'हर 10 में 9 भारतीय मानते हैं कि पत्नियों को पति का हुक़्म मानना चाहिए'
तस्वीर साभार: The Hindu
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यह साल 2022 है, आज बहुत से लोग इस बात को मानते हैं कि महिलाओं में नेतृत्व की क्षमता पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा होती है। लेकिन जब बात घर की आती है तो पुरुषों का मानना है कि पत्नियों को अपने पति की बात सुननी चाहिए। दो-तिहाई भारतीयों को लगता है कि पत्नी को अपने पति की आज्ञा माननी चाहिए। एक तिहाई व्यस्कों को लगता है कि मुख्य रूप से बच्चों की देखभाल महिलाओं के द्वारा ही की जानी चाहिए। ये सब, हाल ही में भारतीय समाज में परिवार में लैंगिक भूमिका पर हुए अध्ययन से निकले कुछ निष्कर्ष हैं।

वॉशिंगटन डीसी स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘प्यू रिसर्च सेंटर’ द्वारा हाउ इंडियन व्यू जेंडर रोल्स इन फैमिलीज एंड सोसाइटीनाम से एक स्टडी जारी की है। इस स्टडी को नंवबर 2019 से लेकर मार्च 2020 के बीच किया गया। इस सर्वे में 29,999 भारतीय व्यस्क शामिल थे। यह अध्ययन भारत के मणिपुर, सिक्किम, लक्षद्वीप और अंडमान और निकोबार द्वीपों को छोड़कर भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित राज्यों में किया गया। इसके अलावा कश्मीर में सुरक्षा कारणों के कारण फील्ड वर्क नहीं किया गया।

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इस स्टडी के अुनसार 55 फ़ीसद भारतीय विश्वास करते हैं कि महिला और पुरुष समान रूप से अच्छे राजनीतिक नेता हैं। लेकिन घर में नेतृत्व के मामले में भारतीयों का मानना है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों को अधिक प्रमुख भूमिका में होना चाहिए। वहीं, हर दस में से नौ लोगों का कहना है कि पत्नियों को पति की आज्ञा माननी चाहिए। हालांकि, इस अध्ययन के दौरान कई भारतीयों ने लैंगिक भूमिका पर समतावादी विचार भी व्यक्त किए हैं। स्टडी में शामिल 62 फ़ीसद ने कहा है कि बच्चे की देखभाल महिला और पुरुष दोनों को समान रूप से करनी चाहिए। वहीं, पारंपरिक सोच से प्रभावित 34 फ़ीसद लोगों का कहना है कि बच्चे की देखभाल का मुख्य काम महिला का ही होता है।

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इसी प्रकार महिलाओं की कमाई को लेकर 54 फ़ीसद लोगों का कहना है कि महिला और पुरुष दोनों पर कमाई के लिए समान ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। वहीं, 43 फ़ीसद का मानना है कि पैसे कमाने की बाध्यता केवल पुरुष की होनी चाहिए। साथ ही 80 फ़ीसद भारतीय मानते हैं कि अगर नौकरियों के कुछ ही अवसर है, तब महिलाओं की तुलना में केवल पुरुष को ही नौकरी करने का अधिकार होना चाहिए।

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इस स्टडी के अुनसार 55 प्रतिशत भारतीय विश्वास करते हैं कि महिला और पुरुष समान रूप से अच्छे राजनीतिक नेता हैं। लेकिन घर में नेतृत्व के मामले में भारतीयों का मानना है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों को अधिक प्रमुख भूमिका में होना चाहिए। वहीं, हर दस में से नौ लोगों का कहना है कि पत्नियों को पति की आज्ञा माननी चाहिए।

बेटे को वरीयता देता हमारा पितृसत्तात्मक समाज

स्टडी में शामिल 94 फ़ीसद भारतीयों का यह मानना है कि परिवार में कम से कम एक बेटा होना बहुत ज़रूरी है। बेटियों के लिए यह आंकड़ा 90 फ़ीसद है। 64 फ़ीसद भारतीयों का मानना है कि बेटे और बेटी को माता-पिता की विरासत में समान अधिकार मिलने चाहिए। लेकिन दस में से चार व्यस्कों का कहना है कि केवल बेटों का बूढ़े माता-पिता की देखभाल करने का पहला अधिकार है। केवल 2 प्रतिशत ने ऐसी बात बेटियों के लिए कही है। 

