पितृसत्तात्मक समाज कैसे करता है महिलाओं की 'स्लट शेमिंग'
तस्वीर: श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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साल 1974 में मथुरा रेप केस के मामले पर सुनवाई करते हुए एक निचली अदालत ने आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि सर्वाइवर मथुरा को सेक्स की आदत थी। साल 2020 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बलात्कार के मामले में आरोपी को इसलिए ज़मानत दे दी थी क्योंकि सर्वाइवर रेप के बाद सो गई थी और कोर्ट के मुताबिक ‘एक भारतीय महिला के लिए शोभनीय नहीं है, बलात्कार के बाद महिलाएं ऐसे व्यवहार नहीं करती हैं।’ इसी साल हाल ही में उत्तर प्रदेश महिला आयोग की सदस्य मीना कुमारी ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ने के पीछे की वजह उनका मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना है। लड़कियों को फोन नहीं देना चाहिए, लड़कियां फोन पर लंबी बात कर लड़कों के साथ भाग जाती हैं। साल 1974 से 2021, एक लंबा वक्त बीत दया लेकिन इतने लंबे समय में भी एक चीज़ नहीं बदली। वह है महिलाओं, लड़कियों के साथ होनेवाले अपराध के लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार ठहराना। ये तो हमने बस चंद उदाहरण दिए हैं। औरतों, लड़कियों के साथ होनेवाले अपराध के लिए हमेशा से ही उन्हें ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता रहा है। इस प्रक्रिया को हम विक्टिम ब्लेमिंग के नाम से जानते हैं।

महिलाओं के साथ होनेवाले अपराध के मामलों में विक्टिम ब्लेमिंग एक अहम पहलू है। चाहे वह अपराध यौन हिंसा हो, घरेलू हिंसा हो या किसी भी तरह का उत्पीड़न, अगर ये एक महिला के साथ होता है तो सबसे पहली जांच महिला के दावे, आरोप उसके आचरण, उसके चरित्र आदि की ही की जाती है। विक्टिम ब्लेमिंग का होना सर्वाइवर को एक तरह से दोबारा प्रताड़ित करना है। इससे न सिर्फ सर्वाइवर का मनोबल टूटता है बल्कि यह उनके न्याय पाने के संघर्ष को भी बढ़ाता है। विक्टिम ब्लेमिंग में सर्वाइवर को आरोपी के बजाय खुद पर उठाए गए सवालों के जवाब देने का भार उठाना पड़ता है। यह अतिरिक्त दबाव सर्वाइवर पर यह ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज ही डालता है जिसकी नज़रों में पुरुष का महिलाओं के प्रति हिंसा करना एक ‘सामान्य’ घटना है। महिला हिंसा व उत्पीड़न के मामलों में आरोपी जो अक्सर मर्द ही होते हैं उन्हें एक तरह का विशेषाधिकार मिला हुआ होता है। विक्टिम ब्लेमिंग का कॉन्सेप्ट क्यों प्रॉबलमेटिक है इसे हम अलग-अलग बिंदुओं में समझते हैं।

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महिलाओं के साथ होनेवाले अपराध के मामलों में विक्टिम ब्लेमिंग एक अहम पहलू है। चाहे वह अपराध यौन हिंसा हो, घरेलू हिंसा हो या किसी भी तरह का उत्पीड़न, अगर ये एक महिला के साथ होता है तो सबसे पहली जांच महिला के दावे, आरोप उसके आचरण, उसके चरित्र आदि की ही की जाती है।

1- सर्वाइवर्स के संघर्ष को बढ़ाना

जब जेंडर बेस्ड वॉयलेंस के मामले में आरोपी की जगह सर्वाइवर की जवाबदेही अधिक तय की जाने लगती है तो यह सर्वाइवर के न्याय पाने के संघर्ष को और अधिक बढ़ाता है। उदाहरण के तौर पर मथुरा रेप केस लीजिए। जब कोर्ट द्वारा यह कहा गया कि मथुरा को सेक्स की आदत थी और इस आधार पर आरोपियों को ज़मानत दी गई तो यहां मामले में सारा ध्यान आरोपियों की जगह मथुरा की ओर चला गया। भंवरी देवी के मामले में कोर्ट का यह कहना कि सवर्ण जाति के पुरुष शोषित जाति की महिला का बलात्कार कैसे कर सकता है। पहले से ही जातिवादी पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित समाज यहां कोर्ट के इन वक्तव्यों को सही मानने से क्यों इनकार करेगा। 

