ऑनलाइन बुलिंग
तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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आधुनिक युग में टेक्नोलॉजी ने हमारी ज़िंदगी में जहां आसानियां पैदा की हैं तो उसके साथ-साथ मुश्किलें भी पैदा हुई हैं। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मोबाइल और इंटरनेट ने बहुत अधिक बदलाव कर दिए हैं। कंपनियां मुफ्त में लोगों को इंटरनेट बांट रही हैं। लोग जहां बड़ी आसानी से इंटरनेट-फ्रेंडली हो रहे हैं। बच्चे-बड़े सभी लोग सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर अपनी एक अलग दुनिया बनाए हुए हैं। वहीं वे अनजाने में कई प्रकार के दुष्प्रभावों का शिकार भी हो रहे हैं। इसी को तकनीकी भाषा में साइबर बुलिंग कहा जाता है।

साइबर बुलिंग की सबसे अधिक इस्तेमाल की जानेवाली परिभाषा है- ‘एक आक्रामक, जानबूझकर किया जाने वाला कार्य या व्यवहार है जो एक समूह या एक व्यक्ति द्वारा किया जाता है, इलेक्ट्रॉनिक संचार के रूपों का उपयोग करके, अधिक समय तक और बार-बार एक पीड़ित के खिलाफ किया जाता है जो आसानी से उसका बचाव नहीं कर सकता/सकती है। साइबरबुलिंग में किसी और के बारे में नकारात्मक, हानिकारक, झूठी सामग्री भेजना, पोस्ट करना या साझा करना शामिल है। कुछ साइबर धमकी अवैध या आपराधिक व्यवहार में सीमा पार कर जाती है। यह बार-बार किया जाने वाला व्यवहार है, जिसका उद्देश्य लक्षित लोगों को डराना, गुस्सा दिलाना या शर्मिंदा करना है। उदाहरण के तौर पर :

  • सोशल मीडिया पर किसी की शर्मनाक तस्वीरें या वीडियो पोस्ट करने के बारे में झूठ फैलाना या पोस्ट करना
  • मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से हानिकारक, अपमानजनक या धमकी भरे संदेश, चित्र या वीडियो भेजना
  • किसी का प्रतिरूपण करना और उनकी ओर से या नकली अकाउंट के माध्यम से दूसरों को गलत संदेश भेजना।
  • चाइल्ड पोर्नोग्राफी या चाइल्ड पोर्नोग्राफी की धमकी

साइबरबुलिंग होने वाली सबसे आम जगहें हैं:

  • सोशल मीडिया जैसे कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, ट्विटर और टिक-टॉक
  • मोबाइल या टैबलेट उपकरणों पर टेक्स्ट मैसेजिंग और मैसेजिंग ऐप्स
  • इंस्टेंट मैसेजिंग, डायरेक्ट मैसेजिंग और इंटरनेट पर ऑनलाइन चैटिंग
  • ऑनलाइन फ़ोरम, चैट रूम और संदेश बोर्ड, जैसे Reddit
  • ईमेल
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पारंपरिक रूप से किसी का उत्पीड़न करने या धमकाने में एक मजबूत व्यक्ति शामिल होता है जो अपने लाभ के लिए कमजोर व्यक्ति पर अपनी श्रेष्ठता का दावा करता है। इंटरनेट के आगमन के साथ बेहतर शारीरिक शक्ति वाले व्यक्ति के लिए और वित्तीय दबदबे वाले व्यक्ति के लिए दूसरे को धमकाना संभव हो गया है। कई मामलों में, धमकाने वाले व्यक्ति पीड़ित और कानून के शिकंजे से दूर रहने के लिए नकली पहचान और इंटरनेट द्वारा दी गई गुमनामी का उपयोग करते हैं।

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ऑनलाइन बुलिंग या साइबरबुलिंग का शिकार सबसे अधिक बच्चे और महिलाएं होती हैं। चूंकि ये दोनों समाज का कमज़ोर तबका है और समाज में घर की इज़्ज़त बचाने का दारोमदार भी इन्हीं के कंधो पर होता है तो ये खामोशी से इस प्रकार के उत्पीड़न का शिकार होते रहते हैं। भारतीय कानून में साइबर बुलिंग के खिलाफ कुछ कानून मौजूद हैं जिनका प्रयोग करके कोई भी पीड़ित इस प्रकार की बुलिंग से निपट सकता है। साइबरबुलिंग के तरीकों में फ्लेमिंग, एक्सक्लूडिंग, आउटिंग, इमपर्सोनाटिंग जैसे तरीके शामिल होते हैं।

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साइबर बुलिंग होने पर क्या करें?

