गंगूबाई काठियावाडी: सेक्सवर्कर्स के संघर्षों के मुद्दों को छूकर निकलती फिल्म
तस्वीर साभार: The New Indian Express
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 मंटो की कुछ मशहूर लाइनें याद आ रही हैं – “जो लोग ये समझ नहीं पाते की औरत क्या चीज़ है, उन्हें पहले ये समझने की ज़रूरत है कि औरत कोई चीज़ नहीं है।”

25  फरवरी को रिलीज़ हुई फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाडी’ जिसकी 4 से 5 दिन की कमाई कुल 56.41-56.91 करोड़ रही और इसी स्पीड के साथ काफी आराम से यह फिल्म 100 करोड़ तक की कमाई कर लेगी। काफी दिनों बाद बॉलीवुड में सेक्सवर्कर्स और उनकी निजी जिंदगी में झांकने की कोशिश की गई और उस कोशिश की सराहना ज़रूर होनी चाहिए। इस फिल्म ने काफी महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर धुंधली सी रोशनी डालने की कोशिश की है। जैसे महिलाओं की तस्करी, सेक्सवर्कर्स का स्वास्थ्य, समान शिक्षा का अधिकार, प्रतिनिधित्व, राजनीति, सरकार सम्मान से जीने का हक। 

इस फिल्म में कई बार लीड किरदार निभा रही आलिया भट्ट यह बोलती हुई नज़र आई, “मैं कमाठीपुरा की 4000 औरतों के लिए कुछ भी कर सकती हूं।” देखा जाए तो फिल्म सामाजिक तौर पर काफी सही रही। धोखा, प्यार, ताकत , गाने और काफी सारे जबरदस्त डायलॉग। इस फिल्म को एक सही बॉलीवुड मिश्रण कह सकते हैं। हालांकि, फिल्म में काफी बेहतर तरीके से कुछ खास मुद्दों को छुआ है। 

जैसे कमाठीपुरा में रहनेवाली कई औरतें किस प्रकार से महिला तस्करी का शिकार थीं। किस तरह से उनके लिए हफ्ते की एक छुट्टी पाना भी संघर्षपूर्ण था। किस तरह कमाठीपुरा के बाहर उनके लिए कोई दुनिया नहीं थी। वह न पढ़ सकती थीं, न कोई कारोबार कर सकती थीं। उनके लिए यह काम छोड़ने के बाद कोई दूसरा पर्याय उपलब्ध नहीं था। किस प्रकार बजाय महिला तस्करी को रोके सरकार और समाज पीड़ितों को ही दोषी मानती है। उन्हें किस प्रकार से कोई हक, सुविधा या सुरक्षा नहीं देती।

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फिल्म का एक सीन, तस्वीर साभार: IMDB

इन सभी सवालों के साथ इनके साथ चलती कई महिलाओं की जिंदगी के संघर्ष सामने रखने की कोशिश की है इस फिल्म ने। जब गंगूबाई सबसे पहले सभी साथियों को लेकर फिल्म देखने जाती है और कहती है कि क्या उन्हें एक दिन की छुट्टी नहीं मिल सकती। जब गंगूबाई कमाठीपुरा खाली करने से इनकार कर स्कूल में जाकर वहां के प्रिंसिपल से बात करती है और कहती है, “हमारे बच्चों को भी दाखिला दे दीजिए, उन्हे भी सीखने का हक है।” यह कहते हुए बच्चों की माँ के नाम के रूप में वह अपना नाम देती है।  जब प्रिंसिपल उसे सवाल करता है कि बाप का नाम क्या लिखे? तब गंगूबाई का जवाब पूरे पितृसत्तात्मक सोच पर करारा तमाचा है। वह कहती है, “क्यों माँ का नाम काफी नहीं है”? इसी के साथ अगले सीन में जहा गंगूबाई कमाठीपुरा के घर तोड़े जाने के ख़िलाफ़ आज़ाद मैदान में भाषण देते हुए कहती है कि, “बुरा मत मानिएगा पर आपसे ज्यादा इज्ज़त है हमारे पास। आपकी तो एक बार गई तो गई पर हम तो रोज़ रात बेचते हैं पर खतमीच नहीं होती!”

