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ट्रांस समुदाय की आत्मकथाओं ने उनके जीवन के अभेद्य किले को ढाहकर हाशिये पर जीने के लिए विवश इस समुदाय को मुख्यधारा में स्थान दिलवाने की पहल की है। साहित्य की गद्य विधाओं में आत्मकथा को सबसे अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक विधा के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि अन्य विधाओं में यथार्थ के साथ कल्पना का भी मिश्रण होता है लेकिन आत्मकथा में लेखक अपने जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को पूरी ईमानदारी के साथ चित्रित करता है जिससे कहानी में प्रमाणिकता बनी रहती है। अपनी आत्मकथा में लेखक अपने परिवेश के सामाजिक, पारिवारिक तानेबाने को खंगालते हुए अपने जीवन संघर्षों को दर्ज करता है और पाठकों को साहस और धैर्य बनाए रखने के प्रेरणा सूत्र देता है। आत्मकथा का लेखक साधारण से लेकर नामचीन व्यक्ति तक कोई भी हो सकता है। अस्मितावादी विमर्श के दौर में हाशिये पर स्थित वंचित समुदायों ने वर्चस्ववादी पुरूष प्रधान व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाने का जो साहस जुटाया है उसकी प्रतिध्वनि उनकी आत्मकथाओं में सुनी जा सकती है। इस आधार पर कहा जा सकता है ट्रांस आत्मकथाएं, ट्रांस समुदाय के जीवन के अंधेरे कोनों को पूरी प्रमाणिकता के साथ प्रकाश में लाने का सशक्त माध्यम बन सकती हैं।

साहित्य में ट्रांस विमर्श के आने के बाद इनके जीवन से जुड़े रहस्य खुलने लगे हैं। यह सुखद है कि इस समुदाय को लेकर अब चर्चा होने लगी है क्योंकि घृणा और उपेक्षा का सामना करते ट्रांस समुदाय समाज और नीति निर्माताओं की सोच की परिधि में आते ही नहीं थे। भारतीय समाज में आजतक स्त्री ,पुरुष के अलावा ट्रांस समुदाय को सामाजिक स्वीकृति दी ही नहीं गई और न ही इस वर्ग को हाशिये पर स्थित दलित,आदिवासी और स्त्री के समान उत्पीड़ित वर्ग शामिल किया गया। इसलिए ट्रांस समुदाय को सामाजिक समानता के अधिकार दिलाने के लिए जनजागरण अभियान के साथ इनके जीवन पर आधारित साहित्य पर बात करना जरूरी है।  

ट्रांस जीवन संघर्षों के शुरुआती लेखन के अंतर्गत अब तक मात्र दो आत्मकथाएं हिन्दी में अनुवादित होकर प्रकाशित हुई हैं। पहली है लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की आत्मकथा- मैं हिजड़ा, मैं लक्ष्मी, दूसरी साल 2017 में मानोबी बंदोपाध्याय की आत्मकथा ‘ए गिफ्ट ऑफ़ गॉडेस लक्ष्मी’ का हिन्दी अनुवाद, ‘पुरूष तन में फंसा मेरा नारी मन ‘ के नाम से प्रकाशित हुई। यह पुस्तक एक ट्रांस महिला की अपनी पहचान को परिभाषित करने और उपलब्धि के नए मानकों को निर्धारित करने वाली  असाधारण और साहसिक आत्मकथा कही जा सकती है। मानोबी के शब्दों में, “मुझे सारा जीवन लोगों के मुख से हिजड़ा, बृहन्नला ,नपुंसक, खोजा, लौंडा’ जैसे शब्द सुनने पड़े हैं और मैंने जीवन के इतने वर्ष यह जानते हुए बिताए हैं कि मैं एक जातिच्युत और परित्यक्त हूं। क्या इसमें मुझे पीड़ा का अनुभव हुआ? हुआ और इसने मुझे बुरी तरह से आहत किया है लेकिन चलन से बाहर हो चुके मुहावरे का प्रयोग करें तो कह सकते है कि समय बड़े-बड़े घाव भर देता है। मेरे मामले में इस कहावत ने थोड़ा अलग तरह से अपना प्रभाव दिखाया है। कष्ट तो अब भी है पर समय के साथ-साथ दर्द घट गया है। यह मेरे जीवन के एकांत क्षणों में मुझे आ घेरता है, जब मैं अपने अस्तित्व संबंधी यथार्थ से जूझ रही होती हूं। मैं कौन हूं और मैं एक पुरूष की देह में कैद स्त्री के रूप में क्यों जन्मी?

