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पच्चीस वर्षीय अभिलाषा (बदला हुआ नाम) बनारस से करमसीपुर गांव की रहने वाली है। अभिलाषा की शादी चार से पहले हुई थी। पढ़ी-लिखी अभिलाषा एक सरकारी टीचर है। टीचर में नियुक्ति से पहले अभिलाषा के परिवारवालों को शादी के लिए लड़का खोजने में काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन जैसे ही अभिलाषा के सरकारी टीचर होने खबर मिली उसके लिए अच्छे रिश्ते मिलने लगे। बता दें, समाज में अच्छे रिश्ते की परिभाषा, पढ़े-लिखे, अमीर परिवार के साथ ‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ लड़की से है। अभिलाषा की शादी भी एक सरकारी टीचर से तय की गई। शादी के बाद अभिलाषा की ज़िंदगी धीरे-धीरे बदलने लगी और उसे पूरा परिवार सिर्फ़ पैसे कमाने की मशीन जैसा इस्तेमाल करने लगा। नतीजतन तीन साल बाद अभिलाषा ने अपनी शादी तोड़ दी।

समाज में बदलते समय के साथ कई बदलाव आए। कई संस्थाओं और व्यवस्थाओं के रूप-स्वरूप में बदलाव आया है लेकिन अफ़सोस अभी भी कुछ कुरितियों के रंग बदले हैं, मूल नहीं। इसका उदाहरण हमें अभिलाषा के रूप में देखने को मिलता है। यूं तो हमारे समाज में दहेज को लेकर क़ानून काफ़ी पहले बन चुका है, जिसके तहत दहेज को ग़ैर-क़ानूनी बताया जा चुका है। इसलिए अब शादियों में लेन-देन की बात गिफ़्ट के ‘कोड वर्ड’ में ज़्यादा की जाती है। खुलकर सामान और पैसे मांगने की बजाय “आप अपनी बेटी को जो देना चाहे” जैसी बात की जाती है।

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भारत के कई क्षेत्रों में अभी भी अरेंज मैरिज के नामपर दहेज का लंबा व्यापार होता है, जहां ऊंची पोस्ट वाले दूल्हों का रेट फ़िक्स होता लेकिन इस फ़िक्स रेट में भी मोलभाव लड़की की नौकरीपेशा होने से संभव होता है। अगर लड़की भी किसी अच्छी सैलरी वाली नौकरी में है तो उसके अनुसार दहेज की रक़म को कम-ज़्यादा किया जाता है, इस भरोसे के साथ कि अभी पैसे कम लेगें क्योंकि बाद में लड़की की सैलरी अपने घर ही आएगी।

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अब शादियों में लेन-देन की बात गिफ़्ट के ‘कोड वर्ड’ में ज़्यादा की जाती है। खुलकर सामान और पैसे मांगने की बजाय “आप अपनी बेटी को जो देना चाहे” जैसी बात की जाती है।

दहेज को लेकर जहां एक रूप इसके कोड वर्ड में बदलाव को लेकर देखने को मिलता है। वहीं, नौकरी वाली बहु लाने का चलन भी इसका दूसरा रूप है। शादी के लिए नौकरी वाली लड़कियों की बढ़ती मांग दहेज का वह स्वरूप है जो लड़की को एक इंसान नहीं बल्कि ‘दुधारू गाय’ के रूप में देखती है। शादी के बाद नौकरीपेशा लड़की से ये उम्मीद की जाती है कि वे अपनी सैलरी को अपने ससुराल में खर्च करें। इतना ही नहीं, कई बार ये उम्मीद हिंसक भी हो जाती है।