हालांकि, फिल्म में काफी बेहतर तरीके से कुछ खास मुद्दों को छुआ है। जैसे कमाठीपुरा में रहनेवाली काफी औरतें किस प्रकार से महिला तस्करी का शिकार थीं। किस तरह से उनके लिए हफ्ते की एक छुट्टी पाना भी संघर्षपूर्ण था। किस तरह कमाठीपुरा के बाहर उनके लिए कोई दुनिया नहीं थी। वह न पढ़ सकती थीं, न कोई कारोबार कर सकती थीं। उनके लिए यह काम छोड़ने के बाद कोई दूसरा पर्याय उपलब्ध नहीं था। किस प्रकार बजाय महिला तस्करी को रोके सरकार और समाज पीड़ितों को ही दोषी मानती है। उन्हें किस प्रकार से कोई हक, सुविधा या सुरक्षा नहीं देती।

इन सभी अच्छी चीजों के लिए दाद देते वक्त हम यह नहीं भुल सकते कि कुछ चीज़ें अब भी हैं जिनका जवाब नहीं मिला, जिनका मज़ाक उड़ाया गया। गंगूबाई एक बायोपिक है यह ध्यान में रखते हुए अगर हम इसे देखे तो कई बार ये देखने मिल जाएगा। जब गंगू “मै कमाठीपुरा पर राज करूंगी” यह कहती है। फिल्म में जब गंगू कमाठीपुरा के प्रेसीडेंट के लिए चुनाव में रज़िया (एक मुस्लिम ट्रांस व्यक्ति) के सामने खड़ी होती है। वह कहते है कि रज़िया गलत है पर पूरी फिल्म में कोई भी सीन नहीं है जहा हमें रज़िया कोई गलत काम करते हुए दिखती है। साथ ही जब गंगूबाई अध्यक्ष का चुनाव जीतती है उसके बाद भी हमें कोई बड़े बदलाव नहीं दिखते।

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फिल्म में नहीं दिखा साझा संघर्ष

इस फिल्म में हमेशा गंगूबाई अकेली ही सारी चीज़ें करती हुई दिखती है। यहां कहीं भी साझा संघर्ष नहीं दिखता। जब तक कमाठीपुरा के घर तोड़ने का नोटिस नहीं निकलता तब तक गंगूबाई वहां रह रहे बच्चों की शिक्षा की बात से कोसों दूर होती है। जब फिल्म में एक सेक्सवर्कर अपनी 15 साल की बेटी को पिंजरे में सुलाती है ताकि उसे भी जबरदस्ती सेक्सवर्कर न बनाया जाय। तब गंगूबाई उस लड़की की शादी कर देती है। क्या शादी ही एक जवाब है? क्या और कोई तरीका नहीं था, उसे इन सभी चीजों से बाहर निकालने का? अगले सीन में जहा गंगूबाई की एक साथी बीमार होती है और अब जब गंगूबाई अध्यक्ष बन चुकी है, फिर भी वह उस साथी को अस्पताल ले जाती नहीं दिखती बजाय जब उसकी वह साथी मर जाती है तब उसके छोटे बच्चे को हाथ में लिए पालने पर बैठी हुई दिखती है।

तस्वीर साभार: Hindustan Times

फिल्म में काफी जगह सेक्सवर्कर के साथ जुड़ी चीजों का मज़ाक बनाते हुए दिखाया गया है। जैसे कि जब गंगूबाई स्कूल में बच्चों का दाखिला करने जाती है तब कहती है, “अ..आ..आ..आ..ई..ई..इ  तो  ये अपने माँ के पलंग के नीचे ही सीखते हैं” बिना यह ख्याल किए कि बच्चों की मानसिकता पर इसका क्या असर होगा। गंगूबाई कमाठीपुरा के घर टूटने से बचाने के लिए आजाद मैदान में भाषण देते वक्त कई ऐसी बातें करती है। जैसे, “अगर कमाठीपुरा ना हो तो शहर जंगल हो जाएंगे, औरते हवस का शिकार हो जाएंगी, परिवार बर्बाद हो जाएंगे, रिश्ते बदनाम हो जाएंगे और हमारी हिन्दुस्तानी सभ्यता का नाश हो जाएगा।” यहां सवाल उठता है कि कौन-सी ऐसी सभ्यता है जिसे बचाने के लिए औरतों का जबरदस्ती सेक्सवर्क करना ही ज़रूरी है। यह लाइन बिल्कुल ही आधारहीन है, ना इनका कोई मतलब है न ज़रूरत, पर फिर भी इन्हे क्यों इस्तेमाल किया गया। 

