जानें, ट्रांस ऐक्ट के प्रावधान और इसके विरोध की वजहें
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ट्रांस समुदाय हमारे समाज का एक ऐसा वर्ग है जो दुर्व्यवहार, शोषण और निर्वासन के अधीन है। ट्रांस समुदाय हमारे समाज की गंभीर रूप से हाशिए पर रहनेवाली इकाइयों का प्रतिनिधित्व करते हैं। समुदाय के अधिकतर लोग अत्यधिक हिंसा, यातना और गरीबी से जूझते रहते हैं। इसमें मौखिक, शारीरिक और यौन शोषण और हिंसा शामिल हैं।  लेकिन यह सिर्फ इन्हीं तक सीमित नहीं हैं; गैरकानूनी कैद; शैक्षिक और व्यावसायिक संस्थानों में प्रवेश और सेवाओं से इनकार; संपत्ति के उत्तराधिकार में हिस्सा देने से इनकार; शैक्षिक, पेशेवर, स्वास्थ्य देखभाल, और पारिवारिक सेटिंग में उत्पीड़न आदि से जुड़ी चुनौतियां और संघर्ष इनके जीवन का हिस्सा हैं। साल 2019 से पहले तक भारत में कोई भी ऐसा कानून मौजूद नहीं था जो ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों पर बात करता हो। 2019 में केंद्र सरकार ने एक अधिनियम पारित करके ट्रांसजेंडर लोगों को समाज में अधिकार देने की एक पहल की।

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019, ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए अधिनियमित किया गया था। इस अधिनियम के तहत, एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसका जेंडर जन्म के समय उस व्यक्ति को दिए गए जेंडर से मेल नहीं खाता है और इसमें ट्रांस-मेन या ट्रांस-वुमन, इंटरसेक्स, जेंडरक्वीयर,  और किन्नर, हिजड़ा, अरवानी और जोगटा जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति शामिल हैं। ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान को मान्यता देता है और साथ ही अन्य बातों के साथ-साथ शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य देखभाल, संपत्ति रखने या निपटाने के क्षेत्र में भेदभाव को रोकता है और सार्वजनिक या निजी कार्यालय और सार्वजनिक सेवाओं और लाभों तक उनकी पहुंच और उपयोग को प्राथमिकता देता है।

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ट्रांसजेंडर अधिनियम 2019 कैसे अस्तित्व में आया

साल 2014 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने, नालसा बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया के मामले में, ‘ट्रांसजेंडर’ को ‘तीसरे जेंडर’ के रूप में मान्यता देकर और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव के निषेध और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए कई पैमाने निर्धारित करके भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की नींव की स्थापना की। इस फ़ैसले ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की सिफारिश की और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार को बिना सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी के अपनी स्वयं की कथित जेंडर पहचान घोषित करने का अधिकार दिया।

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उसी साल  भारतीय संसद में एक निजी सदस्य विधेयक (प्राइवेट मेंबर बिल) पेश किया गया, जिसे बाद में संसद के ऊपरी सदन ने पारित किया। हालांकि, जबकि निजी सदस्य का बिल अभी भी लंबित था, साल 2016 में भारत सरकार ने बिल के अपने संस्करण का ड्राफ्ट तैयार किया और संसद में पेश किया, जिसे आगे के सुझावों के लिए संसद की एक स्थायी समिति को भेजा गया था। समिति के सुझावों के आधार पर साल  2018 में बिल का एक नया संस्करण पेश किया गया था। हालांकि, 2018 में संसद के विघटन और 2019 में नयी केंद्र सरकार के गठन के साथ, बिल को 2019 में संसद में फिर से पेश किया गया और आखिर में एक कानून के रूप में अधिनियमित किया गया।

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ट्रांस ऐक्ट के प्रावधान

ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषाः इस अधिनियम के अनुसार ट्रांसजेंडर व्यक्ति वह व्यक्ति है जिसका जेंडर जन्म के समय नियत जेंडर से मेल नहीं खाता है। इसमें ट्रांसमेन और ट्रांस-विमेन , इंटरसेक्स और जेंडर क्वीर आते हैं। इसमें सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति, जैसे किन्नर, हिजड़ा, भी शामिल हैं। 