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महिलाएं अब महिला-हिंसा के बारे जागरूक हो रही हैं लेकिन अभी भी उन्हें आर्थिक हिंसा के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है। इसी वजह से कई बार महिलाएं लंबे समय तक परिवार, शादी और रिश्ते के नाम पर आर्थिक हिंसा का सामना करती हैं। यहां लगातार महिलाओं का आर्थिक दोहन जारी रहता है। वह दोहन जिसे शादी के बाद दहेज के रूप में आजीवन किया जाता है। बेशक जब घर में महिला-पुरुष दोनों ही आर्थिक रूप से स्वावलंबी होते हैं तो परिवार का स्वरूप और बेहतर होता है। लेकिन इस बेहतर स्वरूप के बहाने कई बार महिलाएं अपने ख़ुद के पैसों पर अपना हक़ ही खोने लगती हैं।

शादी के लिए नौकरी वाली लड़कियों की बढ़ती मांग दहेज का वह स्वरूप है जो लड़की को एक इंसान नहीं बल्कि ‘दुधारू गाय’ के रूप में देखती है। शादी के बाद नौकरीपेशा लड़की से ये उम्मीद की जाती है कि वो अपनी सैलरी को अपने ससुराल में खर्च करे। इतना ही नहीं, कई बार ये उम्मीद हिंसक भी हो जाती है।

चित्रसेनपुर गांव की वनवासी बस्ती में रहने वाली सुनीता (बदला हुआ नाम) ईंट भट्टे में काम करने जाती है। शादी के पहले से ही सुनीता ईंट भट्टे में काम करती थी। जब उसकी शादी तय हुई तो इस आधार पर सुनीता की ख़ूब वाहवाही की गई कि ससुराल आने के बाद जब वह भी मज़दूरी के लिए पति के साथ जाएगी तो घर में ज़्यादा पैसा आएगा लेकिन शराबी पति शादी के बाद सुनीता का आर्थिक शोषण करने लगा। तीन बच्चों के बाद भी जब रोज़ वह अपनी शराब के लिए सुनीता से मारपीट करके पैसे छीन लेता तो कई बार उसे और उसके बच्चों को भूखे पेट सोना पड़ता। एक दिन सुनीता ने अपने पति को छोड़ने का फ़ैसला किया और उसे छोड़कर वो अपने मायके चित्रसेनपुर आ गई।

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सुनीता और अभिलाषा के वर्ग और आर्थिक परिवेश में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है लेकिन जब हम इनके साथ शोषण के स्वरूप को देखते है दोनों को आर्थिक हिंसा का ही पीड़ित पाते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि समय रहते हम दहेज के बदले रूप को पहचाने और इससे बचें। यहां गौर करने वाली एक बात यह भी है कि अक्सर ये देखा जाता है कि जो लड़की किसी बिज़नेस में है और चाहे कितना भी मुनाफ़ा कमाए, उसके साथ शादी करने में लोग कतराते है क्योंकि उन्हें लड़की की लीडरशिप, निर्णय लेने की क्षमता और ख़ुद का पैसा ख़ुद के अनुसार खर्च करने वाली लड़कियों के विचार से हमारा पितृसत्तात्मक समाज डरता है। दहेज लोभी परिवार अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वह ऐसी लड़की को अपनी बहु बनाते हैं तो वे उसे किसी दुधारू गाय की तरह इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।

दहेज से बचने के लिए हमेशा सलाह दी जाती है कि लालची परिवार से बचना चाहिए। ठीक उसी तरह हमें अब नौकरीपेशा वाली बहु को दहेज के रूप में मांग करने वाले परिवारों से भी बचने की ज़रूरत है। वे परिवार जिनके लिए नौकरीपेशा लड़कियां पैसे कमाने की मशीन होती हैं। शुरुआत में आर्थिक हिंसा को नज़रंदाज़ करके महिलाएं अपने रिश्ते और परिवार को बचाने में लग जाती हैं जो कहीं न कहीं आने वाले समय में उनके लिए एक बड़ी भूल साबित होती है। ज़रूरी है कि अपने साथ होने वाली आर्थिक हिंसा को हम नज़रंदाज़ करने की बजाय गंभीरता से लें और पहली बार में ही इसके ख़िलाफ़ कदम उठाए।

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तस्वीर साभार : रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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