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एक संस्कृति से ताल्लुक रखने वाले दो बिल्कुल अलग तरह के लोग और उनकी शादी की कहानी को बयान करती है फिल्म ‘मीनाक्षी सुंदरेश्वर।’ यह फिल्म शादी में स्थित लॉग डिस्टेंस रिलेशनशिप और उसके बीच आनेवाली दिक्कतों पर आधारित है। साथ ही दबी आवाज़ में उन पहलूओं को भी दिखाती है जिनका सामना हमारी पितृसत्तात्मक सामाजिक पृष्ठभूमि में शादी और परिवार के भीतर एक महिला करती है। आत्मविश्वास से भरी, रजनीकांत की फैन लड़की की भूमिका मीनाक्षी को सान्या मल्होत्रा ने निभाया है। दूसरी और शर्मीले स्वभाव के अंतर्मुखी और परिवार का घरेलू साड़ी का बिजनेस छोड़ इंजीनियरिंग में करियर बनाने का सपना रखने वाले लड़के सुंदरेश्वर का किरदार अभिमन्यु दसानी ने निभाया है। यह पूरी कहानी फिल्म के मुख्य किरदारों के इर्द-गिर्द ही घूमती है।

फिल्म का निर्देशन विवेक सोनी ने किया है और कहानी अर्श वोरा ने निर्देशक के साथ मिलकर लिखी है। इस फिल्म को प्रोड्यूस करन जौहर ने अपूर्व मेहता और सोनम मिश्रा के साथ मिलकर किया है। फिल्म का संगीत जस्टिन प्रभाकरन ने दिया है। ‘मन केसर केसर’ गीत के संगीत में दक्षिणी कोरस का फ्लेवर सुनने में अच्छा लगता है।  फिल्म की लोकशन के लिए बनाये दृश्य देखने में अच्छे लगते है। दक्षिण भारतीय परिवार और शहर के लिए, बॉलीवुड की फिल्मों में जिस तरह के स्टीरियोटाइप तरीकों का इस्तेमाल होता आया है वैसा ही इस फिल्म में भी किया गया है। मीनाक्षी के किरदार में सान्या मल्होत्रा अच्छी लगी हैं। रेस्तरां में रजनीकांत के डायलॉग बोलने वाले सीन भी उन्होंने बखूबी निभाए हैं। उनसे इतर डरे, सहमे सुंदरेश्वर के रोल में अभिमन्यु का काम भी अच्छा है। यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ की गई है।

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फिल्म की शुरुआत मदुरै में स्थित प्राचीन मंदिर मीनाक्षी सुंदरेश्वर की महत्वता और किरदारों के परिचय से होती है। यह कहानी सुंदरेश्वर के शादी के लिए लड़की देखने जाने के दौरान गलत पते पर मीनाक्षी के घर पहुंचने से शुरू होती है। जहां मीनाक्षी का परिवार भी उसे देखने आनेवाले लड़के के परिवार का इंतजार कर रहा होता है। गलतफहमी में दोनों के परिवार और लड़के-लड़की के बीच बातचीत शुरू होती है और अंत में शादी की बात पक्की हो जाती है। शादी के तुरंत बाद अगले ही दिन सुंदरेश्वर को नौकरी के लिए बेंगलुरु जाना होता है। जिस कंपनी में उसे नौकरी मिली वह कुवारे लोगों को ही काम पर रखती है। नौकरी पाने के लिए सुंदरेश्वर कंपनी में शादीशुदा न होने का झूठ बोलता है और एक साल तक वहां काम करने का कॉन्ट्रैक्ट भी साइन कर लेता है।

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पति के दूर शहर में नौकरी के चलते मीनाक्षी पहली बार बड़े परिवार में रहना स्वीकार कर लेती है। यहीं से फिल्म की कहानी में लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप मैरिज का मोड़ आता है। अलग-अलग शहरों में रहने के कारण उनके रिश्ते पर क्या प्रभाव पड़ता है और दोनों शादी में आई इस दूरी को कैसे संभालते हैं। इसी के साथ फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है। शादी में पति-पत्नी के दूर रहकर प्यार बरकरार रखने की मीनाक्षी सुंदरेश्वर एक साधारण सी कहानी है जिसमें लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप पर बात की गई है।

