोस्ट सोशल मीडिया पर देखने को लगातार मिल रहे हैं। इन अधिकांश पोस्ट्स को हैशटैग #withthenun, #avalkoppam के साथ शेयर किया जा रहा है।

अवलकोप्पम मलयालम भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है ‘हम साथ हैं’। इन पत्रों में नन को न्याय दिलाने की लड़ाई में साथ खड़े होने की प्रतिज्ञा, उनका समर्थन और कविताएं लिखी हुई हैं। कई लोगों ने नन के समर्थन में अपने सोशल मीडिया पर यह लिखा है कि उन्हें उनकी बातों पर पूरा विश्वास है। अब तक सैकड़ों पत्र इन नन के समर्थन में आ चुके हैं। अनेक सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, फिल्म निर्माता, अभिनेत्री, कलाकार और छात्रों ने इन हाथों से लिखे पत्रों में ननों को समर्थन दिया है तो साथ ही अदालत के फैसले पर नाराज़गी भी जताई है।

क्या है पूरा मामला ?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार केरल की एक वरिष्ठ नन ने जून 2018 में कुराविलंगड पुलिस स्टेशन में अपनी शिकायत में कहा था कि साल 2014 से 2016 के बीच बिशप फैंक्रो मुलक्कल ने उनका 13 बार बलात्कार किया था। कोट्टयम जिले की पुलिस ने जून 2018 में ही बिशप के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज किया था। सर्वाइवर नन के अनुसार कुरविलंगड में मिशन कॉन्वेंट में उनके साथ यौन हिंसा हुई थी।

बिशप ने उल्टा नन पर आरोप लगाते हुए कहा था कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप मनगढ़ंत हैं और इसे अपने खिलाफ़ बदले की कार्रवाई बताया। एफआईआर दर्ज होने के कुछ समय बाद, सितंबर 2018 में, सर्वाइवर नन के समर्थन में करीब नौ ननों के एक समूह ने बिशप मुलक्कल की गिरफ्तारी की मांग की। न्याय की मांग में ननों ने केरल उच्च न्यायालय के सामने भूख हड़ताल शुरू की। उनके विरोध को सफलता मिली और मुलक्कल को जालंधर से कोच्चि लाया गया। पुलिस ने तीन दिनों तक पूछताछ की और आखिर में गिरफ्तार कर लिया। करीब एक महीने जेल में रहने के बाद जमानत मिली थी। ज़मानत से रिहा होने के बाद जालंधर में बिशप का फूल-मालाओं से स्वागत हुआ था। इस केस का ट्रायल सितंबर 2020 में शुरू हुआ। बिशप ने अपने खिलाफ आरोपों को रद्द करने के लिए उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, लेकिन अदालतों ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था।

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“हम आपके साथ हैं, आप इस लड़ाई में अकेली नहीं हैं, हम सब जानते हैं कि आप यह लड़ाई हर उस महिला के लिए लड़ रही हैं जिसने चुपचाप यौन उत्पीड़न का सामना किया है और यह लड़ाई उनके लिए हैं जो हिंसा की बात सबके सामने नहीं रख पाई।” इस तरह के हाथों से लिखे संदेशों के बहुत से पोस्ट सोशल मीडिया पर देखने को लगातार मिल रहे हैं। इन अधिकांश पोस्ट्स को हैशटैग #withthenun, #avalkoppam के साथ शेयर किया जा रहा है।

बिशप मुलक्कल पर आरोप क्या हैं ?

नन ने बिशप मुलक्कल पर गलत तरीके से बंधक बनाने, बलात्कार करने, अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने और आपराधिक धमकी देने के आरोप लगाए थे। गौरतलब है कि नन के बलात्कार के आरोप सामना करने वाले बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर फरवरी 2020 में एक अन्य नन ने यौन शौषण का आरोप लगाया था। इंडिया टुडे की ख़बर के मुताबिक, पुलिस सूत्रों का कहना है कि बिशप के खिलाफ एक और नन ने यौन उत्पीड़न का बयान दिया है। यह नन फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ बलात्कार के मामले की गवाह भी हैं। वह इम मामले में चौदहवीं गवाह हैं। उन्होंने पुलिस के सामने अपना बयान दर्ज कराते हुए कहा था कि बिशप ने फोन पर उनके साथ यौन संबधी और अश्लील टिप्पणियां की। 2018 में गवाह ने अपने बयान मे कहा कि 2017 में बिशप ने उस कॉन्वेंट का दौरा किया जिसमें वह थी वहां उन्होंने उसे गले लगाया और चूमा। नन ने अपने बयान में यह भी कहा था कि वह बिशप से डरी हुई थीं कि कहीं उसे समूह से बाहर न निकाल दिया जाए इसलिए वह चुप थीं।

