पुष्पा
पुष्पा फिल्म रिव्यू
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काफी नया बदलाव है यह हम सभी के लिए जहां सिर्फ हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री ही एक अकेली इंडस्ट्री नहीं रही है। अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों की फिल्म इंडस्ट्रीज़ काफी नई अलग कहानियां लिए हमारे सामने आ रही हैं। यह कहीं ना कहीं हिन्दी सिनेमा की मोनोपॉली को चुनौती दे रही है। साथ ही ये फिल्में हिंदी भाषा की सीमा को तोड़ते हुए विविधता को बढ़ावा दे रही हैं। हालांकि, अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी कहानी का मुख्य किरदार अक्सर एक हीरो ही होता है। एक परफेक्ट हीरो बनने के लिए उनका पुरुष होना ही काफी है। पुरुष जो पितृसत्तात्मक नियमों के अनुसार बर्ताव करता है।

ऐसे ही पितृसत्तात्मक विचारों पर आधारित नज़र आती है, हाल ही में रीलीज़ हुई सुपरहिट फिल्म ‘पुष्पा।’ फिल्म में सत्ता का विरोध, मिल मालिकों को चुनौती देना, चंदन की लकड़ी की तस्करी और पुलिस से भिड़ना जैसे सीन दिखाए गए हैं। विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न का सामना करनेवाले मज़दूरों का प्रतिनिधित्व दिखाया गया है। इन्हीं में से एक है ‘पुष्पा’ जो खुद से प्यार करने वाला आदमी है। वह अपने नाम को फूल के बजाय आग के रूप में परिभाषित करता है।

पुष्पा में कुछ अच्छी चीज़ें भी दिखाई गई हैं। जैसे अगर मज़दूर एक साथ आकर लड़ें तो उनकी ताकत कितनी बड़ी है, जिसकी बुनियाद पर उन पर होनेवाला हर शोषण रोका जा सकता है। साथ ही यह भी दिखाया गया कि अगर कोई मजदूर कहीं काम करता है तो वह बस अपना श्रम बेच रहा है खुद को नहीं। हालांकि, पुष्पा के मुद्दे हाशिए पर पड़े और वंचितों के सुलगते गुस्से के विपरीत हैं, और सामाजिक उथल-पुथल के लिए विद्रोह से जुड़ा उलगुलान यहां नहीं दिखता। पुष्पा के लिए हर लड़ाई खुद के साथ हुए अन्याय के प्रतिशोध के रूप में सामने आती है। यहां दांव पर कुछ भी बड़ा नहीं है और इन सभी का इस्तेमाल पुष्पा ने सिर्फ अपने खुद के फायदे के लिए किया। मज़दूरों से जुड़े सभी मुद्दों को थोड़ी देर के बाद ही कहानी से साइडट्रैक कर दिया जाता है।

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अपने पिता का सरनेम पाने से इज्ज़त और मान सम्मान मिलेगा और इसी के लिए फिल्म का प्रमुख पात्र लड़ता रहता है।  क्या कभी भी वह सोचता है कि वह अपनी माँ का नाम और सरनेम लगाकर भी तो जी सकता है। क्या उसने अपनी माँ का नाम लगाने के बारे में कभी सोचा?

पिता का नाम ही है ‘सबकुछ’

पुष्पा का गुस्सा एक ‘नाजायज़’ बच्चे होने का अपमान, उपनाम का सही हकदार नहीं होने का अपमान, परिवार के ‘ब्रांड मूल्य’ की मोहर न होने की अयोग्यता से पैदा होता है।  यह एक पितृसत्तात्मक निर्माण ही है। एक तरफ पुष्पा का किरदार दावा करता है कि वह अपनी माँ से सबसे अधिक प्रेम करता है पर वह कभी उसकी कोई बात नहीं सुनता बल्कि अपनी मां के बिना कुछ पूछे या कहे उसकी लड़ाई लड़ने का काम करता है। पुष्पा की लड़ाई को निष्पक्ष और सही साबित करने के लिए इस पूरी फिल्म में नाम और सरनेम को ब्रांड मूल्य से जोड़ा गया है जो पितृसत्तात्मक समाज का एक महत्वपूर्ण जरूरी घटक है। अपने पिता का सरनेम पाने से इज्ज़त और मान-सम्मान मिलेगा और इसी के लिए फिल्म का प्रमुख पात्र लड़ता रहता है। क्या कभी भी वह सोचता है कि वह अपनी माँ का नाम और सरनेम लगाकर भी तो जी सकता है? क्या उसने अपनी माँ का नाम लगाने के बारे में कभी सोचा?