मीनाक्षी का नयी शादी में बिना पति के ससुराल में रहने पर उसकी भावनाओं और शारीरिक इच्छाओं को नज़रअंदाज़ करना, उसका बाहर जाकर काम करना जैसी बातों को मुख्य विषय के मुकाबले हल्के से उठाया जाता है। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसा अक्सर हमारे समाज के घरों में होता है। पति के करियर के लिए हमेशा बलिदान देती पत्नियों से ही यह उम्मीद की जाती है कि उसे पति की खुशी और तरक्की में ही अपनी कामयाबी देखनी है।

दक्षिण भारतीय पृष्ठभूमि के परिवार के किरदारों पर बनी यह कहानी बिना किसी ट्विस्ट के सीधी-सीधी चलती है। कहानी का सामान्य होना और पहले से ही पता चल चुके अंत के बावजूद फिल्म अंत तक देखी जा सकती है। कहानी के अनुसार दक्षिण भारतीय परिवार के किरदारों को वेशभूषा और लोकेशन के ज़रिये पूरी फील देने की कोशिश की गई है। हालांकि जब संवाद की बात आती है तो वह पूरी तरह से उत्तर भारतीय हिंदी वाले ही हैं। फिल्म के किरदारों की भाषा में तमिल के कुछ शब्दों तक ही सीमित करके के रखा गया है। किरदारों की बोलचाल का लहजा हिंदी वाला ही रखा गया है।

ज़रूरी मुद्दों को बस छूकर निकलती फिल्म

फिल्म की कहानी में दिखाए दूसरे पहलू की बात करें तो फिल्म में उनका ज़िक्र तो किया जाता है लेकिन तुरंत ही उनको छोड़ भी दिया जाता है। जैसे मीनाक्षी का नयी शादी में बिना पति के ससुराल में रहने पर उसकी भावनाओं और शारीरिक इच्छाओं को नज़रअंदाज़ करना, उसका बाहर जाकर काम करना जैसी बातों को मुख्य विषय के मुकाबले हल्के से उठाया जाता है। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसा अक्सर हमारे समाज के घरों में होता है। पति के करियर के लिए हमेशा बलिदान देती पत्नियों से ही यह उम्मीद की जाती है कि उसे पति की खुशी और तरक्की में ही अपनी कामयाबी देखनी है। साथ ही पति के काम के लिए झूठ बोलने वाला पहलू यह दिखाता है कि समाज में पुरुष जो चाहे वह कर सकता है, वह सबके सामने अपनी पत्नी को कबूल करने से भी मना कर सकता है। यह हमारे समाज और घर-परिवारों का दोहरा रवैया ही है जहां पुरुष को हर वह चीज़ करने की छूट मिली हुई है जिससे एक महिला के चरित्र-व्यवहार को मापा जाता है।

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मीनाक्षी का घर से बाहर जाकर काम करने की मनाही और पति की गैरमौजूदगी में पुरुष मित्र के साथ मिलना व काम करना उस स्टीरियोटाइप को जाहिर करता है जो हमारे समाज में बहुत गहराई से बसा हुआ है। यहां महिला का पुरुष मित्र होना उसके चरित्र को खराब बनाता है और शादी के बाद पति की गैरमौजूदगी में अगर ऐसी दोस्ती चलती है तो उसे अफेयर ही मान लिया जाता है। फिल्म में इस तरह की स्थिति को दिखाया तो गया है लेकिन उन पर ठहरकर बात नहीं कही गई है। फिल्म भारतीय संस्कृति के दोहरेपन पर खुलकर बात नहीं कर पाती है, लेकिन उन पहलूओं को छूकर ज़रूर जाती है। गौर करने पर फिल्म कई सारी उन समस्याओं को सतही तौर पर दिखाती है जो नये-शादीशुदा जोड़े को परिवार और संस्कृति के नाम पर झेलने पड़ते हैं। संयुक्त परिवार में खुद का स्पेस तलाशते जोड़े की बात को भी यहां कुछ दृश्यों में दिखाया गया है।