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मानोबी की आत्मकथा में एक ट्रांस महिला के भीतरी द्वंद्व और उसके खंडित व्यक्तित्व के दंश को साफ-साफ देखा जा सकता है। सामाजिक अस्वीकृति के दंश को लगातार झेलता हुए सोमनाथ के लिए मानोबी बनाने का सफर आसान नहीं था। कारण पुरूष शरीर पुरुषतत्व के कारण ही तो समाज की प्रतिष्ठा का हकदार होता है लेकिन सोमनाथ का दैहिक गठन से भले ही पुरूष था लेकिन मन और भावनाएं तो स्त्रीत्व के गुणों से आच्छादित थीं। ऐसे पितृसतात्मक समाज से मुठभेड़ करते हुए सोमनाथ के लिए पुरुष से एक ट्रांस महिला बनने का सफर बेहद त्रासद और संघर्षपूर्ण रहा। परिवार और समाज के बीच रहकर भी मानोबी अपने अस्तित्व की लड़ाई में एकदम अकेली थी। मानोबी का जन्म संभ्रांत परिवार में हुआ था। उसकी शारीरिक और मानसिक संरचना सामान्य बच्चों की तरह ही थी लेकिन धीरे-धीरे बढ़ती उम्र के साथ अपने भीतर और बाहर के असंतुलन को महसूस करने के कारण उसके समक्ष अपनी पहचान का संकट उत्पन्न होता है कारण जन्म से लैंगिक पहचान पुरूष के रूप में थी लेकिन मन से वह स्वयं को स्त्री मानती थी। तन और मन का संघर्ष लंबे समय तक चलता रहा। लोग क्या कहेंगे, परिवार की बदनामी होगी, जैसे विचारों से लड़ते-लड़ते आखिरकार एक दिन सबके सामने पुरुष का चोला उतारकर स्त्री के रूप में अपनी पहचान उजागर करने का जोखिम उठाती है और अपने भीतरी संघर्ष से मुक्त हो जाती है। यहां से शुरू होता है एक ट्रांसजेंडर की पहचान का सामाजिक संघर्ष।

 

मानोबी के शब्दों में, “मुझे सारा जीवन लोगों के मुख से हिजड़ा, बृहन्नला ,नपुंसक, खोजा, लौंडा’ जैसे शब्द सुनने पड़े हैं और मैंने जीवन के इतने वर्ष यह जानते हुए बिताए हैं कि मैं एक जातिच्युत और परित्यक्त हूं।”

यह सच है कि अपने अस्तित्व की पहचान के लिए ट्रांस समुदाय का संघर्ष सबसे पहले खुद से फिर परिवार से और अंत में समाज से होता है। जेंडर का प्रश्न अस्मिता के प्रश्न के भीतर से ही उभरता है। जेंडर का संबंध एक ओर पहचान से है तो दूसरी ओर सामाजिक विकास की प्रक्रिया के तहत स्त्री-पुरूष की भूमिका से है। पारंपरिक पहचान से अलग प्रजनन क्षमता के न होने के कारण समाज में इनकी भूमिका शून्य मान ली जाती है। लेकिन आज मेडिकल साइंस की प्रगाति के साथ ट्रांस समुदाय अब आत्मचेतस हुआ है और आज सामाजिक पूर्वाग्रहों को तोड़कर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। 

