बेबाक़-बेपरवाह पतंग उड़ाती लड़कियां!
तस्वीर साभार: Muheem
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हर साल जनवरी महीना शुरू होते ही उत्तर भारत में ठंड बढ़ने लगती है और इस ठंड के मौसम गाँव में हमेशा मैंने लड़कों को पतंग उड़ाते देखा है। ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ़ मेरे गाँव में ही है जहां सिर्फ़ लड़के पतंग उड़ाते हैं बल्कि अधिकतर जगहों पर पतंग उड़ाने के खेल में लड़के ही दिखाई देते हैं। इसलिए यह एक बेहद सामान्य घटना ही लगती है। चूंकि यह सालों से ऐसे ही चले आ रहा है। लेकिन आपने कभी सोचा क्या है कि लड़कियां गाँव में, गलियों में पतंग क्यों नहीं उड़ाती हैं? मैंने कई बार इसके बारे में सोचा, लेकिन कभी को ज़वाब नहीं मिला, इसलिए एक समय के बाद मैंने भी इस पर सोचना कम कर दिया।

लेकिन इस साल मकर संक्रांति के दो दिन पहले अपनी संस्था की तरफ़ से आयोजित पतंगबाज़ी के कार्यक्रम में गाँव की लड़कियों और महिलाओं के साथ मैंने हिस्सा लिया। मेरे लिए यह अनुभव बहुत अनोखा था। गाँव की लड़कियाँ और महिलाएँ जिनके हाथ में हमेशा मैंने चूल्हा-चौका देखा था, उन हाथों में पतंग की कमान देखना वाक़ई बेहद सुकून देने वाला था।

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पतंग उड़ाने की खुशी, तस्वीर साभार: Muheem

एक बड़े मैदान में पचास की संख्या में अलग-अलग गाँव से आई महिलाओं और किशोरियों का जुटान अपने आप में एक अलग तरह का माहौल बनाता है। वह माहौल जो महिला को इंसान के रूप में स्वीकार करता है बजाय उसकी बेटी, बहु, माँ या बहन जैसे भूमिकाओं के नाम से। इस जुटान में उस खेल में अपनी भागीदारी करना, जो सालों से पुरुषों के अधीन रहा हो वह और भी सुंदर था। बनारस से क़रीब तीस किलोमीटर दूर सेवापुरी ब्लॉक के तेंदुई गाँव में हमलोगों की मुहीम संस्था की तरफ़ से राष्ट्रीय युवा दिवस के दिन गाँव की लड़कियों और महिलाओं के साथ पतंगबाज़ी का कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम का नाम ‘आज़ाद पतंग उत्सव’ रखा गया।

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‘पतंग उड़ाना’ लोगों को एक सामान्य-सी बात लग सकती है, लेकिन खुले आसामान के नीचे, खुले मैदान में बिना किसी वक्त की पाबंदी के सिर्फ़ अपनी पतंग को ऊँची उड़ान देने के लिए मेहनत करती लड़कियों के लिए ये बिल्कुल भी सामान्य नहीं है।

इस कार्यक्रम के लिए इस दिन चुनने की वजह थी ‘युवा’ के नामपर लड़कियों की भागीदारी को उजागर करना, क्योंकि आमतौर पर हम लोग जब भी युवा होने की बात करते है तो युवा को लेकर हम लोगों के मन में सिर्फ़ पुरुषों की ही छवि होती है। वह छवि, जिसमें पुरुष जवान, जोशीला, आज़ाद, विशेषाधिकार से लैस और लक्ष्य की तरफ़ आगे बढ़ता हुआ होता है। लेकिन इस तस्वीर में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर ही देखने को मिलती है, इसी तस्वीर को चुनौती देने और लड़कियों का स्पेस क्लेम करने के लिए युवा दिवस का दिन इस कार्यक्रम के लिए चुना गया।

पतंगबाज़ी में शामिल लड़कियां, तस्वीर साभार: Muheem

जब लड़कियों के साथ इस पतंगबाज़ी के कार्यक्रम को लेकर मैने प्रतिभागियों से बात की तो तेंदुई गाँव की काजल ने कहा, “हम लोगों के गाँव में ऐसे किसी कार्यक्रम का आयोजन पहली बार हुआ है। अगर हम लोग अपने घर में पतंग लेकर छत पर भी चले जाए तो घरवाले बुरी तरह डांटने लगते हैं यह कहकर कि ये लड़कियों का काम नहीं है। जब कोई लड़का पतंग उड़ाता है तो उसे कोई कुछ नहीं कहता है लेकिन जैसे ही हम लड़कियां ऐसे किसी खेल की तरफ़ अपना कदम बढ़ाती हैं तो हम लोगों को हमेशा ‘इज़्ज़त’ का नाम लेकर रोक दिया जाता है और घर का काम करने भेज दिया जाता है। ऐसे में जब संस्था की तरफ़ से गाँव में इस कार्यक्रम का आयोजन हुआ तो घरवाले आसानी से तैयार हो गए और उन्होंने खुद हम लोगों को इसमें शामिल होने के लिए भेजा।”

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हमारे घरों में बचपन से ही लड़कियों को ऐसे तैयार किया जाता है कि उन्हें बेबाक़-बेपरवाह होने की इजाज़त नहीं होती। उन पर हमेशा दिखाई न देने वाली सख़्त घड़ी मानो साथ चलती है जो उन पर घर पर लौटने और घरों तक सीमित रहने वाले नियम की याद दिलाते रहते हैं। यही वजह है कि लड़कियों को बचपन से ही ऐसे खेल खेलने की इजाज़त दी जाती है, जिसमें उन्हें घर से बाहर निकलना न पड़े, तेज बोलना न पड़े, वे अपनी चाल से ज़्यादा अपने कपड़ों पर ध्यान दें, वग़ैरह-वग़ैरह। जेंडर के सख़्त नियम के बीच जब गाँव की लड़कियां और महिलाएं अपने कदम बदलाव की तरफ़ आगे बढ़ाने लगती है तो ये सामाजिक बदलाव की शुरुआत होती है।

पतंग उड़ाने की तैयारी करती लड़कियां, तस्वीर साभार: Muheem

हम लोग चाहे जितनी भी जेंडर समानता की बात करें लेकिन ये सब तब तक बातों में सीमित रहेगा, जब तक हम लोग अपनी रोज़ की ज़िंदगी में कोई बदलाव नहीं करेंगें। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि रोज़ की ज़िंदगी की छोटी-छोटी पहल से ही हम अपनी ज़िंदगी, घर, परिवार में बसे पितृसत्ता के बीज को मिटा सकती है। ‘पतंग उड़ाना’ लोगों को एक सामान्य-सी बात लग सकती है, लेकिन खुले आसामान के नीचे, खुले मैदान में बिना किसी वक्त की पाबंदी के सिर्फ़ अपनी पतंग को ऊँची उड़ान देने के लिए मेहनत करती लड़कियों के लिए ये बिल्कुल भी सामान्य नहीं है।

पतंग उड़ाती बेबाक़-बेपरवाह लड़कियां, तस्वीर साभार: Muheem

अगर आपको यक़ीन नहीं होता तो ख़ुद ही देख लीजिए कि पतंग उड़ाती बेबाक़-बेपरवाह लड़कियां कितनी आज़ाद लगती है। ये सभी वे तस्वीरें है जो बहुत कम ही देखने को मिलती हैं। जब महिला नेतृत्व में ऐसे खेल का आयोजन हो जहां पूरी कमान महिलाओं के हाथों में हो। 

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तस्वीर साभार : Muheem

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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