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सामाजिक बदलाव सबसे धीमी गति से होनेवाला बदलाव हैं। कारण, इन कोशिशों को सरकारी तंत्र, सामाजिक संस्थाएं, ऐतिहासिक रूप से किसी भी पहचान के कारण शोषक समुदाय का हिस्सा रहे लोग अपनाने में देरी करते हैं, विरोध करते हैं। जब एक समय के बाद इन बदलावों की लहर का विरोध या उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो जाता है तब भी वे इन्हें लेकर पूरी तरह ज़िम्मेदराना व्यवहार नहीं कर पाते। ऐसे ही उदाहरण सीबीएसई दसवीं की इन दिनों चल रही पहले टर्म की परीक्षाओं में देखने को मिल रहा है। 

बीते 7 दिसंबर को अंग्रेजी की परीक्षा हुई। सेक्शन A रीडिंग के अंतर्गत पैसेज/गद्य पढ़कर उसमें से पूछे गए सवालों का जवाब देना था। इस गद्य में बताया गया कि आज कल के टीनएजर क्यों अपनी एक अलग दुनिया बनाकर रहने लगे हैं। कारण दिया जाता है, अभिभावकों की सत्ता में ढिलाई। घर के अंदर अभिवावकों की सत्ता कम होने और टीनएजर्स की बढ़ती अनुशासनहीनता का कारण ’emancipation of wife’ को बताया गया है। गद्य लिखनेवाले एक नॉस्टेल्जिया में जाते हैं। एक शताब्दी पहले की बात करते हैं जब पति घर का ‘मालिक’ यानि ‘मास्टर’ था। पत्नी का काम होता था पति की सत्ता को सुनिश्चित करना। इस तरह से घर के बच्चे और नौकरों को ‘उनकी जगह पर रहना सिखाया जाता था।’ 

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अंग्रेजी के प्रश्नपत्र में आए इस गद्य का यह पहला पैरा था। ऐसी बातें न सिर्फ महिला-विरोधी हैं बल्कि जातिवादी और वर्गविभेदी भी हैं। शहरों के ज्यादातर घरों में काम करनेवाले घरेलू कामगार दलित-बहुजन तबक़े से होते हैं। गाँवों में ‘नौकर’ रखने की परंपरा जमींदारों के घरों में हुआ करती थी। जमींदारी व्यवस्था शोषकारी व्यवस्था है। नेशनल डोमेस्टिक वर्कर्स मूवमेंट की वेबसाइट के मुताबिक भारत में डोमेस्टिक वर्कर्स की संख्या 4.2 मिलियन के सरकारी अनुमान से लेकर 50 मिलियन के गैरसरकारी अनुमान के बीच कुछ भी हो सकती है। साल 2009-2010 में दो तिहाई से ज्यादा वर्कर्स शहरी इलाकों में काम करते थे। इनमें से अधिकतर लोगों ने न्यूनतम शिक्षा हासिल की है, वे ग़रीब और शोषित समुदायों से आते हैं। 

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सीबीएसई के अंग्रेज़ी का प्रश्नपत्र

अंग्रेजी के प्रश्नपत्र का यह गद्य आगे बीसवीं शताब्दी में कम हो रही बच्चों की संख्या का कारण नारीवादी आंदोलनों को बताता है। आख़िरी पैरा के अनुसार, लोगों ने बहुत धीरे नोटिस किया कि पति की बढ़ती सत्ता की वज़ह से ही बच्चों पर अभिभावकों की सत्ता कमज़ोर पड़ी। पिता और माता के बीच असहमति की स्थितियों से बच्चे दोनों से दूर हो जाते हैं। यह लाइन पितृसत्तामक परिवार के ढांचे को नए तरह से ग्लोरीफाई करती है। कई बार पति-पत्नी केवल सामाजिक दबाव में टूटी हुई प्रेमहीन शादी को निभा रहे होते हैं। कई बार महिलाओं के पास एक हिंसक शादी में रहने के अलावा तत्काल रूप से कोई और विकल्प नहीं होता। कारण, आर्थिक स्वतंत्रता, परिवार पालने की चिंता, अन्य पारिवारिक सदस्यों का दबाव, ‘परिवार’ बचाने की जिम्मेदारी इत्यादि।