आत्मकथा की शुरुआत सोमनाथ उर्फ मानोबी के जन्म से होती है। दो लड़कियों के बाद सोमनाथ का जन्म बंदोपाध्याय परिवार में हुआ था। पुत्र के रूप में खानदान का वारिस पाकर उनके पिता बेहद खुश थे। लेकिन पिता की खुशी पर मानो धीरे-धीरे ग्रहण लग रहा था क्योंकि सोमनाथ सामान्य लड़कों से अलग व्यवहार करता दिखाई देता। उधर सोमनाथ भी अपने अधूरेपन को सबके समक्ष न कह पाने की घुटन बचपन से ही महसूस करने लगा था। अपने पुरुष शरीर में स्त्री मन को कैद देख भीतर और बाहर की पीड़ा से व्यथित रहने लगा। “मैं बहुत भ्रमित थी मेरा जीवन एक अंतहीन भूल-भुलैया बन गया था। हर बार मैं एक ही मोड़ पर आ जाती मैं कौन थी? मेरी देह मेरी आत्मा से अलग क्यों थी या मुझे अपनी पहचान को जानने में भूल हो रही थी? मेरा जन्म इस तरह क्यों हुआ? मैं जितने लोगों को जानती थी उनमें से अधिकतर का यही मानना था कि मैं एक होमोसेक्सुअल यानी समलैंगिक थी। उन्होंने मुझे एक जनाना लड़का बना दिया था जो हिजड़ा बनने की तैयारी में था। मैं पूरी तरह निश्चिंत थी कि मैं होमोसेक्सुअल नहीं, एक लड़की हूं। मैं अपनी हमउम्र लड़कियों की तरह पुरुषों की ओर आकर्षित होती थी और उन्हें अपने साथी की तरह पाना चाहती थी पर विपरीतकामी लोगों की दुनिया ने मेरे प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्होंने केवल मेरा शोषण करते हुए मेरे स्तर का माखौल उड़ाया। उस समय ट्रांसजेंडर शब्द लोगों के लिए अनजान था। जब हम छोटे थे तो मज़ाक मज़ाक में एक-दूसरे से पूछते, तुम एक मेल हो फ़ीमेल हो या कैमल हो? मुझे लगा कि मैं इस कैमल श्रेणी से थी और मेरे आगे एक पूरी बदकिस्मत जिंदगी पड़ी थी पर मैं फिर भी अपने प्रश्नों के उत्तर चाहती थी।”

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बुद्धि और शरीर से स्वस्थ सोमनाथ पढ़ने-लिखने में समान्य छात्रों की तुलना में मेधावी छात्र था। पढ़ने में अच्छा होने के बाद भी सोमनाथ को विज्ञान के लिए किसी मार्गदर्शन की जरूरत थी जिसमें उसके स्कूल सीनियर इन्द्र दा ने उसकी बहुत मदद की। इन्द्र दा सोमनाथ के मन की उलझन को समझ रहे थे। भीतर चल रहे झंझावातों को समझने के लिए उनके कहने पर ही वह मनोचिकित्सक से मिला। उस डाक्टर ने सोमनाथ की कहानी धैर्य के साथ सुनी और समझाया की काउंसलिंग की मदद से वह अपने-आप को यकीन दिला सकेगा कि वह एक पुरुष की तरह जन्मा है और वह पुरूष ही है लेकिन वहां से आने के बाद सोमनाथ की सोच में कोई बदलाव नही आया। वह अभी भी स्वयं को लड़की मानता था। उसे अपने शरीर से घृणा होने लगी थी। एक बार फिर इन्द्र दा ने उसे मैनाक मुखोपाध्याय से मिलने को कहा। मैनाक ने उसे बताया की सोमनाथ अपने बारे में जो भी सोच रखता था वह कही से भी गलत नहीं थी। उन्होंने ही उसे बताया था कि वह जेंडर अफर्मिंग सर्जरी करवा सकते हैं पर इसके लिए ऑपरेशन से पहले और बाद में भी हार्मोनल उपचार की आवश्यकता होगी और इसके साथ ही काउंसलिंग भी जारी रखनी होगी ताकि मानोबी का देह और मस्तिष्क आने वाले परिवर्तनों के अनुकूल हो सकें।