इसके अलावा 63 फ़ीसद भारतीयों का मानना है कि माता-पिता का अंतिम संस्कार करने का अधिकार बेटों का ही है। यह स्टडी दिखाती है कि भारतीय समाज में लैंगिक असमानता आज भी कितने व्यापक रूप से प्रचलित है। ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक रूप से परिवार में बेटों के मुकाबले बेटियों को कम महत्व दिया जाता है। यहीं कारण है कि 40 फ़ीसद लोगों ने माना कि परिस्थिति के अनुसार सेक्स सिलेक्टिव अबार्शन यानी चयनात्मक गर्भासमापन मान्य है। हालांकि, 42 फ़ीसद ने इसे पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया है।

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वैश्विक मानकों की तुलना में भारत 

प्यू सेंटर स्टडी में भारत के जेंडर दृष्टिकोण की तुलना दुनिया के बाकी हिस्सों से की गई है। स्टडी के अनुसार वैश्विक स्तर पर 70 फ़ीसद लोगों का मानना हैं कि महिलाओं के पास पुरुषों के समान अधिकार होना बहुत ज़रूरी है। भारत में भी 72 प्रतिशत भारतीयों ने कहा है कि लैंगिक समानता होना बहुत ज़रूरी है। हालांकि, उत्तरी अमेरिका में 92 फ़ीसद, पश्चिमी यूरोप में 90 फ़ीसद, और लैटिन अमेरिका में 82 फ़ीसद राय लैंगिक समानता के पक्ष में देखी गई। दक्षिण एशियाई देश पाकिस्तान में लैंगिक समानता भारत के मुकाबले कम (64 फ़ीसद) देखी गई।

भारतीय लैंगिक समानता के मुद्दे पर अधिक रूढ़िवादी हैं

जब घर और आर्थिकता की बात आती है तो सर्वे के मुताबिक दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारतीय अधिक रूढ़िवादी नज़र आते हैं। उदाहरण के तौर पर साल 2013 से 2019 तक 61 देशों में किए सर्वे के अनुसार ‘जब नौकरी कम हो तो पुरुषों को वरीयता मिलनी चाहिए’ इस बात पर 61 देशों में 17 फ़ीसद तक औसतन सहमति जताई गई। लेकिन भारत में तीन गुना यानी 55 फ़ीसद लोग इस बात को मानते हैं। सर्वे में शामिल केवल एक देश ट्यूनीशिया में (64 फ़ीसद) की दर यह बात मानती है कि नौकरी की कमी के दौरान पुरुषों को काम मिलने में वरीयता देनी चाहिए। स्टडी में कहा गया है कि यह रवैया नौकरी में महिलाओं की कमी को दिखाता है। भारत में महिला श्रम की दर दुनिया की तुलना में बहुत कम क्यों है। भारत में यह दर 21 फ़ीसद है और वैश्विक स्तर पर दर 53 फ़ीसद है।

इसी रिसर्च में आगे यह सवाल पूछा गया कि किस तरह की शादी को अधिक संतोषजनक कहा जाता है। पहली, वह जहां पति कमाता है और पत्नी का काम घर और बच्चा संभालना है। दूसरी, वह शादी जिसमें पति-पत्नी नौकरी करते हैं और साथ मिलकर घर-परिवार संभालते हैं। इसमें 40 फ़ीसद भारतीय पारंपरिक विवाह को वरीयता देते दिखें। जहां मुख्य भूमिका में पुरुष होता है और महिला घर को संभालती है। वैश्विक स्तर पर यह दर केवल 23 फ़ीसद देखी गई।

इस सर्वे में यह भी देखा गया कि कॉलेज की ड्रिगी रखनेवाले 80 फ़ीसद भारतीय इस बात से सहमति रखते हैं कि पत्नियों को हमेशा पति की बात माननी चाहिए। स्टडी में यह भी कहा गया कि दक्षिण भारतीय राज्यों की महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति अन्य भारतीय राज्यों की महिलाओं के जीवन से बेहतर है। हालांकि, यह ज़रूरी नहीं था कि हिंदी बेल्ट के मुकाबले दक्षिणी क्षेत्र के लोगों के विचार ज़्यादा समतावादी हैं। उदाहरण के लिए पत्नियों को हमेशा अपने पति की बात माननी चाहिए तो पूरे भारत के 94 फ़ीसद के मुकाबले दक्षिण भारत में यह दर 75 फ़ीसद देखी गई। दक्षिण भारत के 25 फ़ीसद व्यस्कों ने 13 फ़ीसद के मुकाबले यह यह बात कही की परिवारों में पुरुषों को खर्च करने के फैसले लेने की जिम्मेदारी होनी चाहिए। महिलाओं को बच्चों की देखभाल के लिए ज़्यादा जिम्मेदार होना चाहिए। इसमें दक्षिण भारत में यह दर बाकी देश के 30 फ़ीसद के मुकाबले 44 फ़ीसद देखी गई।

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तस्वीर साभार : The Hindu

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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