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दक्षिण भारतीय संस्कृति और बॉलीवुड का स्टीरियोटाइप

बॉलीवुड की फिल्में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृति को अपने चश्मे से ही दिखाती आ रही हैं। दक्षिण भारत हो या फिर पंजाब या कोई और राज्य बॉलीवुड क्षेत्रीय संस्कृति को एक निश्चित तय किए गए दायरे में ही दिखाता है। मीनाक्षी सुंदरेश्वर तमिल संस्कृति को बॉलीवुड की सीमित नज़र से दिखानेवाली ही एक फिल्म है। फिल्म में तमिल संस्कृति के अप्रमाणित तथ्यों को ही कहानी में दिखाया गया है। इस फिल्म में भाषा व उच्चारण, मांसाहारी खाने करने जैसी बातों पर आधारित दृश्य वहीं स्टीरियोटाइप दिखाते हैं, जो सालों से बॉलीवुड दक्षिण की संस्कृति को दिखाने के लिए इस्तेमाल करता आ रहा है। इस फिल्म में पुरुषों की पांरपरिक वेशभूषा ‘वेश्ती’ के लिए लुंगी का इस्तेमाल करना, ऐसा है जैसे उत्तर भारत में कहा जाता है कि दक्षिण में सब ऐसे ही कपड़े पहनते हैं। दूसरी दक्षिण भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म में रजनीकांत का ज़िक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता है। मीनाक्षी सुंदरेश्वर में भी फिल्म में अभिनेत्री के परिचय के पहले दृश्य से लेकर आखिरी दृश्य का सिरा रजनीकांत से ही जुड़ा हुआ है। धर्मा प्रोडक्शन जैसे बड़े बनैर तले बनी यह फिल्म बॉलीवुड की संस्कृति की समझ की सच्चाई दिखाने का ही काम करती है।

बॉलीवुड की फिल्में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृति को अपने चश्मे से ही दिखाती आ रही हैं। दक्षिण भारत हो या फिर पंजाब या कोई और राज्य बॉलीवुड क्षेत्रीय संस्कृति को एक निश्चित तय किए गए दायरे में ही दिखाता है। मीनाक्षी सुंदरेश्वर भी अलग-अलग संस्कृतियों को बॉलीवुड की सीमित नज़र से दिखानेवाली ही एक फिल्म है।

क्षेत्रीयता के स्टीरियोटाइप को गढ़ने में बॉलीवुड सिनेमा का बड़ा रोल रहा है। इसका दायरा केवल तमिल या दक्षिण भारत की संस्कृति तक ही सीमित नहीं है। यह गुजरात, बंगाल, महाराष्ट्र, नॉर्थ-ईस्ट, कश्मीर, पंजाब आदि के लिए भी उसी तरह के भाव रखता है। सालों से धर्म और क्षेत्र के आधार पर एक जैसे ही रोल और भाव देखने को मिलते हैं। मुस्लिम किरदारों का राष्ट्रवाद को साबित करना, मुंबई के व्यक्ति का मवाली होना और ईसाई या पारसी महिला का रिसेप्शन के पद पर काम करना, फिल्मों में स्थापित एक नजरिये को दिखाया जाता है। वास्तविक जीवन में जिस तरह से समाज में समुदायों को हाशिये पर रखा जाता है, उस स्टीरियोटाइप को बॉलीवुड फिल्मों में शामिल कर ऐसी बातों को मनोरंजन के नाम पर बढ़ावा देता है। फिल्मों में किसी भाषा, धार्मिक मान्यताओं पर उपहास और किसी व्यक्ति या समुदाय को वर्गीकृति करना रूढ़िवादी सोच का प्रतीक है। अब वक्त आ गया है कि बॉलीवुड पुराना चश्मा उतारकर चीज़ों को नये नज़रिये से देखे।

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तस्वीर साभारः  सान्या मल्होत्रा के इंस्टाग्राम से

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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