समाजखेल ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को चुनौती देती कबड्डी खेलती गांव ये औरतें

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को चुनौती देती कबड्डी खेलती गांव ये औरतें

गाँव की महिलाओं का लोक-लाज और लंबे घूंघट से निकलकर बेबाक़ी के साथ इस खेल में भागीदारी करना पितृसत्ता को सीधेतौर पर चुनौती दे गया।

अमिनी गाँव की 38 वर्षीय रेखा ने शादी के बाद पहली बार कबड्डी के खेल में हिस्सा लिया था। अपनी टीम का प्रतिनिधित्व करने जब रेखा मैदान पर उतरीं तो उनका जज़्बा देखने लायक़ था। रेखा की टीम में महिला दिवस पर आयोजित कबड्डी खेल प्रतियोगिता ने पहला स्थान प्राप्त किया था। रेखा कहती हैं कि उन लोगों की जानकारी में पहली बार ग्रामीण स्तर पर ऐसे किसी महिला खेल का आयोजन हुआ। आमतौर पर महिलाओं के लिए गीत-संगीत के कार्यक्रम ही आयोजित करवाए जाते हैं और जब भी किसी खेल प्रतियोगिता की बात आती है तो हमेशा लड़कियों के साथ खेल-प्रतियोगिता का आयोजन होता है वह भी स्कूल स्तर पर।

रेखा आगे बताती हैं, “यह हमलोगों के लिए नया और बेहतरीन अनुभव था। जब हम लोगों को इस प्रतियोगिता के बारे में पता चला तो गाँव की कोई महिला इसमें शामिल होने के लिए तैयार नहीं हुई। मैंने बहुत प्रयास करके पाँच लोगों की टीम बनाई। इसमें गाँव की कई महिलाएं बहुत नाराज़ भी हुईं। उनका कहना था कि अब गाँव की औरतें कबड्डी खेलेगीं। इन सबके बावजूद हम लोगों ने हिस्सा लिया और हमें ख़ुशी है कि हमने ये निर्णय लिया।”

कबड्डी खेलती महिलाएं

और पढ़ें : खेल में लैंगिक समानता के लिए महिला खिलाड़ियों के साथ-साथ महिला कोच की भूमिका पर भी ध्यान देना ज़रूरी

हर साल आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इस दिन अलग-अलग सरकारी और ग़ैर-सरकारी संस्थाएं महिला केंद्रित कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। मैंने ग्रामीण स्तर पर महिला दिवस पर आयोजित होने वाले कई तरह के कार्यक्रम देखे हैं और कुछ में हिस्सा लेने का मौक़ा भी मिला। हालांकि, अधिकतर कार्यक्रमों में शामिल होनेवाली ग्रामीण महिलाओं के बीच जातिगत भेदभाव की समस्या हमेशा देखने को मिली और गाँव की मुसहर जाति की महिलाओं को इस तरह के किसी भी कार्यक्रम में हिस्सा लेते नहीं देखा। हमेशा इस बात का मलाल रहता था कि जब भी हम लोग महिला दिवस पर महिला उत्थान, विकास और नेतृत्व की बात करते है तो हज़ारों की भीड़ में हम अपने गाँव-समाज के हाशिए पर बसा दिए गए समुदायों की महिलाओं को आख़िर क्यों इन कार्यक्रमों से जोड़ नहीं पाते हैं।

खेल तब और भी ख़ास हो जाता है जब उसे महिलाएं खेलती हैं। ख़ासकर कबड्डी जैसे खेल, जिसे आमतौर पर महिलाओं का खेल नहीं माना जाता है और जब ये गाँव की महिलाएं हो तो क़तई नहीं। ऐसे में गाँव की महिलाओं का लोक-लाज और लंबे घूंघट से निकलकर बेबाक़ी के साथ इस खेल में भागीदारी करना पितृसत्ता को सीधेतौर पर चुनौती दे गया।