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इन सारी दिक़्क़तों से उबरने में उन्हें समय लगता है। अक्सर उनका जीवन ऐसे ही रिश्ते में व्यतीत हो जाता है। यह स्थिति कहीं से भी ग्लोरीफाई करनेवाली नहीं है। माँ की बुरी मानसिक या/और शारीरिक हालात बच्चों के लिए कभी भी स्वास्थ्य वातावरण नहीं सुनिश्चित करता है। कनाडा सरकार की एक वेबसाइट परिवार में माँ द्वारा झेली गई हिंसा का बच्चों पर पड़ने वाले प्रभावों पर बात करती है। ये बदलाव कभी देखे जा सकते हैं और कई बार आंतरिक होते हैं। अलग-अलग बच्चों पर इसका प्रभाव अलग अलग होता है। जैसे: महिलाओं को लेकर असंवेदनशील हो जाना, तेज़ आवाज़ या हिंसा देखर वे ट्रिगर हो सकते हैं, इत्यादि। इसे एक संवेदनशील तरीक़े से बताने की जगह सीबीएसई ने नाजुक दिमाग़ों को ग़लत जानकारी दी और उन्हें ट्रिगर किया। गद्य के बाद पूछे गए वैकल्पिक सवाल भी बहुत ही तर्कहीन और बेतुके हैं।

अभी तक सीबीएसई ने हिंदी के इस प्रश्नपत्र पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, न ही इसे रद्द किया है। जहां विपक्ष और महिला आयोग ने अंग्रेजी के प्रश्नपत्र पर सवाल किया, वहीं जाति व्यवस्था को लेकर इस गद्य पर कई प्रगतिशील टिप्पणीकारों ने चुप्पी बरती हुई है। महिला हित में बात करनेवालों द्वारा जातिगत पहचान के कारण होनेवाले अपराधों पर चुप्पी समस्याजनक है। 

ट्विटर पर इसका विरोध हुआ। संसद में सोनिया गांधी ने यह मुद्दा उठाया था। विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी इसे महिला विरोधी बताया। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने इसे स्त्री-विरोधी कहा। 13 दिसंबर को एक सर्कुलर जारी करते हुए सीबीएसई ने इस सवाल को रद्द माना और इसके लिए अंक दिए जाने की बात कही। हालांकि, सवाल रद्द किया जाना भर काफी नहीं है। इसके लिए प्रश्नपत्र बनाने और उसे पास करनेवाले ज़िम्मेदार व्यक्तियों को माफ़ी मांगनी चाहिए थी। इस मामले में कम से कम सीबीएसई ने इतनी प्रतिक्रिया दी लेकिन 9 दिसंबर को ही हुई हिंदी की परीक्षा में आए जातिवादी गद्य पर कोई सफाई पेश नहीं की गई, न ही विरोध हुआ है।

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जातिवादी प्रश्न पत्र पर कब कार्रवाई की मांग करेगी हिंदी पट्टी?

हिंदी बी में आए एक गद्य में जाति व्यवस्था को लेकर सकारात्मक बातें लिखी गई हैं। जातिगत आधार पर बंटे समाज को ‘चरित्र निर्माण’ के लिए जरूरी लिखा गया है। चारों जातियों की चार तुलना मित्रों से की गई है जो एक दूसरे को ‘सही राह’ दिखाते हैं। शहरों में ‘ढीले’ होते जातिगत पहचान पर टिप्पणी करते हुए लेखक भारत के गॉंवों का ज़िक्र करते हैं, “हम जो अभी अपने ग्रामीण संस्कारों से मुक्त नहीं हो पाए हैं, उन्हें अपनी स्मृति में संजोए हैं।” हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में हर दस मिनट पर एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति को आपराधिक घटना का शिकार होना पड़ता है, ऐसा नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं। बिहार, राजस्थान समेत अन्य 7 राज्यों में देश की 54% अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं। पूरे देश में इस समुदाय के लोगों के साथ जातिगत आधार पर होने वाली आधराधिक घटनाओं के 84% मामले इन 9 राज्यों में होते हैं, ऐसा 2019 में नेशनल क्राइम ब्यूरो द्वारा प्रकाशित सालाना रिपोर्ट बताती है। 

