खेल में लैंगिक समानता के लिए महिला खिलाड़ियों के साथ-साथ महिला कोच की भूमिका पर भी ध्यान देना ज़रूरी
तस्वीर साभार : Global Giving
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“लड़कियों के लिए खेलने का संघर्ष उनके घर से ही शुरू हो जाता है। अगर घर में कोई स्पोर्ट्स किट लेकर आनी हो तो हम पहले अपने बच्चे (लड़के) के लिए लाते हैं और अपनी लड़की से कहते हैं कि बेटा आपको अगले साल लाकर देंगे या फिर लड़के द्वारा इस्तेमाल कर ली गई किट उसे देते हैं और उससे ही संतोष करने को कहते हैं। इस तरह से लड़कियों के लिए खेल की लड़ाई सबसे पहले सामाजिक मानसिकता के स्तर से शुरू होती है।” यह कहना है मध्यप्रदेश के रायसेन में बतौर जिला क्रीड़ा अधिकारी पदस्थ राजेश यादव का। इस बात पर विचार करने पर यह समझा जा सकता है कि एक लड़के के बजाय एक लड़की के लिए खेल की डगर कितनी मुश्किल है। बड़े शहरों में स्थित महंगे इंटरनेशनल स्कूल के बरक्स गाँव और छोटे शहरों में पढ़नेवाली लड़कियों के लिए तो खेल को अपने भविष्य के रूप में देखना लगभग नामुमकिन सा एक सपना है। 

इस स्थिति को ऐसे समझिए कि कबड्डी खेलती हुई लड़की का चित्र हमारे साहित्य के गल्पों से भी लगभग नदारद सा है। स्कूल जाने के लिए मुश्किल से घर की दहलीज पार कर पानेवाली गाँव की लड़कियों के लिए हर कक्षा को अच्छे नंबर से पास करना केवल आगे बढ़ने का ज़रिया भर नहीं है बल्कि अपनी पढ़ाई रुकने से बचाने का एक मात्र तरीका भी है। ऐसे में क्लास में फेल होने के साथ-साथ खेल के मैदान में खेलना उन कारणों में आम तौर पर शामिल होता है जिससे उनकी पढ़ाई रुक सकती है।  

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संध्या मौर्य मध्यप्रदेश के खंडवा जिले की एक शासकीय स्कूल में बतौर व्यायाम शिक्षक कार्यरत हैं। अपने 12 साल के अनुभव के आधार पर मौर्य कहती हैं कि एक लड़के और एक लड़की को खिलाड़ी के रूप में विकसित करना बिलकुल भी एक जैसा नहीं है। उनके अनुसार किसी भी व्यक्ति का खेल के मैदान पर आना उसके खिलाड़ी बनने के सफ़र में सबसे पहला चरण है। इसी चरण से ही दो लोगों के अनुभव उनके लिंग के आधार पर अलग-अलग हो जाते हैं। मौर्य आगे बताती हैं, “एक लड़के के मुकाबले किसी लड़की को खेल के मैदान पर लाना ज़्यादा मुश्किल है क्योंकि हमारे समाज में लड़कियों को दोहरी भूमिका निभानी पड़ती है।” साथ ही वह कहती हैं कि घर के तमाम काम को करना और खेल को साथ-साथ जारी रखना बेहद मुश्किल चीज़ है। लड़कों को अक्सर इस मामले में सुविधा होती है क्योंकि उन्हें घर के काम नहीं करने पड़ते। 

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कबड्डी खेलती हुई लड़की का चित्र हमारे साहित्य के गल्पों से भी लगभग नदारद सा है। स्कूल जाने के लिए मुश्किल से घर की दहलीज पार कर पानेवाली गाँव की लड़कियों के लिए हर कक्षा को अच्छे नंबर से पास करना केवल आगे बढ़ने का ज़रिया भर नहीं है बल्कि अपनी पढ़ाई रुकने से बचाने का एक मात्र तरीका भी है। ऐसे में क्लास में फेल होने के साथ-साथ खेल के मैदान में खेलना उन कारणों में आम तौर पर शामिल होता है जिससे उनकी पढ़ाई रुक सकती है।  

हमारे पितृसत्तात्मक समाज में मौजूद बाल विवाह जैसी कुरीतियां भी अक्सर लड़कियों के खेल में रुकावट बन जाती हैं। इसी से संबंधित एक घटना का ज़िक्र करते हुए संध्या हमें बताती हैं कि एक बार उनकी एक खिलाड़ी को वह राज्य स्तरीय कबड्डी प्रतियोगिता में सिर्फ़ इसलिए नहीं ले जा सकीं क्योंकि माता-पिता के राज़ी होने के बावजूद उसके सास-ससुर को लड़की का बाहर जाना मंज़ूर नहीं था। 

