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साल 2014 के नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी (NALSA) वर्सेज़ यूनियन ऑफ इंडिया के ऐतिहासिक निर्णय में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह पूरी तरह से व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में आता है कि वह अपने आप को किस लैंगिक पहचान से जोड़े। साथ ही, इसमें कहा गया कि ट्रांस समुदाय के लोगों को अन्य लैंगिक पहचानों की तरह उन्हें भी सभी मूल अधिकार, बिना किसी भेदभाव के प्राप्त होने चाहिए। एक लंबी लड़ाई और सालों के शोषण के बाद, भारतीय संसद द्वारा साल 2019 में ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल पास किया गया, जो मूल रूप उन्हें जन्म के समय निर्धारित लैंगिक पहचान के बरक्स निजी अनूभूति से निर्धारित पहचान को लेकर चलने का अवसर देता है। साथ ही रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य सुविधाओं में किसी किस्म के भेदभाव को निषेध ठहराता है। यह तो रही कानून की बात, जबकि असलियत में आज भी ट्रांस समुदाय के लोग सामाजिक उपेक्षा और शोषण झेलते हैं। भेदभाव की प्रक्रिया केवल समाज में ही नहीं, बल्कि कानून द्वारा नियंत्रित संस्थाओं में भी देखने को मिलती है।

हाल ही में ‘द वायर’ में छपे एक रिपोर्ताज़ में किरण नाम की ट्रांस महिला के साथ जेल में हुए बलात्कार और हिंसा की घटनाओं का ज़िक्र है। जहां वह बताती हैं कि पांच ट्रांस महिलाओं को दो हज़ार पुरुष कैदियों के साथ रखा गया और वहां किसी भी किस्म के प्रतिरोध का मतलब है ब्लात्कार। किरण अपनी डायरी में जेल के कई कैदियों, स्टाफ़, जिनमें से सभी सिसजेंडर पुरुष हैं, उन पर छेड़छाड़ और यौन शोषण का आरोप लगाती हैं। इस प्रकार, हम देखते हैं कि भले ही संसद और सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांस समुदाय के मामलों में सुधारवादी सहयोग दिए हो, धरातल पर स्थितियां अभी भी बहुत गंभीर हैं। आज भी समाज के एक बड़े भाग में सिसजेंडर पहचान से अलग लैंगिक अनुभूतियों को लेकर उपयुक्त संवेदनशीलता का अभाव है। एक बार को अगर धर्म, जाति, भाषा, रंग, स्त्रीभेद के मसले से जूझते मुख्यधारा को छोड़ भी दें तो अकादमिक जगत और पढ़ने-लिखने वाले वर्ग में भी ट्रांस समुदाय को लेकर पूरी तरह से समावेशी समझ नहीं बन पाई है। हालांकि, इस दिशा में कई बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। ट्रांस समुदाय के लोग इतनी कठिनाइयों के बीच भी अपने रास्ते बना रहे हैं, उन्हीं में से एक हैं ट्रांसजेंडर इंडिया डॉट कॉम की संस्थापिका नेसारा। आइए जानते हैं उनके बारे में।

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बताते चलें कि नेसारा भारत की पहली ट्रांस महिला हैं जिन्हें मार्च 2020 में वाशिंगटन डीसी में स्थित जॉन एफ केनेडी सेंटर फ़ॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स के प्रतिष्ठित हॉल ऑफ़ नेशन्स में शामिल किया गया है। इस दौरान नेसारा का एक उत्कृष्ट चित्र प्रदर्शनी के लिए रखा गया। इस कार्यक्रम की थीम ‘विटल वॉइसेस: 100 वीमेन यूजिंग दियर पॉवर टू एम्पॉवर’ रखी गई थी। बताते चलें कि इस श्रेणी में नेसारा दुनिया भर के अलग-अलग क्षेत्रों में बेहतरीन काम कर रही महिलाओं जैसे मलाला यूसुफ़जई, ग्रेटा थनबर्ग, सेरेना विलियम्स इत्यादि के साथ दर्शायी गईं थीं। वाइटल वॉइसेस यानि महत्वपूर्ण आवाज़ें दरअसल एक वैश्विक आंदोलन है, जो उन महिलाओं की उपलब्धियों को दिखाता है, जिन्होंने बनी-बनाई व्यवस्था में बदलाव लाने में योगदान दिया है। नेसारा को यह सम्मान उनके पोर्टल ट्रांसजेंडर डॉट कॉम के लिए दिया गया है जिसके माध्यम से वे देश भर में ट्रांस समुदाय को उनके अधिकारों से अवगत कराती हैं और यौनिक हिंसा और शोषण, साथ ही श्रम तस्करी से संरक्षित करती हैं।