अपनी पहचान को लेकर मानोबी घर और बाहर निरंतर अपमान और तिरस्कार को झेलते हुए अपने वजूद के साथ दृढ़ता के साथ खड़ी थी। सामाजिक विडम्बना थी कि जो लोग मानोबी के खंडित अस्तित्व को हेय दृष्टि से देख रहे थे वही लोग एकांत में इसका यौन शोषण करने से भी बाज नही आते थे। उनका अपना कज़िन हर रात शराब के नशे मे घरवालों को बेइज्जत करता और उसका यौन शोषण भी करता। सिर्फ इतना ही नहीं उसके मोहल्ले के ज़्यादातर लोगों ने उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर उसका यौन शोषण किया था। “तब तक मैं धीरे-धीरे पड़ोस के बहुत से लोगों के हाथों का सेक्स का खिलौना बन गई थी। कुछ लोग तो बाहर ले जाकर मेरे साथ शारीरिक संबंध बनाने का साहस रखते तो कुछ केवल आस-पास से निकलते हुए मेरे हालात की खिल्ली और मज़ाक उड़ा कर ही संतुष्ट हो लेते। लेकिन मानोबी सामान्य से भिन्न दिखाना चाहती थी, इसलिए उसने अपनी शिक्षा जारी रखते हुए कॉलेज में प्रवेश किया वहां भी अपने अस्तित्व को पूर्णता दिलाने के लिए अपनी पहचान और सम्मान के लिए उसे सबसे संघर्ष करना पड़ा। “उन्हें लगा कि सोमनाथ बंधोपाध्याय नामक कोई युवक होगा और उन्हें अपनी कक्षा में मेरे जैसे छात्र के आने का कोई अंदेशा नहीं था। मेरे कुछ दोस्तों को लगा कि मैं ट्रांसवेस्टाइट हूं यानी मुझे विपरीत लिंगी के कपड़े पहनना पसंद है। मैंने उन्हें स्पष्ट शब्दों में जाता दिया कि मैं एक औरत थी जो मर्द के जिस्म में कैद थी उस समय मुझे ट्रांसजेंडर शब्द की कोई जानकारी नहीं थी।

प्रेम पाने की चाहत में मानोबी ने प्रेम में अनगिनत धोखा खाने और हर बार छले जाने के बाद भी प्रेम करना नहीं छोड़ा। कॉलेज में अभि के साथ प्रेमप्रसंग और उसके माता-पिता के विरोध के बाद उससे अलग होने की पीड़ा उसके जीवन का दूसरा धोखा था। अभि के साथ सुखद पारिवारिक जीवन जीने का सपना अधूरा ही रह गया। “प्रेम मेरे जीवन की सबसे बड़ी छलना रही फिर भी मैं प्रेम या प्रेम करने से नहीं हारी। जब भी मैं अपने एक के बाद एक सामने आने वाले उन विविध प्रेम प्रसंगों का स्मरण करती हूं तो एक गहरी हृदय विदारक आह के सिवा कुछ सुनाई नहीं देता। हर अनुभव ने मेरे दिल को ठेस पहुंचाई, मेरे वजूद को चूर-चूर किया पर यह अपने साथ एक नई अनुभूति लेकर आता जो मुझे पहले से कहीं परिपक्व और आत्मविश्वासी बना जाता। आज मुझे एहसास है कि प्रेम, जीवन की तरह ही, कुछ समय बाद समाप्त होता है और आपको इसे छोड़ना आना चाहिए।

अपनी खूबसूरती की वजह से वह अपने कॉलेज में सबके आकर्षण का केंद्र थी। घूमना फिरना, सेक्स करना उनकी दिनचर्या में शामिल था लेकिन उसके मन को तो एक स्थायी संबंध की तलाश थी जो उसकी आत्मा को उन्नत बना सके। “मैं युवा और भावुक प्रकृति की थी और अपने लिए किसी मजबूत सहारे की तलाश में थी। कोई ऐसा जो मेरी निगाहों से होते हुए मेरे आत्मा की प्यास को बुझा देता। जो मेरी राह में आए वे मेरे लिए ऐसा कोई एहसास नहीं रखते थे पर मैं पूरी तरह से उन्हें दोष नहीं दे सकती क्योंकि मैं सबके साथ मौज मना रही थी और यह सब मेरी इच्छा से हो रहा था। मैं जानती थी कि यह सब अच्छा नहीं था और मेरे जैसी अच्छी छात्रा को यह सब करना शोभा नहीं देता पर मैं चाहकर भी अपनी अस्थायी रंगरेलियों से छुटकारा नहीं पा सकी।” 