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सिर्फ खेलना ही नहीं खिलाना भी उतना ही मुश्किल

औरतों के लिए खेल खेलना जितना कठिन है उतना ही कठिन खेल खिलाना भी है। बतौर कोच या खेलकूद प्रशिक्षक महिलाओं के अनुभव भी अपने पुरुष साथियों से उतने ही अलग हैं जितने खिलाड़ियों के। हॉकी की राष्ट्रीय खिलाड़ी रह चुकीं वर्षा जाधव वर्तमान में छिंदवाड़ा जिले के एक सरकारी स्कूल में बतौर खेल प्रशिक्षक कार्यरत हैं। बतौर महिला प्रशिक्षक अपने संघर्षों को साझा करते हुए वह बताती हैं, “अधिकतर पुरुष जब थककर घर आते हैं तो उनको एक परोसी हुई थाली मिल जाती है जिसे खाकर वह आराम करने जा सकते हैं मगर हम महिलाओं के पास यह सुविधा नहीं है।” वह कहती हैं कि पुरुष प्रधान देश होने के चलते अक्सर महिलाओं को नकारात्मक माहौल का सामना करना पड़ता है जिससे कई महिलाओं को समझौता करना पड़ता है और उनकी प्रतिभा दबकर रह जाती है। 

मध्यप्रदेश के रायसेन में जिला क्रीड़ा अधिकारी के रूप में पदस्थ राजेश यादव भी खेलों में महिलाओं की वर्तमान स्थिति के लिए समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। यादव कहते हैं कि क्रिकेट जो भारत का सबसे लोकप्रिय खेल है उसमें भी हमें महिला टीम के सभी खिलाड़ियों के नाम नहीं पता होते हैं जबकि पुरुषों की टीम के बारे में एक-एक जानकारी हमें पता होती है। उनका कहना है कि महिला प्रशिक्षकों का पर्याप्त मात्र में न होना भी लड़कियों के खेल में पिछड़ने का एक कारण है। यादव आगे जोड़ते हुए कहते हैं, “साल 2001 के बाद से मध्यप्रदेश में महिला खेलकूद प्रशिक्षकों (PTI) की भर्ती नहीं हुई है।” यादव का मानना है कि पुरुषों के मुक़ाबले महिला प्रशिक्षक का होना लड़कियों को ज़्यादा सहज करता है। ऐसे में महिला प्रशिक्षकों की संख्या महिला खिलाड़ियों की संख्या को भी प्रभावित करती है।

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अंजलि श्रीवास्तव साल 2004 से मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिला पन्ना में जिला क्रीड़ा अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। वह कहती हैं कि ग्रामीण इलाके की महिला खिलाड़ियों में विश्वस्तरीय खिलाड़ी बनने की पूरी संभावना है मगर सामाजिक कठिनाइयों के चलते हम इनकी प्रतिभा का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। श्रीवास्तव महिला प्रशिक्षकों एवं खिलाड़ियों की कमी का प्रमुख कारण प्रशिक्षण केंद्र का न होना भी मानती हैं। वह बताती हैं, “पहले पेंड्रा में महिला प्रशिक्षण केंद्र हुआ करता था। मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद वह छत्तीसगढ़ का हिस्सा हो गया। इसके बाद मध्यप्रदेश में महिलाओं के लिए कोई भी प्रशिक्षण केंद्र नहीं स्थापित हुआ जिसके कारण महिला प्रशिक्षक नहीं तैयार हो पा रही हैं।” 

महिलाओं की भूमिका तय करने वाला हमारा पुरुष प्रधान समाज स्कूल के अंदर केवल कक्षा को ही वह जगह मानता है जहां कोई महिला काम का सकती है। यही कारण है कि अंग्रेज़ी, गणित या कोई और विषय पढ़ाती शिक्षिका तो सामाजिक रूप से स्वीकार्य है मगर एक खेल प्रशिक्षक के रूप महिला को देखना समाज को अक्सर असहज कर देता है। बीबीसी द्वारा साल 2020 में किए गए एक सर्वे में एक तिहाई से ज्यादा लोगों ने एक या उससे अधिक ऐसे खेलों की पहचान की जो उनके अनुसार महिलाओं के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इनमें कुश्ती, बॉक्सिंग और वेटलिफ्टिंग जैसे वह खेल भी शामिल हैं जिनमें भारतीय महिला खिलाड़ियों ने अपना परचम दुनियाभर में लहराया है। यह परिणाम इस हकीक़त को दिखाते हैं कि समाज द्वारा ऐसे किसी भी बाहरी काम जिसमें शारीरिक शक्ति का इस्तेमाल प्राथमिक होता है, के लिए महिलाओं को अयोग्य समझा जाता है।  

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महिलाओं की भूमिका तय करने वाला हमारा पुरुष प्रधान समाज स्कूल के अंदर केवल कक्षा को ही वह जगह मानता है जहां कोई महिला काम का सकती है। यही कारण है कि अंग्रेज़ी, गणित या कोई और विषय पढ़ाती शिक्षिका तो सामाजिक रूप से स्वीकार्य है मगर एक खेल प्रशिक्षक के रूप महिला को देखना समाज को अक्सर असहज कर देता है।

महिला खिलाड़ियों को बढ़ावा देने की योजनाें क्यों महज़ खानापूर्ति बनकर रह गईं?