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नेसारा का शुरुआती जीवन आसान नहीं रहा। वह एक पुरुष के रूप में पैदा हुई थीं। 15 साल की उम्र में उनकी मां का देहांत हो गया था। वह कहती हैं कि जेंडर डायस्फोरिया की उनकी कहानी अन्य लोगों के मुक़ाबले बेहद अलग रही क्योंकि 4 से 14 साल की उम्र तक करीबी रिश्तेदार लगातार यौन हिंसा करते रहे। इस घटना का उनकी मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ा जिसने उनके मानसिक-यौन विकास को नकारात्मक ढंग से प्रभावित किया। जब वह अपने परिवार के सामने अपनी जेंडर संबंधी अनूभूति और यौन शोषण को लेकर आईं, उनका परिवार अचंभित हुआ और उन्हें साधुओं और मनोचिकित्सकों के पास ले जाया गया। उनकी बहनों और उनके पतियों ने उन्हें समझा कि वह ‘हिजड़ा’ बनना चाहती हैं। जेंडर अफर्मिंग सर्जरी के बाद अब वह अपने आप को एक ट्रांस महिला के रूप में देखती हैं। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। शुरुआत में उनकी पहचान के कारण अनेक संस्थानों ने नौकरी नहीं दी। इस भेदभाव से तंग आकर उन्होंने हस्तशिल्प का काम शुरू किया और बाद में एक अन्य ट्रांस महिला के साथ मिलकर ट्रांसजेंडर इंडिया की शुरुआत की।

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ट्रांसजेंडर को ‘हिज़ड़ा’ शब्द से पहचानना अपमानजनक

न्यूज़मिनट की एक रिपोर्ट के अनुसार नेसारा को इस बात से बहुत आपत्ति है कि समाज किसी भी ट्रांसजेंडर को ‘हिजड़ा’ समझ लेता है। वह कहती हैं कि एक ट्रांस महिला के लिए हिजड़ा शब्द का इस्तेमाल करना उसी तरह से आपत्तिजनक है, जितना कि एक गे पुरुष को ‘हिजड़ा’ कहना। वास्तव में, जेंडर वह है जो हमारे दिमाग़ में होता है और मन-मस्तिष्क में जो है, उसी से हमारी पहचान की निर्मिति होती है।” वह कहती हैं कि ट्रांस समुदाय को एक पढ़े-लिखे जागरूक रोलमॉडल की ज़रूरत है, जिससे समाज द्वारा बनी-बनाई रूढ़िवादी छवि जिसमें उन्हें सेक्सवर्क में शामिल और सड़क पर भीख मांगते समुदाय के रूप में दर्शाया जाता था, उसे तोड़कर सामान्य जीवन जीने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सके। वह यह भी कहती हैं कि हालिया दौर में मौजूद एक्टिविस्ट्स ट्रांस समूह को असली अर्थ में समाज के सामने में विफ़ल रहे हैं। यही कारण है कि ट्रांस समूह की सामाजिक मौजूदगी जो कि सेक्स वर्क और भीख मांगने के रूप में सीमित दिखती है। वे बताती हैं कि ट्रांसजेंडर एक बड़ा समूह है जिसमें ट्रांससेक्सुअल, इंटरसेक्स, क्रॉसड्रेसर वे लोग जो अपनी यौनिक अभिव्यक्ति के लिए विपरीत लिंग की तरह कपड़े पहनते हैं) आते हैं।

