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हाल ही में जारी नैशनल फैमिली हेल्थ सर्व की रिपोर्ट के मुताबिक 30 फ़ीसदी से अधिक महिलाएं पति द्वारा कुछ परिस्थितियों में अपनी पत्नी को पीटना सही मानती हैं। हालांकि यह पहली रिपोर्ट नहीं है जहां घरेलू हिंसा को समाज द्वारा जायज़ ठहराया गया है। घरेलू हिंसा हमारे समाज में महिलाओं के ख़िलाफ़ होनेवाला सबसे आम अपराध है। तमाम आंकड़े और रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करते हैं कि बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू हिंसा का सामना करती हैं। घरेलू हिंसा में महिला पर हिंसा करनेवाले उसके सगे-संबंधी, पति और परिवारवाले ही होते हैं। हिंसा के बावजूद भी कई महिलाएं उसी अपमानजनक रिश्ते में बनी रहती हैं।

बड़ी संख्या में हमारे समाज में शादीशुदा महिलाओं को उनके ससुराल पक्ष द्वारा शारीरिक, मानसिक व अन्य तरह से उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। बावजूद इन सबके महिलाएं हिंसा के रिश्ते में अपना पूरा जीवन बिता देती हैं। पितृसत्तात्मक समाज की कुरीतियों को बचपन से सहन करती महिला के भीतर यह बात स्थापित कर दी जाती है कि उनके साथ होने वाला बुरा बर्ताव भी उन्हें सहना ही है। पितृसत्ता की दी हुई सीख के कारण देश में महिलाएं अपने हक और अधिकारों से अनजान हैं। कितनी ही महिलाएं अधिकारों के बारे में पता होने के बावजूद भी रिश्ते और पंरपराओं के नाम पर अपने हक के लिए नहीं लड़ती हैं। परिवार की तथाकथित इज्ज़त के नाम पर वे चुप रहकर सहना चुनती हैं। परिवार के झूठे सम्मान के लिए, अपने रिश्तों को बचाने के लिए वे अपमानजनक व्यवहार, हिंसा को सहती रहती हैं और उनका विरोध नहीं करती हैं।  

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करीबी लोगों का खुद से दूर और खिलाफ होने का भय

पितृसत्तात्मक समाज की बनाई नीतियों के अनुसार परिवार और रिश्ते महिला की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। हर स्थिति में एक महिला को अपने रिश्ते निभाना आना चाहिए। केवल अपने पितृसत्तात्मक रिश्तों को बचाने की खातिर एक महिला हिंसा का सामना करती रहती है। हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाने पर सबसे पहले उसे अपने रिश्तों और परिवार के सदस्यों से ही विरोध का सामना करना पड़ता है। इसी डर की वजह से कई महिलाएं नहीं चाहती कि उनके विरोध करने से उनके करीबी परिवारजन उनके खिलाफ हो जाए।

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रिश्तों और पितृसत्तात्मक समाज की पंरपराओं की सीख के कारण महिला पर हमेशा दबाव रहता हैं कि उनके करीबी हमेशा उनके साथ रहे। अन्याय के खिलाफ परिवार और करीबियों के सामने बात रखने पर सबसे पहले उसके अपने ही उसे समझौता करने के लिए कहते हैं। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को हमेशा से ही यही सिखाया जाता है कि परिवार और रिश्ते ही उसका अस्तित्व होते हैं। महिलाओं को अपने यही रिश्ते बचाने के लिए बहुत कुछ सहना पड़ता है। यही सीख हमें मिलती है कि यदि हम सहेंगे नहीं तो हमारे रिश्ते चलेंगे नहीं। इस तरह की मानसिकता और मजबूरी के कारण महिलाएं आज भी घरेलू हिंसा को नज़रअंदाज़ कर, चुप रहना चुनती हैं।

पितृसत्तात्मक समाज की बनाई नीतियों के अनुसार परिवार और रिश्ते महिला की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। हर स्थिति में एक महिला को अपने रिश्ते निभाना आना चाहिए। केवल अपने पितृसत्तात्मक रिश्तों को बचाने की खातिर एक महिला हिंसा का सामना करती रहती है।

स्वयं को कमतर समझना  

आज भी लगातार घरेलू हिंसा का सामना करती महिलाओं को यह लगता है कि वे कमजोर हैं। महिलाओं का स्वयं के लिए यह सोचना, खुद को कमज़ोर समझना घरेलू हिंसा के मामले में हो रही बढ़ोत्तरी का एक बड़ा और महत्वपूर्ण कारण है। महिलाओं मे यह सोच स्थापित कर दी जाती है कि वे पुरुषों से कमजोर हैं। पुरुष के शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक बल का वे सामना नहीं कर सकती हैं, उनके बिना उनका जीवन नहीं चल सकता है। पुरुष की हिंसा के बदले महिला का चुप रहना ही बेहतर है, यही दोहराता है हमारा पितृसत्तात्मक समाज।

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हिंसा के विरुद्ध मौजूद कानूनों की जानकारी न होना