क्यों यह मामला अहम है

भारत में यह उन पहले मामलों में से एक है जब किसी बिशप के खिलाफ बलात्कार और यौन उत्पीड़न का आरोप लगा। आरोप में उसे गिरफ्तार किया गया और जेल भेजा गया। बलात्कार के मामले में आरोप लग जाने के बाद बिशप फ्रैंको से उनके अधिकार छीन लिए गए थे। इस मामले के सामने आने से चर्च में मौजूद हिंसा का तंत्र साफतौर पर सामने आ गया जिस पर यहां बात नहीं होती थी। चर्च में मौजूद उस व्यवस्था को भी उजागर कर दिया जहां वरिष्ठ पादरियों के खिलाफ उत्पीड़न की शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं देता है। प्रबंधन के लोग जानबूझकर इस तरह की शिकायतों को छिपा देते हैं। इस मामले में ननों की सुरक्षा का भी सवाल उठा। साथ ही सर्वाइवर के समर्थन में साथी ननों द्वारा विरोध किए जाने के बाद ही इसे गंभीरता से लिया गया।

क्या है निचली अदालत का फैसला

रोमन कैथोलिक बिशप फ्रैंको मुलक्कल को बलात्कार के आरोप से बरी करने वाली अदालत ने सर्वाइवर के बारे में कहा कि सर्वाइवर ने विभिन्न समय पर अलग-अलग लोगों के सामने अलग-अलग बयान से उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि, कानून के तहत बलात्कार मामले में शिकायतकर्ता के बयान को तब तक पर्याप्त सबूत माना जाता है, जब तक बचाव पक्ष इसमें विसंगतियों को साबित नहीं करता। केरल के कोट्टयम के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (प्रथम) जी. गोपाकुमार ने मुलक्कल को बरी करते हुए घटना के बारे में सर्वाइवर के बयानों में एकरूपता न होना और अभियोजन के मामले को साबित करने के लिए ठोस सबूतों की कमी सहित अनेक कारणों का ज्रिक किया है।

अदालत ने कहा है कि अभियोजन पक्ष सर्वाइवर, एक गवाह और अन्य मोबाइल फोन अदालत में पेश करने में नाकामयाब रहा है, जबकि पूरा मामला मोबाइल फोन द्वारा भेजे गए कुछ अश्लील संदेशों के आधार पर बनाया गया था। साथ ही अदालत ने कहा है कि आरोपी द्वारा नन को भेजे गए मैसेज से किसी तरह की धमकी का पता नहीं चलता है। अदालत ने यह भी कहा है कि कथित यौन उत्पीड़न की घटनाओं के बाद भी सर्वाइवर के आरोपी के साथ करीबी संपर्क थे।

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कोट्टयम जिला अदालत के जस्टिस जी. गोपाकुमार ने अपने 289 पन्नों के आदेश में शिकायतकर्ता के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सर्वाइवर के बयान असंगत हैं। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने अपने पहले बयान में यौन शौषण का उल्लेख नहीं किया। विशेष रूप से आरोपी बिशप द्वारा ‘पिनाइल पेनेट्रेशन’ के बारे में सर्वाइवर ने जानकारी नहीं दी गई। न्यायाधीश ने निष्कर्ष निकाला है कि सर्वाइवर के स्पष्टीकरण पर विश्वास करना कठिन है कि ‘वह अपनी साथी सिस्टर्स की उपस्थिति में खुलासा नहीं कर सकी थीं।’ जज ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता ने अपने बयान और डॉक्टर के सामने ‘पेनीट्रेशन’ का उल्लेख नहीं किया था।

फैसले में शिकायतकर्ता की मेडिकल जांच को उद्धत किया गया है, ताकि बिशप द्वारा कई बार किए यौन उत्पीड़न के इतिहास का रिकॉर्ड रखा जा सकें। बिशप अक्सर कॉन्वेंट होम में आता-जाता था। इसके अनुसार, सर्वाइवर के साथ चार साल में 13 बार यौन उत्पीड़न हुआ था। इस उत्पीड़न में निजी अंगों को छूना और बिशप द्वारा सर्वाइवर को उनके निजी अंग छूने के लिए मजबूर करना शामिल हैं।