भेदभाव पर प्रतिबंध: यह अधिनियम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से भेदभाव पर प्रतिबंध लगाता है जिसमें निम्नलिखित के संबंध में सेवा प्रदान करने से इनकार करना या अनुचित व्यवहार करना शामिल हैः (i) शिक्षा, (ii) रोजगार, (iii) स्वास्थ्य सेवा, (iv) सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध उत्पादों, सुविधाओं और अवसरों तक पहुंच और उसका उपभोग, (v) कहीं आने-जाने (मूवमेंट) का अधिकार (vi) किसी प्रॉपर्टी में निवास करने, उसे किराये पर लेने, स्वामित्व हासिल करने या अन्यथा उसे कब्जे में लेने का अधिकार, (vii) सार्वजनिक या निजी पद को ग्रहण करने का अवसर, और (viii) किसी सरकारी या निजी प्रतिष्ठान तक पहुंच जिसकी देखभाल या निगरानी किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति द्वारा की जाती है।

निवास का अधिकार: हर ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपने परिवार में रहने और उसमें शामिल होने का अधिकार है। अगर किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति का परिवार उसकी देखभाल नहीं कर सकता है तो उस व्यक्ति को न्यायालय के आदेश के बाद पुनर्वास केंद्र में भेजा जा सकता है।

रोज़गार: कोई सरकारी या निजी संस्था रोज़गार से जुड़े मामलों, जैसे भर्ती, पदोन्नति इत्यादि, में किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति से भेदभाव नहीं कर सकती।

शिक्षा: सरकार द्वारा वित्त पोषित या मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थान भेदभाव किए बिना ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को समावेशी शिक्षा, खेल एवं मनोरंजन की सुविधाएं प्रदान करेंगे।

स्वास्थ्य सेवा: सरकार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए कदम उठाएगी जिसमें अलग एचआईवी सर्विलेंस सेंटर, सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी इत्यादि शामिल है। सरकार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्वास्थ्य से जुड़े मामलों को संबोधित करने के लिए चिकित्सा पाठ्यक्रम की समीक्षा करेगी और उन्हें समग्र चिकित्सा बीमा योजनाएं प्रदान करेगी।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की आइडेंटिटी से जुड़ा सर्टिफिकेट: एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति जिला मेजिस्ट्रेट को आवेदन कर सकता है कि ट्रांसजेंडर के रूप में उसकी आइडेंटिटी से जुड़ा सर्टिफिकेट जारी किया जाए। संशोधित सर्टिफिकेट तभी हासिल किया जा सकता है, अगर उस व्यक्ति ने पुरुष या महिला के तौर पर अपना जेंडर परिवर्तन करने के लिए सर्जरी कराई है।

सरकार द्वारा किए गए कल्याणकारी उपाय: संबंधित सरकार समाज में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के पूर्ण समावेश और भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगी। वह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के बचाव (रेस्क्यू) एवं पुनर्वास तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण एवं स्वरोजगार के लिए कदम उठाएगी, ट्रांसजेंडर संवेदी योजनाओं का सृजन करेगी और सांस्कृतिक क्रियाकलापों में उनकी भागीदारी को बढ़ावा देगी।

अपराध और दंड: अधिनियम निम्नलिखित को अपराध के रूप में मान्य करता है: (i) ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से भीख मंगवाना, बलपूर्वक या बंधुआ मज़दूरी करवाना (इसमें सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अनिवार्य सरकारी सेवा शामिल नहीं है), (ii) उन्हें सार्वजनिक स्थान का प्रयोग करने से रोकना, (iii) उन्हें परिवार, गांव इत्यादि में निवास करने से रोकना, और (iv) उनका शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक उत्पीड़न करना। इन अपराधों के लिए सजा छह महीने और दो वर्ष के बीच की है और जुर्माना भी भरना पड़ सकता है।

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ऐक्ट की आलोचना और विरोध

इस ऐक्ट के आने से पहले इस के बिल के खिलाफ काफी विरोध हुआ था। इंडियास्पेंड में छपी रिपोर्ट के मुताबिक  जेंडर-अधिकार कार्यकर्ता हरीश अय्यर ने कहा है कि ट्रांसजेंडर बिल रिग्रेसिव और आधे-अधूरे हैं। ट्रांस समुदाय का इस ऐक्ट के पीछे विरोध करने का एक और कारण यह है कि ये लोग ट्रांस लोगों को ‘अर्धनारीश्वर’ की तरह देखते हैं। चेन्नई की एक ट्रांसजेंडर-अधिकार कार्यकर्ता ग्रेस बानु ने इंडियास्पेंड को बताया, “जब हम एक संसदीय समिति के सामने पेश हुए, तो अज्ञानता (इग्नोरेंस) का स्तर बहुत अधिक था। एक ने मुझसे पूछा कि क्या मेरे पास एक जेंडर है।” ग्रेस के अनुसार- बीजेपी के सांसदों के लिए वे केवल अर्धनारीश्वर हैं और वे उसी रूप के बारे में बात करते रहे।

ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ बलात्कार होने पर सिर्फ छह महीने से दो साल तक की सजा का प्रावधान है, जबकि एक महिला के साथ बलात्कार की सजा आजीवन कारावास तक की है। यहां तक कि उनके जीवन को खतरे में डालने पर अधिकतम दो साल की जेल की ही सजा है। ट्रांस समुदाय के अनुसार उनके खिलाफ होने वाले अपराधों को ‘छोटा’ माना गया है।

ट्रांस कम्युनिटी ने सरकार से बिल में लगभग सौ बदलाव करने को कहा था लेकिन सरकार ने उसमें 27 ही बदलाव किए और उसे जल्दबाजी में पारित कर दिया। ट्रांस कम्युनिटी ने इसे रिग्रेसिव इसीलिए कहा क्योंकि यह बिल खुद सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले के प्रतिरूप में नहीं है। इस ऐक्ट की आलोचना के कुछ मुख्य कारण यह भी हैं –    

  • 2016 के बिल में ट्रांसजेंडर कौन था और कौन नहीं था, यह तय करने के लिए ‘स्क्रीनिंग समितियों’ का प्रस्ताव था। ट्रांस समुदाय ने इस समिति का भी विरोध किया। जिसे बाद के ऐक्ट में से हटा दिया गया था। बैंगलोर के एक छात्र ने योरस्टोरी को बताया, “हमारे जेंडर की जांच करके और हमें प्रमाणपत्र देना अमानवीय है। यह हमारे लिए हमारा बिल नहीं है, यह उनके द्वारा हमारे खिलाफ़ बिल है।”
  • यह ऐक्ट किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को स्वयं की लैंगिक पहचान निर्धारित करने का अधिकार नहीं देता है, केवल प्रमाण-पत्र के आधार पर किसी व्यक्ति के ‘ट्रांसजेंडर’ के रूप में पहचानने की अनुमति देता है। इसके लिए उन्हें सेक्स-रीअसाइनमेंट सर्जरी से गुजर कर प्रमाण-पत्र के लिए आवेदन करना होता है। कवि के अनुसार ट्रांस पुरुष उन महिलाओं के रूप में पैदा होते हैं जो पुरुष बनना चाहते हैं, और सेक्स-रीअसाइनमेंट सर्जरी अधिक कठिन है।
  • यदि कोई ट्रांस पुरुष या महिला के रूप में जेंडर बदलने के लिए सर्जरी करवाता है, तो उस व्यक्ति को ‘संशोधित प्रमाण पत्र’ के लिए जिला मजिस्ट्रेट को आवेदन करना होगा।
  • यह ऐक्ट नालसा बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में कहा था कि ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स व्यक्तियों को बिना मेडिकल हस्तक्षेप के अपने जेंडर की पहचान करने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने कहा था कि ‘प्रत्येक व्यक्ति की स्व-परिभाषित यौन अभिविन्यास और जेंडर पहचान उनके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग है और यह आत्मनिर्णय, गरिमा और स्वतंत्रता के सबसे बुनियादी पहलुओं में से एक है।’
  • यह ऐक्ट ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए शिक्षा और रोज़गार में आरक्षण पर मौन है।
  • ट्रांस कम्युनिटी के अनुसार इंटरसेक्स समुदाय को ट्रांसजेंडर्स की परिभाषा में शामिल करना अनुचित है, क्योंकि सभी इंटरसेक्स लोग खुद को ट्रांस-लोगों के रूप में नहीं पहचानते हैं। यह सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के भी खिलाफ़ है, जिसने स्वयं को पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर के रूप में पहचान करने के अधिकार को मान्यता दी है। यह इंटरसेक्स व्यक्तियों को ‘ट्रांसजेंडर’ के रूप में लैंगिक पहचान प्राप्त करने के लिए मजबूर करेगा।
  • ट्रांस चाइल्ड’ के निवास स्थान के निर्धारण (जैविक परिवार या सामुदायिक परिवार के साथ) में अदालत के आदेश की आवश्यकता होगी, यह मानव अधिकार का उल्लंघन है।
  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ बलात्कार होने पर सिर्फ छह महीने से दो साल तक की सजा का प्रावधान है, जबकि एक महिला के साथ बलात्कार की सजा आजीवन कारावास तक की है। यहां तक कि उनके जीवन को खतरे में डालने पर अधिकतम दो साल की जेल की ही सजा है। ट्रांस समुदाय के अनुसार उनके खिलाफ होने वाले अपराधों को ‘छोटा’ माना गया है।

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तस्वीर साभार: Business Standard

स्रोत: IndiaSpend

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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