दर दर गंगेः गंगा में पलती भूख और ख़्वाहिशों का सच
दर दर गंगेः गंगा में पलती भूख और ख़्वाहिशों का सच
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किताब : दर दर गंगे

लेखकः अभय मिश्र, पंकज रामेन्द्रु

प्रकाशनः पेंगुइन

मूल्यः 199

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गंगा महज एक नदी नहीं है, यह जीवन का एक स्रोत है। सामाजिक और राजनीतिक हर जीवन में इसकी क्या अहमियत है, यह किसी से छिपी नहीं हुई है। मनुष्य और नदियों का संबंध बहुत गहरा है। इस गहराई का असर दोनों के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। गंगा के रंग, रूप, और आकार को इस रिश्ते ने पूरी तरह बदल दिया है। सभ्यता, परंपराओं, संस्कृति और विकास के नाम पर गंगा किनारे रचते-बसते समाज ने क्या गंगा को दिया है और मनुष्य क्या उससे छीन रहा है?  इस सवाल का गहराई से जवाब किताब ‘दर दर गंगे’ के पन्नों से गुज़रते हुए मिलता है।

पेंगुइन हिंदी से प्रकाशित अभय मिश्र और पंकज रामेन्द्रु द्वारा लिखी ‘दर दर गंगे’ वह किताब है जो गंगा की वास्तविकता को बताती है। इस किताब में लेखकों ने गंगोत्री से गंगा सागर तक का सफर तय किया और उसके वर्तमान को बयान किया है। गंगा की गहराई और विकास के उथलपने का साफ अक्श दिखाने का यह किताब एक सच्चा प्रयास साबित होती दिखती है। गंगा से देश में लोगों की गहरी भावनाएं जुड़ी हुई हैं। गंगा की कहानी कहते समय धार्मिक पक्ष न हावी हो जाए इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है। किताब के किरदारों पर गंगा की पौराणिक इतिहास की छाप भले ही दिखती हो लेकिन किताब में इस पक्ष को नजरअंदाज किया गया है। किताब में वैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक पहलू पर बात की गई है और यही पक्ष किताब को वास्तविकता के करीब लाता है।

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गंगा के इस सफर में 30 शहरों की कहानियां कही गई हैं। गंगा के बहाव के साथ लोगों की जिदंगियों पर पड़ने वाला असर और भविष्य को बताया गया है। इसमें भाव है, घटनाएं और उससे जूझते लोग हैं। जीवनरेखा बनी नदी कैसे बर्बादी की ओर अग्रसर है इस बात को गहराई से कहा गया है। किताब के हर अध्याय के किरदारों का जीवन किस तरह से गंगा से जुड़ा हुआ है और कैसे गंगा समेत सबके जीवन में नकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। उसे हर पड़ाव में उसी वास्तविकता से कहा गया है। हर अध्याय से गुजरते हुए गंगा के असहायपन का दर्द गहरा होता दिखता है। जिससे अपने अंदर आत्मग्लानि महसूस होती है कि कैसे मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए अपनी नदियों और अपनी सभ्यताओं को खत्म करने पर लगा हुआ है।

गंगा के इस सफर में 30 शहरों की कहानियां कही गई हैं। गंगा के बहाव के साथ लोगों की जिदंगियों पर पड़ने वाला असर और भविष्य को बताया गया है। इसमें भाव है, घटनाएं और उससे जूझते लोग हैं। जीवनरेखा बनी नदी कैसे बर्बादी की ओर अग्रसर है इस बात को गहराई से कहा गया है।

इस किताब में गंगा के सौंदर्य पक्ष से अलग उसकी समस्याओं पर बात की गई है। किताब को रोचक बनाने के लिए इस सफर में यही नहीं कहा गया है कि गंगा के दोनों तरफ क्या है। बल्कि नदी के दोनों तरफ बसे समाज, वहां का ताना-बाना, राजनीति और आवश्यकता के हानिकारक दंश को भी कहा गया है। गंगा पथ पर पड़ने वाले हर शहर की समस्या को उठाया गया है। गंगा के बनते घाट और घाटों में बंधती गंगा की दास्ता में व्यवसायीकरण का असर दिखाया गया है। किताब के हर अध्याय, पौराणिक कथाओं से अलग एक कमजोर गंगा से रूबरू कराता है। जिसमें गंगा चुपचाप मनुष्य का व्यवहार झेलती आ रही है।