फिल्म का एक दृश्य, तस्वीर साभार: New India Express

पितृसत्ता पर आधारित ‘प्रेम कहानी’ 

पुष्पा मूवी में अगर देखें तो हमें काफी ऐसे सीन मिल जाएंगे जहां ‘कंसेंट’ की धज्जियां उड़ रही होती हैं। यहां तक ​​कि श्रीवल्ली (रश्मिका मंदाना) के एकतरफा प्यार में है पुष्पा। अगर वह मुस्कुराती है या उसे किस करने के लिए राजी होती है, तो वह उसे पसंद करती है, वरना वह आगे बढ़ जाएगा। श्रीवल्ली जिसे पुष्पा पसंद करने का प्यार करने का दावा करता है, किस तरह से उसकी किस खरीदता है, किस तरह श्रीवली कहती है कि अपना पहला किस वह जिससे शादी करेगी उसे ही देगी।

श्रीवल्ली पुष्पा से कहती है कि उसे लगा कि वह उससे प्यार करता है जबकि वह दुखी था कि वह उसे नहीं देख रही थी। एक तरह से पुष्पा श्रीवल्ली का पीछा करता रहता है। जब उसे चूमने के लिए पुष्पा ने पैसे दिए तो श्रीवल्ली ने सोचा कि यह पुष्पा के प्यार का इज़हार करने का तरीका है। यही कारण है कि उसने उस दिन यह कहकर उसे चूमने से इनकार कर दिया कि यह उसके पति के लिए है। इसका मतलब यह था कि वह चाहती थी कि वह उससे शादी करने के लिए कहे। फिल्म के सबसे परेशान करनेवाले दृश्यों में से एक है जब ,जोली रेडी (जो महिलाओ का हमेशा शोषण करते हुए दिखाया गया है) श्रीवल्ली को उसके साथ सोने (बलात्कार करने) की मांग करता है। कोई भी नायक यह सुनकर क्रोध से भर सकता है कि उसके प्रेमी के साथ बलात्कार होने वाला है, लेकिन पुष्पा इससे परेशान नहीं होता है। इसके बजाय उसे जोली रेडी के पास चले जाने की सलाह देता है।

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अगले दृश्य में जो नारीवाद को 1000 साल पहले ले जाता है, जहां श्रीवल्ली स्वीकार करती है कि वह उसकी मदद नहीं करेगा लेकिन वह अभी भी अपना पहला चुंबन और पहली रात पुष्पा जैसे किसी व्यक्ति के साथ साझा करना चाहती है जिसे वह अपना पति मानती है। बाद में, वह हमेशा के लिए उसके जीवन से गायब हो जाएगी। ये कहते हुए पितृसत्तात्मक नियम जो मर्यादा, शर्म और पवित्रता जैसे फालतू शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। अपनी इच्छा के विरुद्ध जाकर ऐसे फैसले लेना अच्छी स्त्री होने का पर्याय है जो इस पितृसत्तात्मक समाज को स्वीकार है।

एक सीन में पुष्पा श्रीवली गाड़ी मे बैठे होते हैं, तब पुष्पा श्रीवल्ली की छाती को हाथ लगाता है और श्रीवल्ली के हाथ झटकने के बाद उसे निकल जाने की धमकी देता है जिसे सुन श्रीवली उसका विरोध नहीं करती। फिल्म में महिलाओं के खिलाफ पुरुषों की हिंसा को बेवजह और जरूरत से ज्यादा दिखाया गया है जिससे ट्रॉमा होता है।

यह हमारे नायक को प्रेरित करता है, जिसे तब उसकी मूर्खता का एहसास होता है और वह बलात्कारी से लड़ने जाता है क्योंकि अब वह किसी को उसे छूने नहीं देगा क्योंकि वह उसकी है। यह वही इंसान है जिसकी पोटेंशियल रेपिस्ट को लेकर कोई संवेदना नहीं जागती। लेकिन जब श्रीवली अपनी पहली रात उसके साथ बिताने का और यह कहती है कि वह उसे प्यार करती है। तब पुष्पा को एहसास होता है कि श्रीवल्ली उसकी है, जैसे कि वह उसकी निजी संपत्ति हो। सिर्फ इसी कारण पुष्पा श्रीवली का हाथ पकड़कर अपनी मर्दानगी दिखाते हुए जोली रेडी को मारता है। वह रोती है, छिपती है और सिहरती है और उसकी छाती में अपना चेहरा रख देती है।

