जेबुन्निसा
तस्वीर साभार: Wikipedia
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इतिहास की एक जानी-मानी शायरा, कवयित्री और अपनी मोहब्बत के किस्सों से मशहूर जेबुन्निसा का जन्म मुग़ल परिवार में 15 फरवरी 1638 को हुआ। जेबुन्निसा अपने पिता औरंगजेब की वह पसंदीदा बेटी थी, जिसके कहने पर औरंगजेब कई लोगों को माफ़ कर दिया करते थे। लेकिन आगे चलकर अपनी इसी बेटी औरंगजेब ने 20 सालों तक कैद करके रखा।

हाफीज़ा मारिम जो दरबार की महिलाओं में से एक थी, को जेबुन्निसा की शिक्षा का काम सौंपा गया। जेबुन्निसा ने सात साल की उम्र में ही कुरान को याद कर लिया था। इस अवसर को उनके पिता औरंगजेब ने एक महान दावत और सार्वजनिक अवकाश के साथ मनाया। राजकुमारी ने काफी कम उम्र में अपने विशाल महल की लाइब्रेरी (किताबघर) भी खंगाल दिया था और फिर इनके लिए बाहर से भी किताबें मंगवाई जाने लगीं। अपने पिता के द्वारा दिए पैसों से पुराने ग्रंथो को अपनी भाषा में समझने के लिए अनुवाद करवाती थीं और फिर उन्हें पढ़ती थीं।

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जेबुन्निसा मख़्फ़ी नाम से जानी गई

वक्त के साथ जेबुन्निसा एक बेहतरीन शायरा के तौर पर उभरी। उनके पिता इसके ख़िलाफ़ थे। उन्हें यह कतई बर्दाश्त ना था कि राजकुमारी मुशायरा में जाएं। लिहाजा उनकी बेटी छिपकर महफिलों में शिरकत करने लगीं। जेबुन्निसा फारसी में कविताएं लिखती और अपने पिता से छिपाने के लिए अपना नाम बदलकर ‘मख़्फी’ के नाम से लिखा करती।

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‘कहते हो तुम ना घर मिरे आया करे कोई
पर दिल ना रह सके तो भला क्या करे कोई’

लंबे कद वाली जेबुन्निसा को शायरी के साथ कपड़ों की भी गहरी समझ थी। जेबुन्निसा आमतौर पर सादा रहती थी लेकिन मुशायरे के लिए अलग ढंग से तैयार होती थी। वह सफे़द पोशाक और सफे़द रंग के मोतियों से बने जेवरात पहनती।

जेबुन्निसा की पेंटिंग,  Abanindranath Tagore द्वारा

जेबुन्निसा ने मराठा छत्रपति शिवाजी की बहादुरी को लेकर कई किस्से सुन रखे थे। सोमा मुखर्जी की किताब ‘रॉयल मुग़ल लेडीज़ एंड देयर कॉन्ट्रीब्यूशन‘ के मुताबिक अपनी शायरी की तरह जेबुन्ननिसा ने अपनी मोहब्बत के लिए भी अपने पिता से बगवात की। एक बार तब जब उन्होंने शिवाजी महाराज को औरंगजेब से बचने में मदद की। पिता के पहरे के बीच जेबुन्निसा का दिल कुछ इस कदर टूटा कि वह शेर-ओ-शायरी मैं कुछ इस कदर डूब गई कि वह मुशायरा और महफिलों में शिरकत करने लगी। मुशायरे के दौरान राजकुमारी को शायर अकील खां रज़ी से इश्क हो गया लेकिन यह मोहब्बत भी जल्द ही चर्चा में आ गई।

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वक्त के साथ जेबुन्निसा एक बेहतरीन शायरा के तौर पर उभरी। उनके पिता इसके ख़िलाफ़ थे। उन्हें यह कतई बर्दाश्त ना था कि राजकुमारी मुशायरा में जाएं। लिहाजा उनकी बेटी छिपकर महफिलों में शिरकत करने लगीं। जेबुन्निसा फारसी में कविताएं लिखती और अपने पिता से छिपाने के लिए अपना नाम बदलकर ‘मख़्फी’ के नाम से लिखा करती।

जेबुन्निसा की कविताएं और गजल

वह आजीवन अविवाहित रहीं। कैद के दौरान जेबुन्निसा ने हज़ारों गजलें शेर, रुबाइयां , कविताएं, संकलन लिखे। राजकुमारी की रुबाइयां, ग़ज़लें और शेरों के अनुवाद अंग्रेजी, फ्रेंच और अरबी सहित कई विदेशी भाषाओं में हुए हैं।

आ कर हमारी लाश पे क्या यार कर चले
ख़्वाब-ए-अदम से फ़ित्ने को बेदार कर चले

जेबुन्निसा की बग़ावत

जेबुन्निसा अपनी आवाम (जनता) के प्रति प्रेम और दया की भावना रखती थी। वह अपने पिता से मिलनेवाली सोने की अशर्फियों को लोगों की मदद करने में लगा देती थी। राजकुमारी ये सब अपने पिता को बिना बताए करती थी। 1681 में शहज़ादे अकबर ने औरंगजेब के खिलाफ एक बड़ी बगावत की जिसमें राजकुमारी जेबुन्निसा ने भी उनकी मदद की थी। इतिहासकारों के अनुसार राजकुमारी की बगावत ही उनको जेल में डालने का एक बड़ा कारण था। वहीं, दूसरी वजह यह भी बताई जाती है कि उन्हें कैद शिवाजी की मदद करने के लिए किया गया था। कैद में रहते-रहते राजकुमारी बीमार पढ़ने लगी और जेल में ही उन्होंने अपनी कविताओं और गज़लों से बगावत के पैगाम लिखे। राजकुमारी ने 26 मई 1702 को सलीमगढ़ के किले की कैद में अपना दम तोड़ दिया।

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तस्वीर साभार : Wikipedia

स्रोत :

Rekhta.org
Wikipedia
Royal Mughal ladies and their contributions

मेरा नाम हिना है और मैं 21 साल की हूं मैं दिल्ली के नॉर्थ ईस्ट इलाका सुंदर नगरी में रहती हूं। मैंने 2021 में अपनी ग्रेजुएशन पूरी की है। मेरी दिलचस्पी हमेशा से ही सामाजिक कामों में रही है जैसे किसी भी तरह से लोगों की मदद करना ,उनकी समस्याओं को सुनना ,उन्हें उनका समाधान बताना ,उस समाधान के लिए रास्ता बताना। क्योंकि मैं एक लड़की हूं तो मैं ये जानती हूं कि समाज में लिंग आधारित भेदभाव शुरू से ही चलता आ रहा है और ये मैने खुद ने भी सहा है। जब हम चीजों को खुद से देखते है और हमारे इर्द गिर्द हो रही सामाजिक क्रुतियों को महसूस कर पाते है तब समाज और जिंदगी का असली पहलू पता चलता है और इन्ही चीजों ने मुझे  प्रोत्साहित किया मीडिया की तरफ जाने के लिए और सामाजिक कार्यों से जुड़ने के लिए।

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