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जब किसी के साथ लैंगिक हिंसा होती है तो जेंडर के आधार पर समाज पहले ही सर्वाइवर के आरोपों और दावों की स्क्रूटनी कर चुका होता है। तमाम चुनौतियों के बाद जब कोई सर्वाइवर कोर्ट पहुंच भी जाती है तो उसे वहां भी विक्टिम ब्लेमिंग का सामना करना पड़ता है। लोकतांत्रिक संस्थाओं से आनेवाली ऐसी टिप्पणियां सर्वाइवर के न्याय पाने के संघर्ष को बढ़ाते हैं। ये दूसरे सर्वाइवर्स की हिम्मत भी तोड़ने का काम करते हैं। ऐसे फैसलों और समाज की रूढ़िवादी सोच विक्टिम ब्लेमिंग सर्वाइवर पर भरोसा न करने की पैरवी करता। इसलिए विक्टिम ब्लेमिंग एक बड़ी वजह है जिसके कारण महिलाएं अपने साथ हुई हिंसा को रिपोर्ट करने से कतराती हैं। विक्टिम ब्लेमिंग के कारण एक सर्वाइवर के मन में यह घर कर जाता है कि अपने साथ हुई हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने पर मुमकिन है उन्हें ही दोषी मान लिया जाए। यह भी देखा गया है कि अन्य अपराधों के मुकाबले हमेशा ही लैंगिक हिंसा के मामलों में ही सर्वाइवर को दोषी माना जाता है। वह भी तब जब लैंगिक हिंसा/यौन हिंसा उन अपराधों में शामिल हैं जिन्हें सबसे कम रिपोर्ट किया जाता है।

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2- सर्वाइवर को अच्छे और बुरे के खांचे में बांटना

विक्टिम ब्लेमिंग में हमेशा ही सर्वाइवर के कपड़ों, उनके कैरेक्टर, अपराध के वक्त वे कहां, कब, किसके साथ थीं जैसे मुद्दों पर सवाल खड़े किए जाते हैं। इससे ये साबित करने की कोशिश की जाती है कि ऐसी महिलाओं के साथ ऐसा ही होता है। इससे यह भी संदेश जाता है कि सर्वाइवर के साथ जो हुआ उसे वे ‘डिज़र्व’ करती थीं। दूसरी महिलाओं के लिए इसे एक नज़ीर की तरह पेश किया जाता है। दिखाने की कोशिश की जाती है कि अगर महिलाएं ऐसी स्थिति में खुद को डाले ही न तो उनके साथ कोई अपराध होगा ही नहीं। हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की साल 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक 93% रेप केस के मामलों में आरोपी, सर्वाइवर को जानते थे। 

3-मर्द हमेशा मर्द ही रहेंगे

विक्टिम ब्लेमिंग इस सोच को भी बढ़ावा देता है कि ‘मर्द हमेशा मर्द ही रहेंगे।’ इस सोच के कारण आरोपियों को पहले से ही एक विशेषाधिकार दे दिया जाता है, वह विशेषाधिकार जो यह कहता है कि मर्दों से गलतियां तो हो ही जाती हैं। यह सोच यौन हिंसा जैसे गंभीर अपराध को बेहद नॉर्मलाइज़ करने की कोशिश करती है। मर्दों को ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक ढांचे के तहत न सिर्फ उनके लिंग के आधार पर बल्कि उनकी जाति, उनके वर्ग, धर्म आदि के आधार पर भी विशेषाधिकार प्राप्त होता है। हाथरस गैंगरेप के बाद पीड़िता के गांव में ही उच्च जाति के लोगों द्वारा आरोपियों के समर्थन में पंचायत बुलाई गई थी। यह उनकी जाति का विशेषाधिकार और हमारे समाज की ब्राह्मणवादी सोच ही थी जिसके बलबूते वे आरोपियों का समर्थन खुलकर कर रहे थे। याद कीजिए कठुआ में एक नाबालिग के बलात्कार के बाद कैसे बीजेपी से जुड़े लोगों ने आरोपियों के समर्थन में तिरंगा रैली का न सिर्फ समर्थन किया था बल्कि शामिल भी हुए थे। यहां भी उनका विशेषाधिकार ही जो उन्हें सत्ता से मिला था।

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4- सर्वाइवर की जवाबदेही तय करना

