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मुझे फिल्में देखना बहुत पंसद है और मेरी पसंदीदा फिल्मों की लिस्ट में हॉरर मूवी सबसे ऊपर आती है। अब तक मैंने बॉलीवुड, हॉलीवुड, टॉलीवुड की कई हॉरर फिल्में देखी हैं और इन सभी फिल्मों को देखने के बाद इनमें मुझे एक समानता नज़र आई। वह यह कि हॉरर फिल्मों में सिर्फ अभिनेत्रियों को ही क्यों भूत बनाया जाता है? पूरी फिल्म की कहानी की रचना ऐसे की जाती है कि भूत सिर्फ अभिनेत्रियां ही बनती हैं। वे अपना बदला लेती हैं, बदला लेने में भी उसका मेन फोकस सिर्फ मेल एक्टर ही होते हैं। ऐसी फिल्मों की लिस्ट भी काफी बड़ी है जिसमें महिला भूत है और अपने बदले का शिकार वे पुरुषों को बनाती हैं।

उदाहरण के तौर पर साल 1988 में आई ‘वीराना’ फिल्म जिसमें फिल्म की हीरोइन चुड़ैल बनकर कई मर्दों को अपनी ‘खूबसूरती’ के जाल में फंसाकर उनके साथ संबंध बनाकर उन्हें मार डालती है। लाज़मी था कि फिल्म काफी डरावनी साबित हुई और बॉक्स ऑफिस पर चली भी। इसी तरहस साल 2013 में निर्देशक कन्नन अय्यर ने फिल्म बनाई ‘एक थी डायन।’ फिल्म की कहानी में दिखाया गया कि बचपन की सुनाई भूत ,पिशाच, डायन की कहानी बच्चों के मनोविज्ञान पर क्या असर डालती है। वह बच्चा उम्र भर सभी औरतों को डायन मानता है। इस फिल्म में इमरान हाशमी ने अपनी दूसरी मां को डायन के रूप में देखा। फिल्म में कलकी जो विदेशी महिला के रोल में हैं उनको इमरान ने डायन समझा। पूरी फिल्म में इमरान ने सभी महिलाओं को डायन समझकर उनको उसी नज़रिए से देखा।

इसी कड़ी में साल 2018 में फिल्म आई ‘स्त्री ‘जो एक हॉरर कॉमेडी के रूप में बॉक्स ऑफिस पर उतरी। फिल्म की कहानी में एक चुड़ैल है जो रात के समय मर्दों को गायब कर देती है उसे ही ‘स्त्री’ का नाम दिया गया। हाल फिलहाल में मूवी आई ‘रूही’ जिसका नाम एक लड़की के नाम पर रखा गया और फिल्म की मुख्य किरदार पर एक चुड़ैल का साया है। चुड़ैल भी कोई आम नहीं ऐसी चुड़ैल जिसके पैर उल्टे हैं। ‘मुड़ियापैरी’ नाम की इस चुड़ैल की ख्वाहिश होती है शादी करना। जो कुंवारी लड़कियों के शरीर में घुसकर शादी करती है। एक नहीं ऐसी दर्जनों फिल्में हैं जिसमें सिर्फ महिलाएं चुड़ैल, भूत, डायन के रोल में हैं और लोगों ने इन फिल्मों को बेहद पसंद भी किया है।

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हॉरर फिल्मों में मुझे एक समानता हमेशा नज़र आई कि हॉरर मूवीज़ में सिर्फ अभिनेत्रियों को ही क्यों भूत बनाया जाता है? पूरी फिल्म की कहानी की रचना ऐसे की जाती है कि भूत सिर्फ अभिनेत्रियां ही बनती हैं। वे अपना बदला लेती हैं, बदला लेने में भी उसका मेन फोकस सिर्फ मेल एक्टर ही होते हैं। ऐसी फिल्मों की लिस्ट भी काफी बड़ी है जिसमें महिला भूत है और अपने बदले का शिकार वे पुरुष को बनाती हैं।