इस बार आठ मार्च को जब सेवापुरी ब्लॉक के गाँव के साथ हमारी संस्था ने महिला कबड्डी का आयोजन रखा तो मेरे उस मलाल को राहत पहुंची। संस्था ने इस महिला कबड्डी खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन ही गाँव की मुसहर बस्ती में रखा था। अलग-अलग बस्तियों से महिलाएं इस दिन पूरी तैयारी के साथ इस बस्ती में पहुँची थी। बनारस के सेवापुरी ब्लॉक के बसुहन गाँव की मुसहर बस्ती में इस कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिसमें पंद्रह अलग-अलग गाँव के अलग-अलग जाति से आयी महिलाओं और किशोरियों ने हिस्सा लिया था। इस कार्यक्रम में मैंने यह साक्षात देखा कि कैसे खेल भेदभाव की दूरी को मिटाकर लोगों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाता है।  

और पढ़ें : एक युवा क्रिकेटर जो अपने समुदाय को लैंगिक समानता पर पुनिर्विचार करने में मदद करती है

खेल के बारे में बात करते हुए कबड्डी प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर चित्रसेनपुर गाँव की मुसहर बस्ती की टीम रन्नो कहती है, “हमलोगों को आजतक ऐसे किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेना तो दूर किसी कार्यक्रम को देखने तक की अनुमति नहीं मिल पाती है। पर आज इस कार्यक्रम में हम लोगों ने दूसरा स्थान हासिल किया। गाँव की क़रीब सभी जाति की महिलाएँ यहाँ आई और हम सभी ने साथ में इस खेल को खेला। इन सबसे हम लोगों का आत्मविश्वास बहुत बढ़ा है।”

कार्यक्रम के बहाने गाँव की अलग-अलग जाति की महिलाओं ने हिस्सा लिया और उन्होंने पूरे उत्साह के साथ ये भी कहा कि आगे भी वे ऐसे कार्यक्रम में हिस्सा लेती रहेंगीं। ये खेल की ताक़त है जिसका आयोजन मात्र इस भेदभाव को चुनौती देने में प्रभावी साबित हो सकता है कोई भी खेल हमेशा ‘हम’ की भावना को बढ़ावा देता है। जब हम लोग महिला की बात करते है तो अक्सर ये भूल जाते हैं कि महिलाओं की जाति, धर्म, वर्ग जैसे अलग-अलग मानक उनकी स्थिति को प्रभावित करते हैं।

कबड्डी के खेल में शामिल महिलाएं

और पढ़ें : पतंग उड़ाती बेबाक़-बेपरवाह लड़कियां!

खेल तब और भी ख़ास हो जाता है जब उसे महिलाएं खेलती हैं। ख़ासकर कबड्डी जैसे खेल, जिसे आमतौर पर महिलाओं का खेल नहीं माना जाता है और जब ये गाँव की महिलाएं हो तो क़तई नहीं। ऐसे में गाँव की महिलाओं का लोक-लाज और लंबे घूंघट से निकलकर बेबाक़ी के साथ इस खेल में भागीदारी करना पितृसत्ता को सीधेतौर पर चुनौती दे गया। इतना ही नहीं, अलग-अलग गाँव की टीम का साथ इस चुनौती को मज़बूत करने में भी बहुत प्रभावी रहा।

जब गाँव स्तर पर महिलाएं खुद मुखर होकर आगे बढ़ती हैं और ऐसे खेलों में हिस्सा लेती हैं तो ये उनके घर की दूसरी औरतों और किशोरियों की गतिशीलता और सक्रियता के भी द्वार खोल देता है। वास्तव में जब हम महिला विकास या नेतृत्व की बात करते है तो गाँव स्तर पर ऐसे कार्यक्रम का आयोजन बहुत ज़रूरी होता है, क्योंकि जाति, वर्ग, धर्म, जेंडर के नाम पर बंटी महिलाएं आज के इस आधुनिक युग में भी भेदभाव को मज़बूती से चुनौती नहीं दे पाई हैं। इन सभी सामाजिक समस्याओं को चुनौती देने में खेल अहम भूमिका अदा करते हैं, इसलिए ज़रूरी है कि ग्रामीण स्तर पर महिलाओं के साथ ऐसे कार्यक्रम का आयोजन हो, जो महिलाओं को सिर्फ़ स्रोता के तौर पर ही न देखे बल्कि उनकी भूमिकाओं को नेतृत्व की दिशा में बढ़ाए।

और पढ़ें : जो मुझे मर जाने को कहते थे, अब अपने बच्चों को मेरी मिसाल देते है : कश्मीरी पैरा एथलीट इशरत


सभी तस्वीरें रेणु द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं।

About the author(s)

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संबंधित लेख

Skip to content