विक्टिम ब्लेमिंग की मानें तो यौन हिंसा जैसे अपराधों से बचने की ज़िम्मेदारी महिलाओं को खुद उठानी चाहिए। जैसे उन्हें छोटे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, उन्हें रात को बाहर नहीं जाना चाहिए, लड़कों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए। ऐसी अनगिनत सलाहें महिलाओं को बचपन से ही दी जाती हैं। अगर ऐसे हालात सामने आए भी तो सलाह दी जाती है। “सेफ्टी पिन लेकर चलो, पेपर स्प्रे बैग में रखा करो! भीड़भाड़ वाले इलाकों, बसों, मेट्रो में ट्रैवल करने से बचो!” समस्या के मूल कारण ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, जाति, वर्ग, धर्म के विशेषाधिकार, पुलिस, न्यायपालिका और अन्य संस्थानों की कमियों, नीतियों की आलोचना की जगह, इनकी जवाबदेही तय करने की बजाय हमेशा लैंगिक हिंसा के लिए एक व्यक्ति विशेष जो कि अधिकतर मामलों में सर्वाइवर ही होते हैं उनकी तय कर दी जाती है। जो लोग पितृसत्ता द्वारा तय किए गए इन नियमों को मानने से इनकार कर देते हैं और उनके साथ हिंसा होती है तो हमारा समाज बड़ी आसानी से सारा दोष सर्वाइवर पर ही मढ़ देता है। साल 2018 में भारत में #Metoo आंदोलन के दौरान ऐसा ही देखने को मिला था। जब लगातार सर्वाइवर्स से ही सवाल किए गए थे। उनकी ही जवाबदेही तय की गई।

5-लैंगिक हिंसा को बर्दाश्त करो

घरेलू हिंसा से लेकर बलात्कार तक के मामलों में अक्सर एक बात ज़रूर कही जाती है-,”लोग क्या कहेंगे। अगर पति मारता है तो थोड़ा बर्दाश्त करो, अगर किसी ने यौन हिंसा की तो चुप रहो, शादी कैसे होगी?” यह सोच विक्टिम ब्लेमिंग से ही आती है जो सर्वाइवर्स को यह सिखाती है कि उन्हें हिंसा को बर्दाश्त या नज़रअंदाज़ करना चाहिए। हमारे समाज में ख़ासकर घरेलू हिंसा के मामले में सर्वाइवर को समझौत करने, सह लेने या अपने व्यवहार में बदलाव लाने जैसी सलाह दी जाती है। विक्टिम ब्लेमिंग सर्वाइवर के हिंसा चक्र में फंसे रहने की वकालत करती है क्योंकि इस विचारधारा के मुताबिक हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने पर सर्वाइवर की ही जवाबदेही तय की जाएगी। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का आधार इतना मज़बूत है कि सर्वाइवर द्वारा आवाज़ उठाने से पहले और आवाज़ उठाने के बाद, दोनों ही परिस्थितियों में सर्वाइवर को ही दोषी ठहराने के लिए यह समाज हमेशा तैयार रहता है।

6- मीडिया की भूमिका

विक्टिम ब्लेमिंग में मीडिया की भी एक बड़ी भूमिका होती है। जिस तरीके की तस्वीरें, हेडलाइन या भाषा यौन हिंसा की खबरों में इस्तेमाल की जाती है, उनमें अक्सर सर्वाइवर पर ही अधिक फोकस रहता है।

विक्टिम ब्लेमिंग की सोच को अधिक बढ़ावा न मिले इसमें मीडिया एक ज़रूरी भूमिका निभा सकता है। 

-ऐसी तस्वीरों का इस्तेमाल न करें जिसमें सर्वाइवर को कमज़ोर दिखाया जाए।

-ऐसी भाषा का इस्तेमाल न करें जिसमें सर्वाइवर पर अधिक फोकस हो बजाय आरोपी के।

-ऐसी हेडलाइन का इस्तेमाल न करें जो यौन हिंसा मुद्दे को सनसनीखेज़ बनाएं।

इस पर अधिक जानकारी के लिए आप मीडिया और जेंडर बेस्ड वॉयलेंस पर आधारित हमारे इस टूलकिट की मदद ले सकते हैं। विक्टिम ब्लेमिंग हर जगह है। हमारे घर, परिवार, समाज से लेकर कोर्ट रूम्स तक। ये सर्वाइवर्स के न्याय पाने की उम्मीद को खत्म करता है इसलिए इसे चुनौती देना ज़रूरी है। विक्टिम ब्लेमिंग को खत्म करने के लिए ज़रूरी है कि हम इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाएं, सर्वाइवर्स के प्रति संवेदनशील हो, उन पर भरोसा करें, उन्हें यह एहसास दिलाएं कि वे कहीं से भी गलत नहीं हैं। जेंडर बेस्ड वॉयलेंस पर मीडिया की असंवेदनशील कवरेज पर सवाल करें।

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तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

Ritika is the Managing Editor at Feminism in India (Hindi). Ritika is an award-winning multimedia journalist with over five years of experience. She is a passionate advocate for social justice and gender rights, and has been awarded the prestigious UN Laadli Media Awards twice and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing and reporting. She is also a fellow of Rise Up (Youth Championship Initiative).

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