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ट्रांसजेंडर इंडिया डॉट कॉम

ट्रांसजेंडर इंडिया भारत की पहली ट्रांस वेबसाइट है जो ट्रांस समुदाय और इंटरसेक्स लोगों के अधिकारों की जानकारी देने, समाज में उनके ख़िलाफ़ होने वाले शोषण और अपमान से निज़ात दिलाने और परिवार और समाज में स्वीकार्यता सुनिश्चित कराने के उद्देश्य लेकर चलती है। यह वेबसाइट युवाओं को ट्रांस समुदाय (Transgender Umbrella)  के भीतर मौजूद विभिन्न लैंगिक पहचानों से अवगत कराने के लिए भी प्रतिबद्ध है। यह ट्रांस समुदाय से जुड़े मिथकों और पूर्वाग्रहों को भी खंडित करती है और एक E-सपोर्ट सिस्टम बनाती है। नेसारा यह मानती हैं कि सिसजेंडर से अलग सेक्सुएलिटी को समाज कलंक मानता है। इसी डर से ट्रांस समुदाय के लोग खुलकर अपने आप को अभिव्यक्त नहीं करते और घुटकर जी रहे होते हैं। ऐसे में वे किसी मेडिकल सलाहकार से लिंग या हार्मोन रिप्लेसमेंट सर्जरी संबंधी जानकारी भी नहीं ले पाते। ऐसे में ज़रूरी है कि उनके पास एक माध्यम हो, सहयोग हो, जो सामाजिक मिथकों और रूढ़ियों का खंडन कर, उनकी मदद कर सके। ट्रांसजेंडर इंडिया को वह ऐसे ही माध्यम के रूप में देखती हैं। हाल ही में नेसारा ने ट्रांस स्पेसिफिक ऑनलाइन डिस्कसन फोरम (TALK) की शुरुआत की है, जिसके माध्यम से वे ऑनलाइन अपनी समस्याएं साझा करते हैं और उन्हें करियर, लिंग परिवर्तन (ट्रांजिशन) और काउंसिलिंग जैसी सुविधाएं प्रदान की जाती हैं।

रेप इज़ रेप कैंपेन

अगस्त 2019 में नेसारा और उनके सहयोगियों ने #रेप इज़ रेप कैंपेन की शुरुआत की। उनका कहना था कि समाज में ट्रांस समुदाय के लोगों के लिए अपने जेंडर को अभिव्यक्त करने का अधिकार ही खतरे में हैं और इस समय जो कुछेक अधिकार दिए जा रहे हैं, उनमें भी बहुत से कमज़ोर पहलू हैं। उन्होंने ट्रांस समुदाय (अधिकारों का संरक्षण) बिल, जिसमें ट्रांस व्यक्ति के ख़िलाफ़ यौन अपराध के लिए निर्धारित 2 वर्ष की सज़ा की आलोचना करते हुए कहा कि ‘यदि सबके लिए बुनियादी सुरक्षा और जीवन रक्षा के कानून समान हैं तो फिर इस तरह के भेदभावपूर्ण जेंडर आधारित श्रेणीकरण की क्या आवश्यकता है।’ वह इस बात पर ज़ोर देती हैं कि असलियत में ट्रांस समुदाय के लोगों के पास कोई भी सामाजिक या कानूनी अधिकार नहीं है। एक सिसजेंडर महिला के साथ यौन हिंसा के लिए जहां आजीवन कारावास या सात वर्ष की सज़ा निर्धारित हैं, वहीं ट्रांस लोगों के साथ यौन हिंसा व बलात्कार करने वालों को दो साल की सज़ा का तय किया जाना साफ़ तौर पर भेदभावपूर्ण है। नेसारा कहती हैं कि ट्रांसजेंडर इंडिया ट्रांस लोगों के लिए माता-पिता, भाई-बहन और रिश्तेदार है। यहां हम सब आपके सह-कार्यकर्ता हैं, पड़ोसी हैं। कुल मिलाकर हम एक विविध समुदाय हैं जो सभी नस्लों, जातीयताओं और मतों की पहचानों को अभिव्यक्त करते हैं। वह लगातार समाज में ट्रांस समुदाय की बात रखने व उनके प्रति संवेदनशीलता बनाने के लिए प्रयासरत हैं। अलग-अलग अभियानों के माध्यम से वह सरकार और नीति-निर्माताओं का ध्यान असली समस्याओं व विभेदक नीतियों की ओर ला रही हैं। उनके इन प्रयासों से निश्चित तौर पर ट्रांस लोगो के लिए एक नई उम्मीद उभरकर आई है।

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