फिल्म में काफी कम सीन है जहां हम सेक्सवर्कर्स के जीवन से जुड़कर उनकी भावनाएं और मुश्किलें समझ पाएंगे। सेक्सवर्कर्स से जुड़े ज्यादातर मुद्दों को इस फिल्म ने बस छुआ है। फिर चाहे वह सेक्सवर्कर्स के रहने का मुद्दा हो, उनके स्वास्थ्य का, उनकी सुरक्षा का, उनकी पसंद का, उनके बच्चों की ज़िंदगी का

साल 2014 से बॉलीवुड की ज्यादातर फिल्में अगर हम ठीक से देखें तो उसमें गौर करने पर ज्यादातर जगह हिन्दुत्व का, हिंदू धर्म, परंपराओं को दिखाता नज़र आता है, ज्यादातर फिल्मों में ‘देशभक्ति’ हावी रहती है। क्यों इस पूरी फिल्म में कही भी अल्पसंख्यक, जाति , वर्ग या धर्म वाले लोग नहीं दिखाई दिए? क्यों इस फिल्म में हमेशा गंगूबाई छोड़ बाकी सभी कमाठीपुरा की सेक्सवर्कर ब्राउन शेड में दिखाई गई? क्यों इस फिल्म में कही भी रज़िया को छोड़ कोई भी क्वीयर या ट्रांस व्यक्ति नहीं दिखा। इस पूरी फिल्म में कहीं भी गंगूबाई यह पूछती हुई नहीं दिखती कि अगर किसी भी व्यक्ति को यह काम छोड़ना हो तो वह इसमें उसकी मदद करेगी, या उसे कोई और काम दिलवाने में मदद करेगी। अगर सीधे मायनों में देखा जाए तो इस पूरी फिल्म में मुझे गंगूबाई को सिर्फ और सिर्फ सत्ता के लिए, पावर के लिए लड़ता हुआ दिखाया गया है।

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फिल्म में काफी कम सीन है जहां हम सेक्सवर्कर्स के जीवन से जुड़कर उनकी भावनाएं और मुश्किलें समझ पाएंगे। सेक्सवर्कर्स से जुड़े ज्यादातर मुद्दों को इस फिल्म ने बस छुआ है। इन्हें फिल्म मंज़िल तक नहीं ले जा पाई। फिर चाहे वह सेक्सवर्कर्स के रहने का मुद्दा हो, उनके स्वास्थ्य का, उनकी सुरक्षा का, उनकी पसंद का, उनके बच्चों की ज़िंदगी का या सब से अहम सेक्सवर्कर्स को कानूनी दर्जा मिलने का जो उन्हें उनके हक दिला पाए। मानो ये सब मुद्दे बस किसी चीज़ की तरह गंगूबाई के जीवन के साथ थे, पर जब वह प्रेसीडेंट बनी तब उसे सेक्सवर्क करने की जरूरत नहीं थी, तब ये मुद्दे उसके लिए उतने अहम नहीं रहे।

हालांकि इस फिल्म की कोशिश को सराहा जाना चाहिए जिसने एक हद तक सेक्सवर्कर्स के जीवन को दिखाया है। हमें हमेशा यह भी याद रखना होगा कि हम बेहतर होने की कोशिश कर रहे है और खुद को और हमारे विचारों को। हमें जरूरत है जो आज़ादी हम हमारी निजी जिंदगी में चाहते हैं, वे सभी के जिंदगी में बरकरार रहे। 

“वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगीवो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह हमीं से आएगी”

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तस्वीर साभार : The New Indian Express

मेरा नाम मानसी उषा है। बचपन से ही दोस्तों के रूप में मेरी जिंदगी में इंसान कम और किताबें ज्यादा रही हैं। अनेक विचार, तत्वज्ञान पढ़े पर में किसी एक विचार को या "वाद" को नहीं मानती। मैं एक वास्तववादी नास्तिक हूं जो विश्ववास और प्रेम करता है प्रकृति के प्रजनन और असीम संभावनाओं में। चित्र निकालना, नई जगह जाना नए लोगों से मिलना, बातें करना तथा वहां की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक स्थिति को समझना। मैंने अभी फिलहाल में अपना ग्रैजुएशन साइकॉलजी में पूरा किया है और कई सामाजिक संस्थाओं तथा संगठन से जुड़ी हुई हूं। अपनी नींद और खाने से सबसे ज्यादा प्यार है।

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