इंटरसेक्शनलहिंसा जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा को चुनौती देने के लिए ज़रूरी है अपनी तैयारी

जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा को चुनौती देने के लिए ज़रूरी है अपनी तैयारी

आज भी घर के काम की ज़िम्मेदारी के चलते लड़कियों को कई अवसरों से दूर किया जाता है। सुरक्षा के नाम पर हमेशा उनपर नज़र रखी जाती है। ये सब जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा के ही रूप हैं, जिनकी पहचान के बिना हम कभी भी इसे चुनौती नहीं दे सकते हैं।

“दीदी, हम लोग बचपन से ही अपने घर में पापा और भईया के साथ होनेवाले व्यवहार और हम लोगों के साथ होनेवाले व्यवहार में अंतर देखते आए हैं। घर के पुरुषों को कभी भी कहीं भी जाने की आज़ादी होती है। वे अपने मन से कोई भी काम कर सकते हैं, अपनी इच्छा के हिसाब से पढ़ाई करते हैं और उन पर कोई भी रोक-टोक नहीं होती है। वहीं, हम लोगों कि लिए हर जगह पाबंदी होती है। यहां तक कि हम लोगों के सपने पर भी घर वालों की पाबंदी होती है।” देईपुर गाँव की अनामिका ने यह बात किशोरी बैठक में तब रखी जब हम उनके गाँव में जेंडर आधारित भेदभाव को पर चर्चा करने के लिए गए थे।

गाँव में अक्सर जेंडर आधारित भेदभाव और समानता के मुद्दे पर महिलाओं और लड़कियों से चर्चा करने पर ये सवाल आता है कि आख़िर हम अपने घर में कैसे जेंडर आधारित भेदभाव पर रोक लगाए, क्योंकि ये सालों से ऐसा ही होते आ रहा है, जिसे बदलना आज भी एक चुनौती है। अक्सर घर की महिलाएं ही उन नियमों का पालन करने के लिए लड़कियों पर दबाव बनाती हैं।

सामुदायिक स्तर पर काम करते हुए मैंने कई अलग-अलग ट्रेनिंग में हिस्सा लिया, कई फ़िल्में देखीं और कई कार्यक्रमों का हिस्सा भी रही। अपने अनुभवों के आधार पर अब मैं जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा पर रोक लगाने के लिए कुछ ऐसे ज़रूरी बातें समझ गई हूं, जिनके बारे में मैं अक्सर गाँव की महिलाओं और किशोरियों से चर्चा करती हूं। साथ ही उन्हें बताती हूं कि कैसे वे इन बातों को अपनी ज़िंदगी में लागू करें। तो आइए चर्चा करते हैं जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा को चुनौती देने के लिए उन बिंदुओं पर जो बेहद इनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए ज़रूरी हैं।

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जेंडर आधारित हिंसा और भेदभाव की पहचान करना 

कई बार सामुदायिक स्तर पर काम करते हुए मैंने यह महसूस किया है कि हमारे समाज में महिलाओं का एक बड़ा तबका है जिन्हें अक्सर अपने घरों में होनेवाले जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा की पहचान नहीं होती है। जैसे एक बार खरगूपुर गाँव में किशोरियों के साथ बैठक के दौरान बीए फ़ाइनल में पढ़ने वाली प्रिया ने बताया कि उसके घर में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होता है। उसे भी अपने भाइयों की तरह ही पढ़ने की और कहीं आने-जाने की छूट है। प्रिया की इस बात पर जब हमने यह सवाल किया कि अगर शिक्षा को लेकर उसके घर में कोई भेदभाव नहीं है तो फिर वह भी अपने भाई की तरह बाहर पढ़ने क्यों नहीं गई तो उसने ज़वाब दिया कि घर में मम्मी को काम में दिक़्क़त होती।