इसके अलावा अदालत ने दो मामलों का जिक्र करते हुए शिकायतकर्ता के व्यवहार पर सवाल उठाए हैं। जज ने कहा कि घटना होने के बावजूद शिकायतकर्ता ने आरोपी के साथ कॉन्वेंट लौटने का फैसला किया। बलात्कार की घटना होने के बाद भी वह उनके साथ रही। शिकायतकर्ता ने हर घटना के बाद दया की गुहार लगाई। ऐसी स्थिति में आरोपी के साथ उनके लगातार संवाद के कारण उनका पक्ष कमजोर हुआ है। उन्होंने लगातार आरोपी के साथ काम के सिलसिले में बिशप के साथ सफर भी किया। जज ने आरोपी के साथ शिकायतकर्ता के एक दौरे का ज्रिक किया और सवाल उठाया है कि इस कथित बलात्कार का कोई गवाह कैसे नहीं है।

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जज ने अपने फैसले में इस पर गौर किया कि शिकायत झूठी है और निजी कारणों से प्रेरित है। हालांकि उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं भी हो सकता है। जज ने बचाव पक्ष की उस थ्योरी पर भी गौर किया जिसमें मेडिकल रिपोर्ट में शिकायतकर्ता का हाइमन न होने की बात को विवाहित पुरुष से उनके अफेयर को जोड़ा गया था। जज ने बचाव पक्ष की उस थ्योरी पर भी गौर किया है कि आरोपी के चर्च के भीतर दुश्मन हैं जिन्होंने उन्हें निशाना बनाने के लिए शिकायतकर्ता को इस्तेमाल किया है। फैसले में यह कहा गया कि आरोपी के खिलाफ चर्च के भीतर कई दुश्मन थे।

अदालत के द्वारा बिशप के बरी हो जाने के विरोध में एक वर्ग ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि यह फैसला सर्वाइवर के खिलाफ एक आरोपपत्र जान पड़ता है। फैसले के सार्वजनिक हो जाने के बाद कई लोगों ने आक्रोश जताया, जिसमें उन्होंने कहा कि न्यायाधीश सर्वाइवर के आचरण और नैतिक चरित्र पर सवाल उठा रहे थे।

अदालत में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों का यौन उत्पीड़न की घटनाओं में सर्वाइवर को ही गलत ठहराना हमारी संस्थाओं में स्थापित पितृसत्ता को दर्शाता है। महिला के साथ कोई भी अपराध होता है, अलग-अलग कारण देकर महिला को ही दोष दे दिया जाता है।

बीबीसी के लेख में इतिहासकार और नारीवादी शोधकर्ता जे. देविका ने कहा, “जब मैंने फैसला पढ़ा, तो मैं हैरान रह गई। मेरे पास इसका वर्णन करने के लिए केवल दो शब्द हैं न्यायिक पोर्न। उन्होंने कहा कि यह फैसला केवल बिशप को दोषमुक्त करने के लिए नहीं है। यह सर्वाइवर और अन्य ननों के हौसले को खत्म करने के लिए भी था जिन्होंने उनका समर्थन किया। इसमें नन द्वारा वर्णित यौन उत्पीड़न की घटनाओं और हमलों के ग्राफिक विवरण शामिल हैं। इसमें न्यायाधीश एक स्तन परीक्षण की घटना का भी विवरण दिया गया जिससे वह गुजरी थी। इसमें इसकी क्या जरूरत थी।” सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार अपने फैसले में कहा हैं कि बलात्कार के मामलों में न्यायाधीशों को महिला के व्यवहार या चरित्र पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।  

अदालत में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों का यौन उत्पीड़न की घटनाओं में सर्वाइवर को ही गलत ठहराना हमारी संस्थाओं में स्थापित पितृसत्ता को दर्शाता है। महिला के साथ कोई भी अपराध होता है, अलग-अलग कारण देकर महिला को ही दोष दे दिया जाता है। विक्टिम ब्लेमिंग एक बड़ी वजह है जिसके कारण महिलाएं अक्सर अपने साथ होने वाले अपराध के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा पाती हैं। इसकी वजह से सर्वाइवर को मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। भारतीय समाज में आम हो या खास यहां पुरुष, महिलाओं को ही नसीहत देते नज़र आते हैं। अदालत के फैसलों में विक्टिम ब्लेमिंग की भाषा महिलाओं के न्याय पाने के रास्ते में बहुत बड़ी बाधा है।

यदि अदालत की ओर से ही कानूनी भाषा में ‘महिलाओं की ही गलती’ और ‘यौन उत्पीड़न के लिए लड़कियों की जवाबदेही तय होती है’ जैसी बात कही जाएगी तो यह न्याय के प्रति विश्वास को तोड़ती है। अदालत के ऐसे फैसले गलत नज़ीर पेश करते हैं। अन्य सर्वाइवर्स के लिए इंसाफ के रास्ते को तो बंद करते ही है साथ ही अन्य फैसलों को भी प्रभावित करने का काम करते हैं।  

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तस्वीर साभारः BBC

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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