इंटरसेक्शनलजेंडर औरतों की थाली को कैसे पितृसत्ता कंट्रोल करती है

औरतों की थाली को कैसे पितृसत्ता कंट्रोल करती है

ज़मीनी सच्चाई यही है कि आज भी महिलाओं के पोषण को कोई ज़रूरी मुद्दा नहीं माना जाता है, जिसकी वजह से न केवल महिलाओं का बल्कि उनके होने वाले बच्चों का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) 2019-21 के अनुसार, भारत में स्वास्थ्य और पोषण का अभाव लगातार बढ़ रहा है। देश में प्रजनन आयु की 57 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी है। महिला सशक्तिकरण और विकास के दौर में ये आंकड़े देश में महिलाओं के स्वास्थ्य की स्थिति बताने के लिए काफ़ी है। पोषण किसी भी देश के नागरिक का अधिकार है।

अगर बात करें अपने भारत देश की तो हाल ही में, कोरोना काल के दौरान पोषण और स्वास्थ्य का मुद्दा काफ़ी उजागर हुआ था, जिसके बाद मौजूदा सरकार ने राशन वितरण पिछले दो सालों में तेज़ किया। लेकिन क्या यह राशन वितरण अपने भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण स्तर को तय करने के लिए काफ़ी है, ये अपने आप में एक बड़ा सवाल है। ज़मीनी सच्चाई यही है कि आज भी महिलाओं के पोषण को कोई ज़रूरी मुद्दा नहीं माना जाता है, जिसकी वजह से न केवल महिलाओं का बल्कि उनके होने वाले बच्चों का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है।

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“मैंने अपनी माँ को भी दादी के घर यही करते देखा था। जब वह पूरे परिवार के खाना खाने के बाद खाती थी और आख़िरी में उनके हिस्से में सूखी रोटी और थोड़ी बहुत दाल या सब्ज़ी ही बचती थी। गाँव में क़रीब अधिकतर परिवारों की महिलाओं की यही स्थिति आज भी है, जब वह पूरे परिवार के खाना खाने के बाद बचाखुचा खाने को मजबूर होती हैं।”

शादी के बाद जब मैं ससुराल गई तो उससे पहले मेरी माँ ने मुझे ससुराल में खानपान और रहन-सहन को लेकर कुछ नियम बताए थे। उन्होंने कहा था कि ये नियम कभी ज़िंदगी में तोड़ना मत। उन्होंने बताया था कि हमेशा घूंघट में रहना, कभी सिर से साड़ी का पल्ला न गिरे इस बात का ध्यान रखना और परिवार में सबके खाने के बाद ही खाना। मैंने अपनी माँ को भी दादी के घर यही करते देखा था। जब वह पूरे परिवार के खाना खाने के बाद खाती थी और आख़िरी में उनके हिस्से में सूखी रोटी और थोड़ी बहुत दाल या सब्ज़ी ही बचती थी। गाँव में क़रीब अधिकतर परिवारों की महिलाओं की यही स्थिति आज भी है, जब वे पूरे परिवार के खाना खाने के बाद बचाखुचा खाने को मजबूर होती हैं।

इतना ही नहीं, महिलाएं अपनी किशोरावस्था की लड़कियों को भी अपनी तरह तैयार करने के लिए उनकी भी खाना खाने की आदत अपनी जैसी ही बना देती हैं। इस कारण लड़कियों को भी माँ की तरह बचा हुआ भोजन ही खाने को मिल पाता है। किशोरावस्था के दौरान लड़कियों के पीरियड्स शुरू होने बाद भी उनके पोषण में कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। हालांकि, बढ़ती उम्र के साथ उन पर काम का बोझ ज़रूर बढ़ाया जाता है, जिसकी वजह से उनका शारीरिक और मानसिक विकास भी प्रभावित होता है।  

घर में सब्ज़ी या पौष्टिक भोजन को पहले पुरुषों के लिए ज़रूरी माना जाता है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज और परिवार का ये विचार होता है कि क्योंकि पुरुष बाहर कमाने जाता है और मेहनत करता है, इसलिए उसको महिलाओं की अपेक्षा ज़्यादा पोषण की ज़रूरत है। इसी विचार के चलते महिलाओं का परिवार के सभी सदस्यों के खाने के बाद खाना खाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसे एक ‘अच्छी या आदर्श’ महिला होने के लिए ज़रूरी बताया जाता है।

द ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट, 2017 के मुताबिक़ भारत में माँ बनने में सक्षम देश की आधी से अधिक महिलाएं खून की कमी का शिकार है। गाँव में महिलाओं और लड़कियों में अक्सर खून की कमी की समस्या देखी जाती है, जिसका प्रमुख कारण है उन्हें पौष्टिक भोजन न मिल पाना। कई शोध में यह पाया गया है कि जब हम कुपोषण की कड़ी को ख़त्म करने की बात करते हैं तो इसके लिए महिलाओं का स्वस्थ होना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, क्योंकि अगर मां कुपोषित होगी तो उससे जन्म लेने वाले बच्चे भी कुपोषित होंगे और फिर कुपोषण की समस्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहेगी। ऐसा ही भारत में हमें देखने को भी मिल रहा है।

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घर में सब्ज़ी या पौष्टिक भोजन को पहले पुरुषों के लिए ज़रूरी माना जाता है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज और परिवार यह मानता है कि चूंकि पुरुष बाहर कमाने जाता है और मेहनत करता है, इसलिए उसको महिलाओं की अपेक्षा ज़्यादा पोषण की ज़रूरत है। इसी विचार के चलते महिलाओं का परिवार के सभी सदस्यों के खाने के बाद खाना खाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसे एक ‘अच्छी या आदर्श’ महिला होने के लिए ज़रूरी बताया जाता है। ये परंपरा लेकिन धीरे-धीरे महिलाओं को अंदर ही अंदर खोखला करने का काम करती है।

हमें यह समझना होगा कि सबसे पहले ‘अच्छी या आदर्श महिला’ बनने का विचार ही पितृसत्ता की उपज है जो महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकार और विकास से दूर करता है। यह दूरी धीरे-धीरे उनके शारीरिक और मानसिक विकास को इस तरह प्रभावित करती है कि वे चाहकर भी कई बार आगे नहीं बढ़ पाती हैं। लड़कियों में पोषण का अभाव कई बार उनके स्कूल ड्रॉप आउट होने का कारण भी बनता है, जब दूर स्कूल पढ़ने साइकिल या पैदल जाने में थक ज़ाया करती हैं या बीमार हो ज़ाया करती हैं। सरकारी योजनाएं भले ही राशन वितरण को बढ़ावा दें और उसकी मात्रा बढ़ाएं, पर जब बात महिलाओं के पोषण की आती है तो उनकी थाली तक पौष्टिक भोजन को पहुंचाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। इसलिए अगर हम वाक़ई में महिला सशक्तिकरण और विकास को ज़मीनी सरोकार से जोड़ना चाहते हैं तो इसके लिए महिलाओं के पोषण पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है।

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तस्वीर साभार: UNICEF

About the author(s)

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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