सीबीएसई हिंदी का प्रश्नपत्र

हिंदी के इस गद्य ने किन चार मित्रों द्वारा एक दूसरे को ‘राह दिखाने’ की बात की है? शोषक जातियां आलोचना स्वीकारने वाला एक मित्र है ऐसा कहना न सिर्फ शाब्दिक धोखा है बल्कि जातिवाद को अनदेखा करना है। जातिगत आधार पर होने वाली हिंसा में समुदाय विशेष की महिलाओं के प्रति शोषक जाति द्वारा की गई यौन हिंसा के मामले भी शामिल हैं। इकॉनमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक 66% जेल में बंद कैदी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या पिछड़ी जातियों से हैं। लेख में एक सोलह वर्षीय आदिवासी बच्ची की कस्टीडियल रेप की आपराधिक घटना का ज़िक्र है जिसमें पुलिस द्वारा लड़की को झूठा और ‘सेक्स की आदी’ कहा गया था। जेल शोषित समुदाय की महिलाओं के लिए असुक्षित जगह है क्योंकि जो लोग अलग अलग सरकारी तंत्र में कार्यरत हैं वे जातिवादी मानसिकता के शिकार हैं, ये अक्सर हिंसा का रूप ले लेती है। जब देश में जातिगत पहचान की आधार पर ऐसी घटनाएं हो रही हो वहां जाति व्यवस्था को ‘ग्रामीण संस्कार’ कह देना शर्मसार करने वाली बात है।

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हिंदी के इस गद्य ने किन चार मित्रों द्वारा एक दूसरे को ‘राह दिखाने’ की बात की है? शोषक जातियां आलोचना स्वीकारने वाला एक मित्र है ऐसा कहना न सिर्फ शाब्दिक धोखा है बल्कि जातिवाद को अनदेखा करना है।

इस संदर्भ में मेरी नवादा, बिहार जिले में सीबीएसई के विद्यार्थियों को कई सालों तक सोशल साइंस पढ़ा चुके सुरेश पासवान जी से बात हुई। सुरेश जी कहते हैं, “आप ऑप्शन देखिए, कहा है नगरों में जाति व्यवस्था कमज़ोर होने का क्या प्रभाव पड़ा है। अब बच्चा मानवतावादी करेगा तो कोई नम्बर नहीं मिलेगा। समानतावादी में भी कोई नम्बर नहीं है, आपका जवाब है इसमें गद्य के आधार पर ‘व्यक्तिवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा’, बच्चा नम्बर के लिए टिक मार देगा। ऐसा प्रश्नपत्र एक तरह का सर्वे है कि कितने बच्चे ब्राह्मणवादी व्यवस्था या नैरेटिव को मान लेंगे। नम्बर के लिए मानना ही होगा। आप पूछ रहे हैं कि जाति व्यवस्था का ‘क्या अवगुण नहीं है।’

आगे वह कहते हैं कि यह कैसा सवाल है। ऐसा लग रहा है जानबूझकर ऐसा सवाल सेट किया गया है। इसको थोड़ा इतिहास में देखिए तो शिक्षा का अधिकार किनके पास था, मूलनिवासी जो भारत के थे उनको शिक्षा से दूर रखा गया। शुद्र वे कहलाए जिन्होंने ग़ुलामी मान ली। ‘अछूत’ समुदाय के लोगों ने ग़ुलामी नहीं मानी थी, उन्हें जाति की चार संख्याओं से ही हटा दिया गया।” सुरेश जी ने इस बातचीत में कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे, जैसे शिक्षा व्यवस्था किसके हाथ में है, कौन इसे संचालित करने में सबसे ज़्यादा फैसले ले रहे हैं? उनके सवाल जरूरी सवाल हैं।

अभी तक सीबीएसई ने हिंदी के इस प्रश्नपत्र पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, न ही इसे रद्द किया है। जहां विपक्ष और महिला आयोग ने अंग्रेजी के प्रश्नपत्र पर सवाल किया, वहीं जाति व्यवस्था को लेकर इस गद्य पर कई प्रगतिशील टिप्पणीकारों ने चुप्पी बरती हुई है। महिला हित में बात करनेवालों द्वारा जातिगत पहचान के कारण होनेवाले अपराधों पर चुप्पी समस्याजनक है। 

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मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है। फिलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय से फिलॉसफी में मास्टर्स कर रही हूँ। और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई।  नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है।

साल 2021 में रिज़नल और नेशनल लाड़ली मीडिया अवार्ड मिला।

कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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