फिल्में कैसे पितृसत्ता का परिचय देते हुए इन अंधविश्वासों को बढ़ावा दे रही हैं

बॉलीवुड की हॉरर फिल्में बॉक्स ऑफिस पर जब आती हैं तो अधिकतर सुपर-डुपर हिट साबित होती हैं। लोग बड़े चाव से इन फिल्मों को देखते हैं। लोगों के बीच इसका खुमार ऐसा चढ़ता है कि कई फिल्मों के डायलॉग या सीन सालों तक लोगों की जुबान पर और यादों में तरोताज़ा रहते हैं। डरावनी फिल्मों में मशहूर ‘वीराना’ फिल्म जिसमें चुड़ैल बनी जैस्मिन के बाथटब में नहाते हुए बेहद डरावना सीन को आज तक याद किया जाता है। इस फिल्म को दुनिया के नजरिए से न देखकर नारीवादी चश्मे से देखा जाए तो नज़र आती है वह पितृसत्तात्मक सोच जिसमें कोई आम महिला हो या चुड़ैल उसका चित्रण मेल गेज़ से ही किया जाता है। 

फिल्म ‘एक थी डायन ‘ जिसमें डायन की पहचान है वह औरत जो बेहद खूबसूरत है और उसकी शक्ति का राज है उसके लंबे बाल जिसे काटकर उस पर जीत हासिल की जा सकती है। ‘एक थी डायन’ मूवी निसंदेह औरतों के खिलाफ डायन प्रथा को बढ़ावा देती है। डायन बताकर हत्या करने के कई केस हर साल सामने आते हैं। ऐसे में बड़े पर्दे पर एक थी डायन जैसी फिल्मों का आना मानो सोने पर सुहागा हो सुंदर स्त्री जो अपनी इच्छा से लंबे बाल रखती है, अकेली रहती है वह स्त्री पितृसत्तात्मक की सोच के ढांचे में फिट नहीं बैठती जिसका नतीजा है उसे डायन बता देना। फिल्म में यह साबित किया जाता है कि स्त्री के लंबे बाल, उसकी सुंदरता डायन होने की पहचान है।

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‘स्त्री’ नाम के शीर्षक पर बनी फिल्म एक हॉरर कॉमेडी के तौर पर सिनेमाघरों में आई जिसके ‘ओ स्त्री कल आना’, ‘वह स्त्री है कुछ भी कर सकती है’ जैसे डायलॉग मशहूर हो गए। फिल्म में दिखाया गया कि स्त्री एक डायन  है जो सिर्फ मर्दों को गायब करती है वह भी बिना कपड़ों के। पिछली फिल्म की तरह यहां भी स्त्री की आड़ में पितृसत्तात्म सोच नज़र आती है। असल समाज में मर्दों द्वारा औरतों को कई कारणों से जबरन गायब किया जाता है लेकिन मूवी में इसके उलट ‘स्त्री’ को डायन बताकर यह काम उससे करवाया जाता है।

औरतों के खिलाफ हिंसा, अपराध के कई ऐसे केस सामने आते हैं जहां उनके साथ यौन हिंसा, अपहरण और एसिड अटैक जैसी घटनाएं होती हैं। इसके विपरीत ‘रूही’ फिल्म में चुड़ैल की शक्ल देकर एक औरत से ऐसा करवाया जाता है जहां चुड़ैल एक जीते-जागते इंसान से शादी करना चाहती है ताकि वह तथाकथित चुड़ैल अपना वैवाहिक जीवन जी सके। 

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सिनेमा ने इतिहास और समाज से प्रेरणा ली