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मानोबी के व्यक्तित्व का एक सकारात्मक पक्ष था उसका लेखन कौशल, जो उसे निरंतर सब संघर्षों से जूझने की प्रेरणा दे रहा था यही वजह थी कि मानोबी इन सबसे ऊपर उठकार पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करने लगी जिसने न सिर्फ उसे ख्याति दिलाई बल्कि कॉलेज में अब सब उसका सम्मान भी करने लगे। अखबार के लिए काम करते हुए उसके सहयोगियों ने उसे पूरा सम्मान दिया। यहा से मिले नए आत्मविश्वास और स्वाभिमान से सशक्त होकर उसने एक साहसिक कदम उठाया। अपने ट्रांसजेंडर होने की पहचान स्वीकार करते हुए सबके सामने आने का साहस किया लेकिन माता-पिता उसकी इस पहचान को झूठलाते रहे और सबसे यही कहते रहे कि सोमनाथ गलत संगत में पड़कर ऐसा कह रहा है। कॉलेज के बाद यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर मानोबी ने एक नई दुनिया में कदम रखा। बौद्धिक आदान-प्रदान के द्वारा शंख घोष सर की प्रेरणा से उसने प्रोत्साहित होकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेकर जल्दी ही जेयू में लोकप्रिय छात्र के रूप में अपनी पहचान बना ली लेकिन प्रेम और सेक्स उसके जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी थी इसलिए यहां एक बार फिर सागर बोस के प्रेम मे पड़कर मानोबी छली जाती है। जब उसे यह पता चलता है कि सागर ने सिर्फ उससे ही नहीं कई दूसरे लोगों से भी शारीरिक संबंध है। इसके बाद वह कई विदेशी छात्रों के साथ भी दैहिक सबंध बनाती है लेकिन मन के भीतर का अकेलापन इनमें से कोई भी नही भर पाता। महिला मित्रों के साथ भावनात्मक बल लेते हुए एमए करने के बाद उसे नौकरी की आवश्यकता थी जो उसे आत्मनिर्भर बना सके।

शीध्र ही उसकी ये इच्छा भी पूरी हो जाती है और बगुला के श्री कृष्णा कॉलेज में 125 रुपये प्रतिमाह वेतन पर अंशकालिक लेक्चरार के रूप में उसकी नियुक्ति हो जाती है। कुछ दिनों बाद ही उसे स्कूल में स्थायी अध्यापक की नौकरी भी मिल जाती है। वहां अध्यापन के साथ-साथ डांस और थियेटर की स्थापना कर छात्रों के बीच उसकी लोकप्रियता बढ़ने लगती है। उसी स्कूल में अपने सहयोगी बिमान के आकर्षणवश वह उससे प्रेम करने लगती है बिमान भी उससे प्रेम करता है। दोनों विवाह के बाद एक परिवार बनाना चाहते थे चूंकि दोनों आर्थिक रूप से स्वतंत्र थे इसलिए लोग क्या कहेंगे उसकी चिंता दोनों को न थी। बिमान मानोबी को पत्नी बनाना चाहता था इसलिए वह उससे ऑपरेशन करवाने के लिए आग्रह कर रहा था। दोनों एक मनोचकित्सक से मिलने जाते हैं, दोनों से अलग-अलग बातचीत करते हुए डॉक्टर, बिमान को इस सबंध से दूर रहने की सलाह देता है इस बात की जानकारी मिलते ही मानोबी बिमान पर टूट पड़ती है उसे बिमान के चेहरे की उड़ी हुई हवाइयों से पता लग जाती है कि बिमान कितना कायर आदमी है और एक बार फिर वो अपने दिल के हाथों आहत होती है। इसी अवसाद के बीच उसे सर्विस कमीशन के द्वारा पश्चिम बंगाल के कॉलेज में प्रोफेसर पद के लिए नियुक्ति का पत्र प्राप्त होता है। 

यहां से उसके जीवन की एक नई शुरुआत होती है। नए माहौल और नए वातावरण में चुनौतियां ज्यादा कठिन थी। इस कालेज के दो नेता टाईप प्रोफेसर सूरी सेनगुप्ता और शशांक ने एक ट्रांसजेंडर को प्रोफेसर के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया था जबकि कॉलेज के प्रिंसिपल को इस राजनीति से कोई लेना-देना नही था। दोनों प्रोफेसर के अभद्र व्यवहार का आतंक दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था जिसका जिक्र कराते हुए मानोबी लिखती हैं, “एक बार उनमें से दो लोगों ने मुझे दीवार से सटाकर खड़ा कर दिया, मेरी छातियों के निप्पल इतनी ज़ोर से दबाए कि मेरी आह निकल गई। हिजड़े अपनी जुबान बंद रख।” यहां वर्चस्ववादी पुरूषप्रधान चेहरा अपने क्रूर रूप में सामने आता है लेकिन अपने छात्रों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के एहसास के कारण सब कुछ चुपचाप सहने के लिए मजबूर मानोबी हिम्मत नहीं हारती। उसका मानना था कि एक ट्रांसजेंडर को पहचान और सम्मान उसकी उच्च शिक्षा और आत्मनिर्भरता ही दिला सकती है। इसलिए हमारी शिक्षा पद्धति में बदलाव की जरूरत को महसूस करते हुए मानोबी मानती है, “एक समाज के रूप में हमें पारंपरिक उच्च शिक्षा के बारे में नए सिरे से विचार करना चाहिए। इसकी बजाय अगर हम उन बच्चों को पेशेवर प्रशिक्षण दे सकें तो वे अपने जीवन में कोई काम कर सकेंगे और उन्हें बेरोजगार नहीं रहना होगा।”

