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एक ऐसी महिला जिनका दिमाग किसी कंप्यूटर और कैलकुलेटर से कम नहीं था। एक महिला जिसने महज़ तीन साल की उम्र से ही लोगों को प्रभावित करना शुरू कर दिया। हम बात कर रहे हैं शकुंतला देवी की, जिन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर 1982 में अपना नाम ‘द गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकाॅर्ड्स’ में दर्ज करवाया। ‘मानव कंप्यूटर’ के नाम से मशहूर शकुंतला देवी का जन्म 4 नवंबर, 1929 को बैंगलुरु में हुआ था। शकुंतला एक सामान्य परिवार में जन्मी थीं।

शकुंतला के पिता एक सर्कस कंपनी में काम करते थे। जब वह सिर्फ तीन साल की थीं, तब उनके पिता को पता चला कि उनकी बेटी के अंदर संख्याओं को याद रखने की अद्भुत क्षमता है। शकुंतला ने अपने पिता के साथ ताश खेलते हुए कई बार उनको हराया। जब उन्हें अपनी बेटी की प्रतिभा के बारे में पता चला तो उन्होंने सर्कस कंपनी छोड़ दी और शकुंतला देवी को लेकर सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करने शुरू कर दिए और उनकी प्रतिभा को दिखाया। अपने पिता के साथ रोड शो करनेवाली शकुंतला ने जीवन में बहुत संघर्ष किए।

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शंकुलता देवी को ‘मानव कंप्यूटर’ जैसा उपनाम कभी पसंद नहीं आया। उन्होंने कहा मानव मन में कंप्यूटर की तुलना में अतुलनीय रूप से बहुत अधिक क्षमताएं हैं और मानव मन की तुलना कंप्यूटर से करना उचित नहीं है।

छह साल की उम्र में बिना किसी औपचारिक शिक्षा के शकुंतला ने मैसूर विश्वविद्यालय में एक बड़े कार्यक्रम में अपने अंकगणितीय क्षमताओं को साबित किया। जब शकुंतला 15 साल की हुईं तब राष्ट्रीय मीडिया के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उन्हें पहचान मिलने लगी। शकुंतला देवी पहली बार उस समय सुर्खियों में आईं जब बीबीसी रेडियो के एक कार्यक्रम के दौरान उनसे अंकगणित का एक जटिल सवाल पूछा गया और उसका उन्होंने तुरंत जवाब दे दिया। इस घटना की सबसे मजेदार बात यह थी कि शकुंतला ने जो जवाब दिया था वह सही था जबकि रेडियो प्रेजेंटर का जवाब गलत था। 

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वर्ष 1977 में शकुंतला देवी को अमेरिका जाने का मौका मिला। यहां एक यूनिवर्सिटी में उनका मुकाबला आधुनिक तकनीकों से लैस एक कंप्यूटर ‘यूनीवैक’ से हुआ। इस मुकाबले में शकुंतला को 201 अंको की एक संख्या का 23वां वर्गमूल निकालना था। बिना कागज़ कलम के उन्होंने यह सवाल 50 सेकंड में बता दिया। इस घटना के बाद से ही दुनिया भर में शकुंतला देवी को ‘मानव कंप्यूटर’ के नाम से जाना जाने लगा। हालांकि, उन्हें यह उपनाम कभी पसंद नहीं आया। उन्होंने कहा मानव मन में कंप्यूटर की तुलना में अतुलनीय रूप से बहुत अधिक क्षमताएं हैं और मानव मन की तुलना कंप्यूटर से करना उचित नहीं है।

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एक कुशल गणितज्ञ होने के साथ-साथ शकुंतला एक लेखक, ज्योतिष शास्त्र की जानकार और एक सामाजिक कार्यकता भी थीं। उनके काम ने लाखों लोगों को जागरूक किया। उन्होंने समलैंगिकता जैसे मुद्दों पर किताबें लिखीं, उनकी तकलीफों को समझा और दुनिया के सामने लाई। भारत में समलैंगिक समुदाय का अध्ययन करने के साथ ही शकुंतला देवी ने दुनिया भर में समलैंगिकों के अनुभव जानें और दर्ज किए जिसके लिए उनकी आलोचना भी की गई। समलैंगिकता पर शंकुतला ने ‘द वर्ल्ड ऑफ होमोसेक्सुअल्स‘ नामक एक किताब लिखी। उन्होंने ज्योतिष और खाना पकाने पर भी कई किताबें लिखी हैं।

1960 के दशक के मध्य में लंदन में अपने गणितीय हुनर दिखाने के बाद शकुंतला भारत लौट आईं। यहां शकुंतला ने कोलकाता के एक आईएएस अफसर पारितोष बनर्जी के साथ शादी की। उनका वैवाहिक संबंध बहुत दिनों तक नहीं चला और किसी कारणवश वह जल्द ही अपने पति से अलग हो गईं। अपनी किताब ‘द वर्ल्ड ऑफ होमोसेक्सुअल्स’ में शकुंतला देवी लिखती हैं, “अलग होने में कोई अनैतिकता नहीं है। दूसरों को अलग होने की इजाज़त न देना अनैतिकता है। अगर किसी के यौन संबंध समाज के कायदों के मुताबिक नहीं हैं, तो वह अनैतिक नहीं है… बल्कि अनैतिक वे हैं, जो उसे अलग होने के कारण सज़ा देते हैं।”

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भारत में सेक्शन 377 के तहत समलैंगिक संबंधों को साल 2018 में वैध करार दिया गया। अब, जबकि एलजीबीटी+ समुदाय के अधिकारों और संघर्षों की चर्चा आज हमारे रूढ़िवादी समाज में होने लगी है, शकुंतला देवी की किताब भारत में समलैंगिकों की स्थिति पर सबसे अहम शुरुआती दस्तावेज़ मानी जाती है। हालांकि उस समय उनकी किताबों और उनके शब्दों पर बहुत कम ध्यान दिया गया था।

शकुंतला देवी को फिलीपींस विश्वविद्यालय ने साल 1969 में उस साल की विशेष महिला की उपाधि और गोल्ड मेडल प्रदान किया। वर्ष 1988 में उन्हें वाशिंगटन डी.सी. में रामानुजन मैथमेटिकल जीनियस अवार्ड से सम्मानित किया गया। उनकी प्रतिभा को देखते हुए उनका नाम वर्ष 1982 में गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी शामिल किया गया। मौत से एक महीने पहले साल 2013 में शकुंतला देवी को मुंबई में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। उनके 84वें जन्मदिन पर 4 नवम्बर, 2013 को गूगल ने शकुंतला देवी को सम्मान स्वरूप गूगल डूडल समर्पित किया। शकुंतला देवी के जीवन पर 31 जुलाई 2020 को एक फिल्म भी आई थी जिसमें शकुंतला देवी का किरदार विद्या बालन ने निभाया है।

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मेरा नाम सौम्या है। फिलहाल आईआईएमसी से हिंदी पत्रकारिता कर रही हूँ। नारीवाद को ज़मीनी स्तर पर समझने में मेरी हमेशा से रुचि रही है, खासतौर पर भारतीय नारीवाद को। भारतीय समाज में मौजूद रूढ़िवादिता, धर्म, जाति, वर्ग, लैंगिक असमानता को गहराई से समझना चाहती हूँ। एक औरत होने के नाते अपनी आवाज के माध्यम से उनकी आवाज बुलंद करना चाहती हूँ।

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