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किताब समस्याओं के पहलू पर ज्यादा बात करती है। कानपुर, इलाहाबाद जैसे शहरों में गंगा में गिरते नाले को तो सब लोग जानते हैं। लेकिन यहां बताया गया है कि उत्तरकाशी में ही गंगा में पहला बड़ा नाला गिरता है। पहाड़ों में कैसे पानी के टैंकरों की सप्लाई एक जरूरत बन गई है। ऋषिकेष में आस्था का विदेशीकरण और आश्रमों का राजनीतिक जुड़ाव के साथ गांजे-अफीम की सहज उपलब्धता पर प्रकाश ड़ाला गया है। हरिद्वार में बहता अर्थ, आस्थियां और आस्था की कहानी और कानपुर में नाले की गर्जना से दहली गंगा के रूप को दिखाया गया है। गंगा तट के किनारे बसे इन शहरों की अलग-अलग कहानियों में गंगा की कमजोर होती स्थिति दिखती है।

किताब के अंश

“ओ रे माझी…मेरे साजन हैं उस पार…मैं इस पार, ओ मेरे माझी अबकी बार ले चल पार… मेरे साजन हैं उस पार…” बंदिनी यानी नूतन को साहिबगंज के घाट पर ही इस बात का अहसास हुआ था कि उसे अपने बीमार पति के साथ जाना है। इस बात को पचास बरस बीत गए हैं लेकिन आज भी यहां की हर पीढ़ी इस बात से अपना नाता जोड़े हुए है। साहिबगंज का हर बाशिंदा यहां आने वालों को कैसे भी इस बात की जानकारी दे ही देता है। उसकी बातों में इस कदर जीवंतता होती है जैसे मानो बंदिनी से उसी के सामने फेरी की ओर दौड़ लगाई थी।

इन पचासों बरसों में देश में काफी कुछ बदला है लेकिन साहिबगंज से मनिहारी की ओर चलने वाले रास्ते में सिर्फ फेरी के चक्कर के दाम बढ़े हैं। वहां के आदमी की जेब पर बोझ बढ़ा है। जहाज पर आदमी के साथ गाड़ियां और ट्रक भी लदकर इधर से उधर जा रहे हैं। वहीं, रामभजन जैसे लोग खामोश होकर अपने हिस्से की गंगा को बचाने की कोशिशों में लगे हुए हैं।

आम इंसान से लेकर प्रशासन, नेता तक आस्था, पाप-पुण्य और राजनीति में सबकुछ अनदेखा कर आगे बढ़ रहे हैं। गंगा अगर नहीं रहेगी तो कुंभ नहीं रहेगा, माघ नहीं रहेगा, लोगों को मोक्ष नहीं मिलेगा, और आस्था और अर्थ के नाम पर होने वाला बहुत कुछ नहीं होगा। मानो सबके पेट खाली हैं, और सबकी भूख शांत करने के लिए गंगा की ही जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी को गंगा को रोककर तो कहीं थोपकर पूर्ति की जा रही है।

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गंगा को उसके गंतव्य तक पहुंचने में कई स्वार्थी तबकों ने रोड़ा अटकाया है जिसमें विकास और राजनीति का खेल पहले स्थान पर है। इलाहाबाद में गंगा की सुस्त लहर को गंगा संगम बताने में भी तकलीफ होती है लेकिन सब इस सच को नकारे हुए हैं। आम इंसान से लेकर प्रशासन, नेता तक आस्था, पाप-पुण्य और राजनीति में सबकुछ अनदेखा कर आगे बढ़ रहे हैं। गंगा अगर नहीं रहेगी तो कुंभ नहीं रहेगा, माघ नहीं रहेगा, लोगों को मोक्ष नहीं मिलेगा, और आस्था और अर्थ के नाम पर होने वाला बहुत कुछ नहीं होगा। मानो सबके पेट खाली हैं, और सबकी भूख शांत करने के लिए गंगा की ही जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी को गंगा को रोककर तो कहीं थोपकर पूर्ति की जा रही है।

गंगा को कृत्रिम सांसें देकर जीवित भी इसलिए रखा जा रहा है, क्योंकि उसकी मरने की खबर बाजार में बड़ी उथल पुथल मचा देंगी। गंगा के न होने पर करोड़ो की आस्था का अस्तित्व क्या होगा। गंगा की कायापलट के दावों और असलियत को बयां करने की यह किताब पूरी कोशिश करती है। गंगा के प्रति स्नेह से प्रेरित होकर पढ़ना शुरू करने के बाद अंत में उदासी लाती है। यह उदासी गंगा की वर्तमान की स्थिति को सोचते हुए और ज्यादा बढ़ती है।  

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तस्वीर साभारः Goodreads

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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