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सामाजिक दायित्वों का निर्वाह मानोबी को आत्मिक संतोष देता था इसलिए मानोबी ने तय किया कि वह छोटी-मोटी बाधाओं से अपने उत्साह को मंद नहीं होने देगी और गांव के नवयुवकों और युवतियों से मित्रता कर समाज में लोगों की सहायता करेगी। इन सब घटनाक्रमों के बाद वह जीवन की एक ओर सीढ़ी चढ़ते हुए पीएचडी करने का निर्णय लेती है और गाइड के रूप में जेयू की प्रोफेसर और नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की भूतपूर्व पत्नी नवनीता देवसेन को चुनती है। नवनीता ट्रांस समुदाय की समस्याओं और अधिकारों के लिए आवाज उठाती रहती थी। नवनीता मानोबी को इन्हीं के जीवन पर शोध करने के लिए प्रेरित भी करती है लेकिन उनकी दूसरी गाइड शर्मीला दी को यह विषय पसंद न आने की वजह से मानोबी इस विषय पर शोधकार्य नहीं कर पाती लेकिन व्यक्तिगत रूप से ट्रांस समुदाय के बारे में बारीकी से जानने और उनके जीवन के अनदेखे पहलुओं को प्रकाश में लाने उद्येश्य से वह भारत की पहली ट्रांसजेंडर पत्रिका अबोमानाब नाम की पत्रिका निकालने का निर्णय लेती है। अपने इस कार्य के लिए उसे उनके जीवन को निकट से देखने की जरूरत महसूस होती है और वह उस घराने दीक्षा लेने के लिए स्यामोली दी के आश्रम जाती हैं जिसको केंद्र मे रखकर वह उपन्यास भी लिखती है। इस पत्रिका के प्रकाशन के बाद मीडिया में मानोबी को कवरेज मिलने लगी नाम और शोहरत के साथ कॉलेज के विरोधियो के मुंह भी बंद हो गए लेकिन वह अभी अपनी अपूर्णता के साथ जूझ रही थी जिसमें उसका साथ दिया एडोक्रिनोलोजिस्ट अनिरबान मजूमदार ने जिन्होंने अखबार में मानोबी का लेख पढ़कर उससे संपर्क किया ।

मानोबी उनका पहला केस थी। उनकी देखरेख में तीन वर्षों की थेरेपी के बाद उसके शारीरिक बनावट में बदलाव दिखने लगे थे। कमर, छाती ,पेट का आकार बदलने लगा था। अब अगला कदम था ऑपरेशन का जिसको लेकर पहले तो वह डगमगाई और एक साल के सोच विचार के बाद वह साल 2002 में इस ऑपरेशन के लिए तैयार हुई जिसके पीछे उसके एक और प्रेमसबंध की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस बार के प्रेमी का नाम था सोरेन। सोरेन ने भी उसे छला है यह उसे बहुत देर बार पता चला लेकिन सोरेन के प्रेम में पागल मानोबी का मन ये मानने को तैयार ही नहीं था कि सोरेन ने भी उसे छला है। समय के साथ यह घाव भी भर जाता है। एकबार फिर वह अपने नए प्रेमी अरिंदम के प्रेम में पड़कर दांपत्य जीवन के सपने संजोने लगती है। पैसा शोहरत सब कुछ होने के बाद भी मानोबी अपने एकाकी जीवन में साथी के रूप में पति का प्रेम पाने के लिए तरस रही थी, “अब मेरे सामने जीवन का एक ही लक्ष्य था -विवाह ,पति और परिवार। बेशक मैं उस तरह औरत नहीं बन सकती थी जैसी कुदरत ने बनाई है, मुझे रक्त स्राव नही होगा और मैं न ही मां बन सकूंगी पर मेरे पास योनि और वक्षस्थल होगा, जो मेरी लैंगिकता को बढ़ाने में मदद करेगा।”