साइबर बुलिंग से निपटने के लिए दो तरह के विकल्प हैं- कानून की मदद से और निजी स्तर पर।

  • यदि किसी फोरम पर कोई आपको तंग कर रहा है तो उस फोरम से निकल जाइए।
  • यदि फिर भी आपको तंग किया जाए तो फेसबुक (या अन्य सोशल मीडिया साइट) को रिपोर्ट करें।
  • यदि धमकी मिलती है तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की जानी चाहिए।
  • यदि पुलिस कार्रवाई न करे तो अदालत की शरण ली जा सकती है।

भारत में साइबर बुलिंग के खिलाफ कानून

भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC), न तो बुलइंग को परिभाषित करता है और न ही इसे अपराध के रूप में दंडित करता है। हालांकि, आईपीसी और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के विभिन्न प्रावधानों का उपयोग साइबर बुलइंग से लड़ने के लिए किया जा सकता है।

महिलाओं की साइबर स्टाकिंग/ पीछा करना 

महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा ‘बच्चों का डिजिटल शोषण’ पर प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि आईपीसी की धारा 354ए और 354डी महिलाओं के खिलाफ साइबर बुलिंग और साइबर स्टॉकिंग के लिए सजा का प्रावधान करती है। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 के माध्यम से आईपीसी में धारा 354डी को सम्मिलित करने के बाद, महिलाओं का साइबर-पीछा करने को एक अपराध के रूप में मान्यता दी गई थी।

IPC की धारा 354D पीछा करने को निम्नानुसार परिभाषित करती है: ‘कोई भी आदमी जो’

1) एक महिला का पीछा करता है और संपर्क करता है, या ऐसी महिला द्वारा अरुचि के स्पष्ट संकेत के बावजूद बार-बार व्यक्तिगत बातचीत को बढ़ावा देने के लिए ऐसी महिला से संपर्क करने का प्रयास करता है; या

2) इंटरनेट, ईमेल या किसी अन्य प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक संचार के उपयोग द्वारा एक महिला की निगरानी करता है, पीछा करने का अपराध करता है

आईपीसी की धारा 354डी की भाषा यह स्पष्ट करती है कि धारा ‘साइबर’ शब्द की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर भेदभाव किए बिना ऑफ़लाइन और ऑनलाइन पीछा करने के दोनों अपराध को दंडित करती है।

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सोशल मीडिया पर किसी और की फेक प्रोफाइल्स बनाना

किसी और के नाम से सोशल मीडिया पर प्रोफाइल बनाना अपेक्षाकृत आसान है और इस तरह की प्रोफाइल से पीड़ित को गलत तरीके से पेश करना संभव हो जाता है। किसी भी व्यक्ति के सोशल मीडिया और डिजिटल फ़ोरम पर डाले गए कमेंट्स, फ़ोटो, पोस्ट और व्यक्तियों द्वारा साझा की गई सामग्री को अक्सर अजनबियों के साथ-साथ परिचितों द्वारा भी देखा जाता है। एक व्यक्ति द्वारा ऑनलाइन साझा की जाने वाली सामग्री  उनकी व्यक्तिगत ज़िन्दगी के साथ-साथ उनके प्रोफेशनल करियर पर भी प्रभाव छोड़ती है। लोगों को पता नहीं होता है कि यह सब फेक प्रोफाइल द्वारा किया गया है या असली प्रोफाइल द्वारा। ऐसे में पीड़ित के जीवन को व्यक्तिगत और प्रोफेशनल दोनों तरह से हानि पहुंचती है।

जब एक नकली फेसबुक प्रोफ़ाइल बनाने के साथ पीड़ित की असभ्य या अश्लील तस्वीरें ऐसी प्रोफ़ाइल पर अपलोड की जाती हैं, तो आईपीसी की धारा 354A (यौन उत्पीड़न और यौन उत्पीड़न के लिए सजा), धारा 354D (पीछा करना), धारा 499, धारा 500 (मानहानि और मानहानि की सजा), धारा 507 (अनाम द्वारा आपराधिक धमकी) और धारा 509 (शब्द, इशारा या किसी महिला की शील का अपमान करने का इरादा) लागू हो सकते हैं।