गौरतलब है कि सिडनी ओलंपिक (2000) से लेकर टोक्यो ओलंपिक (2020) तक भारत कुल 13 मेडल जीत चुका है जिसमें से 5 मेडल महिलाओं ने जीते हैं। साल 2016 में हुए रियो ओलंपिक में महिला खिलाड़ियों ने ही देश को खाली हाथ लौटने से बचाया था। इन तथ्यों के बाद भी सामाजिक मानसिकता और सरकारी सुविधा के अभाव के चलते गाँव और आदिवासी इलाकों की कई महिला खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा के अनुसार मौके नहीं मिल पाते हैं। 

ओलंपिक अथवा इसी तरह के अन्य अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में मेडल जीतने वाली महिलाओं को ईनाम के रूप में विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र सरकार द्वारा मिलने वाले पैसों और सरकारी पदों के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा खेल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए किए गए सीमित प्रयास भी मात्र खानापूर्ति बनकर रह गए हैं। साल 1975 में भारत सरकार द्वारा नेशनल स्पोर्ट्स फेस्टिवल फ़ॉर वीमेन आयोजित करने का निर्णय लिया गया। महिला स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थानीय एवं जिला स्तर पर होने वाला ये आयोजन अब औपचारिकता मात्र रह गया है। नेशनल कमीशन फॉर यूथ द्वारा साल 2004 में सौंपी गई रिपोर्ट के मुताबिक यह आयोजन अब केवल प्रमाणपत्र जारी करने की औपचारिकता तक ही सीमित रह गया है। 

साल 2001 में ड्राफ्ट की गई राष्ट्रीय खेल नीति में भी महिलाओं के खेल एवं उनकी समस्याओं का सामान्यीकरण करती हुई दिखाई देती है। यह नीति महिलाओं को खेल में बढ़ावा देने का ज़िक्र तो करती है लेकिन उसके लिए कोई अलग सरकारी संस्था स्थापित करने या किसी अन्य विशेष योजना का ज़िक्र नहीं करती है। लगभग 6 पेज के इस ड्राफ्ट में महिलाओं के स्पोर्ट्स के लिए एक अलग हेडिंग भी नदारद है।   

मैरी कॉम, मीराबाई चानू, बबिता फोगाट से लेकर साक्षी मालिक तक ऐसी कई महिलाएं हैं जिन्होंने अपनी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हुए भी कीर्तिमान रचे हैं। वहीं, इसके साथ ही देश के ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में ऐसी कई खिलाड़ी मौजूद हैं जिनकी प्रतिभा इस परिस्थियों के आगे दम तोड़ रही है। जहां एक ओर देश को ऐसी अच्छी खिलाड़ियों की दरकार है वहीं दूसरी ओर इन प्रतिभाओं को निखारने के लिए ज़रूरी है कि महिला प्रशिक्षकों को भी सामाजिक और सरकारी सहयोग बेहतर तरीके से प्राप्त हो।           

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तस्वीर साभार : Global Giving

यह लेख शिशिर ने लिखा है जिनका ताल्लुक मूल रूप से मध्यप्रदेश के सतना जिले के मैहर नामक स्थान से है। अपने बारे में वह लिखते हैं- “धर्म, जाति, लिंग एवं आर्थिक स्थिति के आधार पर मिले तमाम प्रिविलेज को शुरुआती दिनों में यहीं जिया। गृह जिले से ही स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दाखिला लिया जहां मीडिया और समाजशास्त्र की पढ़ाई करते हुए इन प्रिविलेज्स और सोशल स्ट्रेटिफिकेशन को समझना शुरू किया। इसी दौरान न्यूज़लॉन्ड्री सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों में बतौर प्रूफरीडर, कॉपीराइटर, रिपोर्टर और प्रोड्यूसर काम किया है। फिलहाल बतौर गाँधी फेलो मध्यप्रदेश के दो आदिवासी जिलों (खरगोन एवं झाबुआ) में शिक्षा संबंधी कार्यों में संलग्न हूं।” आप शिशिर को फेसबुकलिंक्डइन पर फॉलो कर सकते हैं।

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