हमारे देश में केवल 70% महिलाएं शिक्षित हैं और 30% महिलाएं अभी भी अशिक्षित हैं। शिक्षा के अभाव के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं अपने अधिकारों से अपरिचित हैं। दूसरी ओर शिक्षित वर्ग की महिलाएं भी पितृसत्ता के नियमों के कारण अपने अधिकारों के प्रयोग करने से कतराती हैं। अशिक्षा और पितृसत्तात्मक पंरपराओं की वजह से महिलाएं अपने अधिकारों से अंजान हैं। घरेलू हिंसा के विरुद्ध हमारे देश में घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 मौजूद है। इस अधिनियम के तहत महिलाएं अपने ऊपर हो रही हिंसा के विरुद्ध खुलकर आवाज़ उठा सकती हैं।

पारिवारिक और सामाजिक दबाव के कारण 

“शादी के रिश्ते में थोड़ी खटपट तो चलती है, जहां चार आदमी हैं वहां तो बात होती है, तुम लड़की हो तुम्हें ही सब संभालना है, पति के नखरे सहना पत्नी का कर्तव्य है,” ये सब बातें एक महिला को जब सुनने को मिलती है जब वह अपने खिलाफ़ होने वाली किसी भी तरह की हिंसा के बारे में बात करती है। हिंसा के खिलाफ बात करने पर महिला को इस तरह की बातें कहकर उसे चुप रहने को कहा जाता है। पारिवारिक और सामाजिक दबाव के कारण महिला अक्सर अपने खिलाफ होने वाली हिंसा के विरूद्ध अपनी आवाज नहीं उठाती है। परिवार और समाज के बनाए इज्ज़त के खोखले नियम के आगे वह चुप रहना चुन लेती है। कई परिस्थितियों में महिला स्वयं में मजबूत होने के बावजूद भी हिंसा सहना चुनती है।

“शादी के रिश्ते में थोड़ी खटपट तो चलती है, जहां चार आदमी हैं वहां तो बात होती है, तुम लड़की हो तुम्हें ही सब संभालना है, पति के नखरे सहना पत्नी का कर्तव्य है,” ये सब बातें एक महिला को जब सुनने को मिलती है जब वह अपने खिलाफ़ होने वाली किसी भी तरह की हिंसा के बारे में बात करती है।

परिवार की इज्ज़त को महिला की आवाज़ से जोड़कर उसपर चुप रहने का दबाव बनाया जाता है। कानूनी सलाह व अधिकारों से परिचित होने के बाद भी महिला को समझौता करने के लिए कहा जाता है। ‘परिवार बीच में साथ छोड़ देगा, अकेली कैसे रहोगी’ जैसे डर महिला के मन में बैठा दिए जाते हैं। भारतीय पितृसत्तात्मक समाज की एक धारणा यह है पुरुष महिला पर किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार करता है, उस पर हिंसा करता है तो वह गलत नहीं है। यदि कोई महिला उसका विरोध करती है और उसके खिलाफ़ अपनी आवाज उठाती है तो वह गलत है। इस तरह के सामाजिक पहरों के कारण महिला अपनी आवाज उठाने से भी कतराती है।  

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आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होना

भारतीय समाज पुरुष प्रधान है, जहां घर से बाहर जाकर कमाने की जिम्मेदारी उसके ऊपर होती है। महिलाओं को घर में रहकर काम करने तक सीमित रखा जाता है। यही कारण है कि महिलाओं को हमेशा ही किसी ना किसी के ऊपर आर्थिक रूप से निर्भर रहना पड़ता है। शादी से पहले अपने माता-पिता और शादी के बाद अपने पति पर। समाज में आज भी खासतौर पर शादी के बाद महिलाओं को बाहर निकल कर काम करने की मनाही है जिससे उन्हें अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने पति पर निर्भर रहना पड़ता है। पति पर आर्थिक रूप से निर्भर होने के कारण भी घरेलू हिंसा बढ़ती है। अपने हक के लिए, अपने ऊपर हो रही हिंसा का विरोध करने के लिए आगे नहीं बढ़ पाती। आर्थिक रूप से खुद को कमजोर समझने के कारण ही महिलाएं अपने अधिकारों का उपयोग भी नहीं कर पाती है।

परंतु ऐसा नहीं है, यदि महिलाएं चाहे तो वह भी अपनी आवाज बुलंद कर पुरुषों का विरोध कर सकती हैं। अपने अधिकारों के द्वारा उन्हें सजा दिलवा सकती हैं। इसके लिए उन्हें ज़रूरत होती है परिवार के साथ, सही कानून व्यवस्था और मदद की। हमेशा महिलाओं को इस बात का डर रहता है कि वे अकेली हैं, न उनके परिवारवाले उनके साथ हैं ना उनके रिश्तेदार। शायद यह सच ही है जिसके कारण वह कभी भी उन पर हो रही हिंसा का विरोध नहीं कर पाती और ये पितृसत्ता उनकी आवाज़ को दबाती चली जाती है।

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तस्वीर साभारः Northeast Now

मेरा नाम नाज़ परवीन है। मैं बीए ऑनर्स की द्वितीय वर्ष की छात्रा हूं। मुझे लिखना पढ़ना और नयी-नयी चीजें सीखना बहुत पसंद है। मुझे रिपोर्टिंग करना भी बेहद पसंद है।

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