कहा जाता है कि सिनेमा समाज को देखकर सीखता है और समाज सिनेमा को देखकर। इस बात में बहुत हद तक सच्चाई भी है। हमारे समाज में महिलाओं के खिलाफ कई पितृसत्तात्मक प्रथाएं सदियों से चली आ रही हैं। पितृसत्तात्मक समाज के खोखले अंधविश्वास और क्रूर सोच की बलि चढ़ी इन औरतों को जब उन्हें शारीरिक रूप से मर्द बांध नहीं पाए तब एक नया पैंतरा अपनाया गया ‘अंधविश्वास’ का। अंधविश्वास का समाज पर असर ऐसा है कि औरतों को डायन, पिशाच ,चुड़ैल आदि न जाने कितने ही नामों से संबोधित किया जाने लगा। इतिहास में कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं मिलता कि औरतों को भूत, पिशाच, डायन, चुड़ैल समझने की प्रथा कब शुरू हुई लेकिन महिलाओं के खिलाफ अत्याचार करने के लिए बेहतरीन हथियार यह सारे शब्द साबित हुए। इस अंधविश्वास का कोई वैज्ञानिक तर्क नहीं है लेकिन महिलाओं के खिलाफ़ इसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

समय-समय पर ऐसी खबरें आती हैं कि औरतों को डायन-चुड़ैल बताकर उनकी हत्या कर दी जाती है। अगर आंकड़ों की तरफ नज़र डालें तो राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि साल 1991 से लेकर 2010 तक पूरे देश में 1700 महिलाओं को डायन करार देकर उनकी हत्या कर दी गई। साल 2010 से 2014 तक 2290 औरतों की हत्या डायन बताकर कर दी गई। आपको बता दें कि यह आंकड़े केवल हत्या के हैं। इस अंधविश्वास के नाम पर औरतों को प्रताड़ित और शोषित करने के आंकड़ों की संख्या और अधिक है।

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अगर हम डायन, चुड़ैल बताकर की गई हत्याओं के वजह का पता लगाएं तो ज्यादातर मामलों में उन महिलाओं के खिलाफ़ ऐसा किया गया जो अकेली रहती हैं या जिनके पति की मृत्यु हो गई है, जो अपने परिवार की मुखिया बन खुद अपने परिवार की देखभाल करती हैं इन औरतों की संपत्ति को हथियाने की लालच में इन्हें डायन घोषित कर इनकी हत्या कर दी जाती है। कई मामलों में औरतों पर जादू-टोना करने का आरोप लगाकर भी उनकी हत्या कर दी जाती है। यहां स्पष्ट रूप से पितृसत्तात्मक सोच का ढांचा नजर आता है जो महिलाओं को अकेले आगे बढ़ता देख नहीं सकता और डायन प्रथा की आड़ में महिलाओं की हत्या कर पितृसत्तात्मक समाज अपना वर्चस्व साबित करता है।

ऐसी तमाम फिल्में हैं जो औरतों के खिलाफ डायन, चुड़ैल जैसे शब्दों के पीछे छिपे अत्याचार को और बढ़ावा देती हैं जिसमें पितृसत्तात्मक समाज की झलक नजर आती है। पितृसत्तात्मक समाज और सिनेमा में औरतों के खिलाफ़ ऐसी सोच कब बदलेगी इस पर तो कोई अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता पर फिलहाल लगातार ऐसी फिल्मों को हिट कर कहीं न कहीं इन अत्याचारों पर हम अपनी सहमति ज़रूर ज़ाहिर करते हैं।

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पेशे से एक पत्रकार ,जज्बातों को शब्दों में लिखने वाली 'लेखिका'
हिंदी साहित्य विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय से BA(Hons) और MA(Hons) मे शिक्षा ग्रहण की फिर जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में शिक्षा ली । मूलतः उत्तर प्रदेश से सम्बद्ध रखती हूँ और दिल्ली में परवरिश हुई । शहरी और ग्रामीण दोनों परिवेशों में नारी आस्मिता पर पितृसत्ता का प्रभाव देखा है जिसे बेहतर जानने और बदलने के लिए 'फेमनिज़म इन इंडिया' से जुड़ी हूँ और लोगों तक अपनी बात पहुँचाना चाहतीं हूँ।

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