लेकिन इस संबंध में भी वह एक बार फिर धोखा खाती है। बार-बार प्रेम में छले जाने के बाद भी अपनी पहचान के साथ मजबूती से खड़े रहकर सोमनाथ सेक्स चेंज कराने के बाद कानूनी तौर पर अपना नाम बदलकर मानोबी रख लेती है। जिसका अर्थ बताते हुए वह कहती हैं, “मानोबी नाम मैंने इस लिए चुना क्योंकि इसका अर्थ है सर्वोत्कृष्ट मादा-प्रकृति -जैसा प्रकृति ने उसे बनाया है। उनके इस कथन में अपने अस्तित्व के प्रति सम्मान और स्वाभिमान पाने की ललक दिखाई देती है वह किसी से भी स्वयं को कमतर नही आंकती वह ट्रांस समुदाय के संबंध में फैली सामाजिक भ्रांतियों को दूर करना चाहती है। वह सिद्ध करना चाहती है कि भले ही वह प्राकृतिक रूप से प्रजनन नहीं कर सकती लेकिन वह गोद लेकर मातृत्व का बोध कर सकती है। अपने माता-पिता को इकलौते पुत्र होने का सुख नहीं दे सकी लेकिन अंतिम समय तक पिता को साथ रखकर संतान का सुख देकर अपनी जिम्मेदारियों को निभा सकती है।  

सोमनाथ से मानोबी बनाने का सफर कृष्णनगर वीमन कालेज की प्रिंसिपल पद पर पहुंचकर पूरा होता है। इसके साथ ही समाज में सम्मान और आदर के साथ भारत की पहली ट्रांस प्रिंसिपल बनाने का गौरव मिलता है। तमाम विरोधों ,उपहासों और व्यंग्य को सहते हुए मनोबी पुरुष तन का चौला उतार स्त्री मन के साथ शरीर धारण करने में सफल होती है। कहा जा सकता है कि सफलता का मूल मंत्र था- दृढ़ निश्चय। अपने अटूट आत्मविश्वास और उच्च शिक्षा के बल पर वीमन कालेज में प्राचार्या के पद पर आसीन होकर मानोबी सिद्ध कर देती है कि यदि ट्रांस समुदाय को परिवार और समाज का साथ मिले तो उनकी ऊर्जा एवं शक्ति को रचनात्मक कार्यों में लगाकर समाज में उनकी स्वीकार्यता को बढ़ाई जा सकती है। मानोबी की आत्मकथा को पढ़ने के बाद एक बात साफ हो जाती है कि ट्रांस बच्चों को पारिवारिक, सामाजिक संरक्षण के साथ इनको उपेक्षित होने से बचाया जा सकता है तथा शिक्षित कर इन्हें आत्मनिर्भर भी बनाया जा सकता है। इस दिशा में साल 2008 में तमिलनाडु में सिर्फ ट्रांस व्यक्तियों के लिए खासतौर से एक कल्याण बोर्ड गठित किया गया। सरकार ने उनके लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाईं, जैसे रिआयती आवास और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र। इसके साथ ही उन्हें खास सरकारी अस्पतालों में जेंडर अफर्मिंग सर्जरी निशुल्क करवाने की सुविधा दी। अगस्त 2018 में केरल देश का दूसरा राज्य बन गया जहां पर जेंडर अफर्मिंग सर्जरी के लिए ट्रांस समुदाय के लोगों को 2 लाख रुपये का सहयोग दिया जाता है। भारत में ट्रांस समुदाय को सरकार से इसी तरह के समर्थन की आपात जरूरत है ताकि उन्हें पर्याप्त तौर पर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें और संदेहास्पद चिकित्सकीय पेशेवरों के हाथों उन्हें जैसे शोषण और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है वे उससे बच सकें। कुल मिलाकर सरकार के सहयोग और परिवार के प्रयासों द्वारा इन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है।

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