फिर मैंने सवाल किया कि क्या वह कहीं भी अकेले जा सकती है? तो उसने ज़वाब दिया कि नहीं, घरवाले भाई के साथ हमें कहीं भी जाने की आज़ादी देते हैं। प्रिया के इस ज़वाब के बाद हम लोगों ने चर्चा की कि किस तरह आज भी घर के काम की ज़िम्मेदारी के चलते लड़कियों को कई अवसरों से दूर किया जाता है। सुरक्षा के नाम पर हमेशा उनपर नज़र रखी जाती है। ये सब जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा के ही रूप हैं, जिनकी पहचान के बिना हम कभी भी इसे चुनौती नहीं दे सकते हैं।

और पढ़ें: महिला हिंसा के वे रूप जो हमें दिखाई नहीं पड़ते

जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा अलग-अलग रूपों में हमारी की ज़िंदगी और समाज में शामिल है। यह हमारे घर लेकर पूरे समाज में महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा को पोसने और बढ़ावा देने का काम करती है। इसे चुनौती देना और दूर करना एक लंबी सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया है।

महिलाओं की शिक्षा और जागरूकता 

जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा समाज में सदियों से चला आ रहा है, जिसकी जड़ें जितनी पुरानी हैं उतनी ही मज़बूत भी। इसलिए इसे चुनौती देने के लिए हमें भी अपनी जानकारी और तैयारी मज़बूत रखनी होती। इसके लिए शिक्षा और जागरूकता एक मज़बूत साधन है। बिना शिक्षा और जागरूकता के महिलाएं कभी भी अपने साथ होनेवाली हिंसा और भेदभाव के रूप को पहचान नहीं सकती हैं।

वास्तविकता यही है कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं में पढ़ाई का स्तर पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम है, जहां शिक्षा है भी तो वह बहुत सतही ही है। सरल भाषा में कहें तो कई बार महिलाओं की शिक्षा सिर्फ़ काग़ज़ तक ही सीमित रह जाती है पर उनके व्यवहार और विचार तक नहीं पहुंच पाती है। इसलिए ज़रूरी है कि महिलाओं की शिक्षा और जागरूकता का स्तर और बेहतर हो।

महिला संगठन और नेतृत्व को बढ़ावा

कई बार शिक्षित और जागरूक महिलाएं भी किसी भी सामाजिक बदलाव की तरफ़ कोई पहल नहीं कर पाती हैं। चूंकि बचपन से ही उनके लालन-पालन में उन्हें आगे बढ़कर किसी भी व्यवस्था पर सवाल करने या चुनौती देने के लिए तैयार नहीं किया जाता है। ऐसे में जब महिलाएं संगठित होती हैं तो यह उन्हें मानसिक और सामाजिक रूप से एक मज़बूती देने लगता है। धीरे-धीरे उनकी नेतृत्व क्षमता का भी विकास होता है।

यहां बता दूं कि नेतृत्व का मतलब चुनावी-राजनीति से नहीं बल्कि पहल करने है। पहल जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा की पहचान करने और उसे चुनौती देने की। सामुदायिक स्तर पर संगठन से जुड़ाव महिलाओं और किशोरियों को एकजुट होने, अपनी समझ बढ़ाने और अपनी बातों को कहने का एक मंच देता है। जहां वे अपनी बातें कह पाती हैं। ये सभी महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए ज़रूरी अंग हैं।

जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा अलग-अलग रूपों में हमारी की ज़िंदगी और समाज में शामिल है। यह हमारे घर लेकर पूरे समाज में महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा को पोसने और बढ़ावा देने का काम करती है। इसे चुनौती देना और दूर करना एक लंबी सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया है, जिसके लिए हमलोगों को ज़मीनी स्तर पर काम करने और खुद को तैयार करने की ज़रूरत है।  

और पढ़ें: घरेलू हिंसा के बावजूद महिलाओं को उसी रिश्ते में क्यों रहना पड़ता है?


तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

About the author(s)

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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