धारा 507 के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो किसी को गुमनाम रूप से धमकाता है, या धमकी देता है, या उन्हें उनकी इच्छा के बिना कुछ करने के लिए मजबूर करता है, तो उस व्यक्ति को 2 साल तक की कैद की सजा हो सकती है। ‘अनजान’ शब्द के कारण, इसे एंटी बुलिंग या साइबरबुलिंग अपराधों के तहत भी शामिल किया गया है।धारा 509 किसी महिला का अपमान करने के इरादे से शब्द, इशारा या कार्य से संबंधित है। इस धारा के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो कोई शब्द बोलता है या कोई आवाज या इशारा करता है, या किसी वस्तु को इस इरादे से प्रदर्शित करता है कि ऐसा शब्द, ध्वनि या इशारा या वस्तु किसी महिला द्वारा सुनी या देखी जाए और उसका अपमान करे, या गोपनीयता में दखल दे, तो उस पर इस धारा के अंतर्गत अपराध करने का आरोप लगाया जा सकता है। इंटरनेट पर की गई भद्दी टिप्पणियों, या अन्य स्पष्ट चित्र और वेब पर जबरन साझा की गई सामग्री को इस धारा के तहत दंडित किया जा सकता है।

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सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 इंटरनेट या साइबर स्पेस से संबंधित अपराधों और इन अपराधों के लिए दंड – से निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा पारित एक भारतीय कानून है। सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन अधिनियम साइबर बुलिंग के लिए भी उपचार प्रदान करता है। धारा 66 ओर 67 साइबरबुलिंग के अपराध से संबंधित है। आईटी अधिनियम की धारा 66 ए किसी भी संचार उपकरण के माध्यम से आपत्तिजनक संदेश भेजने के लिए किसी व्यक्ति के लिए सजा को परिभाषित करती है। धारा 66(डी) “कंप्यूटर संसाधन का उपयोग करके व्यक्ति द्वारा धोखाधड़ी के लिए दंड” – यदि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया या किसी अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इंटरनेट के माध्यम से किसी को धोखा देता है, धोखा देता है, तो उस व्यक्ति को 3 साल तक की कैद और 1 लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है। धारा 66ई निजता के उल्लंघन के लिए दंड को परिभाषित करती है। धारा 67 किसी भी अश्लील तस्वीर को प्रकाशित करने के लिए सजा को परिभाषित करती है।

अधिनियम की धारा 67 इंटरनेट / साइबरस्पेस पर आपत्तिजनक, अश्लील, अशोभनीय सामग्री को अपलोड करने, स्थानांतरित करने, प्रसारित करने की सजा से संबंधित है, जिसमें 10 लाख रुपये तक का जुर्माना या 5 साल तक की कैद हो सकती है। साइबरबुलिंग सिर्फ एक मोबाइल फोन या कंप्यूटर और इंटरनेट की मदद से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या किसी अन्य ऑनलाइन सार्वजनिक मंच पर या इंटरनेट पर किसी को बदनाम करने, पीछा करने, परेशान करने, प्रताड़ित करने, चोट पहुंचाने का एक शातिर कार्य है, जो प्रौद्योगिकी में अत्यधिक प्रगति के कारण आसानी से उपलब्ध है। यह अपराध पीड़ित से बहुत दूर होने के बाद भी किया जा सकता है, यही कारण से यह सामान्य बुलिंगग से अधिक खतरनाक होता है। यह कई बार पीड़ित पर एक दर्दनाक प्रभाव छोड़ सकता है। कभी-कभी बुलिंग इतना आक्रामक होती है कि पीड़ित की आत्महत्या से कर लेते हैं क्योंकि वे अपनी समस्याओं को साझा करने से घबराते हैं। वे यह सोचते हैं कि सभी को इसके बारे में पता चल जाएगा और जनता के सामने उनकी प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी। भारतीय कानून में कई प्राविधान ऐसे हैं जो साइबर बुलिंग से बहुत हद तक बचाते हैं बशर्ते कि समय रहते इनका उपयोग कर लिया जाए।

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तस्वीर : रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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