तस्वीर साभार IndiaGlitz

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मुझे आश्चर्य है कि क्या अधिकांश भारतीय महिलाएं सुरक्षा करनेवाले, मर्दाना पुरुष, उद्धारकर्ता के इस आदर्श रूप की लालसा रखती हैं। मजे की बात यह है कि चाहे वह नायक हो जो उसे अपने पास रखना चाहता हो या खलनायक जो शोषण करना चाहता हो, उसके लिए मुश्किल से ही कोई विकल्प होता है। यह सब पुरुषों का उबलता अहंकार है और पुष्पा इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है। फिल्म महिलाओं में पवित्रता और विनम्रता का महिमामंडन करती है।

एक सीन में पुष्पा श्रीवली गाड़ी मे बैठे होते हैं, तब पुष्पा श्रीवल्ली की छाती को हाथ लगाता है और श्रीवल्ली के हाथ झटकने के बाद उसे निकल जाने की धमकी देता है जिसे सुन श्रीवली उसका विरोध नहीं करती। फिल्म में महिलाओं के खिलाफ पुरुषों की हिंसा को बेवजह और जरूरत से ज्यादा दिखाया गया है जिससे ट्रॉमा होता है। जैसा कि सिमोन द बोवुआ कहती हैं, “मर्दों के हाथों से सत्ता छीनना काफी नहीं है। हमें जरूरत है सत्ता की परिभाषा बदलने की।”

पुष्पा मसाला फिल्मों की श्रेणी में आती है और ऐसी फिल्में अतिशयोक्ति पर पनपती हैं। महिलाओं को इस असहाय और भोली के रूप में चित्रित करने की क्या आवश्यकता है। क्यों हमेशा गरीबों को गंदा, बतमीज़ और हिंसक दिखाया जाता है? क्यों ऐसा दिखाया जाता है कि गरीब खुद के विकास के लिए गलत रास्तों से ही काम करता है? क्या ऐसी फिल्में बनाना असंभव है जहां महिलाओं की अपनी आवाज हो?  साथ ही, क्या फिल्म में किरदारों को ब्राउनफेस करना वाकई जरूरी था?

फिल्में हमारे समाज का आइना है ये बात हमे नहीं भुलनी चाइए क्योंकि फिल्म निर्माण करनेवाले भी हमारे समाज का ही हिस्सा हैं। लोग जिन चीजों को पसंद करते है उसे ही आर्थिक फ़ायदों के लिए बनाया भी जाता है। फिल्म जो कला और मनोरंजन का फिलहाल के समय में खासा बड़ा माध्यम है, अगर वह ही जेंडर,जाति, वर्ग, नस्ल और धर्म के आधार पर होनेवाली हिंसा और असमानता को लेकर संवेदनशील न हो तो सवाल उठता है।

किस प्रकार फिल्में समाज की रचना में प्रगतिशील विचारों को लोगों तक पहुंचाने में, असमानता की दीवारों को तोड़ने में, रूढ़िवादी सोच और परंपरा के विरोध में कैसे अपना योगदान दे पाएंगी? इस सच्चाई के साथ समाज के समानता पूर्ण बदलाव के लिए फिल्म और फिल्म निर्माता भी हम जितने ही जिम्मेदार हैं। हमें जरूरत है इस एहसास को उनके साथ सभी के दिलों मे कायम करने की क्योंकि “एक पीढ़ी का पाखंड अगली पीढ़ी की परंपरा बन जाती है।”

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तस्वीर साभार : Screengrab from YouTube

मेरा नाम मानसी उषा है। बचपन से ही दोस्तों के रूप में मेरी जिंदगी में इंसान कम और किताबें ज्यादा रही हैं। अनेक विचार, तत्वज्ञान पढ़े पर में किसी एक विचार को या "वाद" को नहीं मानती। मैं एक वास्तववादी नास्तिक हूं जो विश्ववास और प्रेम करता है प्रकृति के प्रजनन और असीम संभावनाओं में। चित्र निकालना, नई जगह जाना नए लोगों से मिलना, बातें करना तथा वहां की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक स्थिति को समझना। मैंने अभी फिलहाल में अपना ग्रैजुएशन साइकॉलजी में पूरा किया है और कई सामाजिक संस्थाओं तथा संगठन से जुड़ी हुई हूं। अपनी नींद और खाने से सबसे ज्यादा प्यार है।

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