क्यों हिंदू कोड बिल का किया गया था संसद में विरोध
तस्वीर साभार: The Live Mint
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गृह मंत्री सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जो हिंदू महासभा से संबंधित थे, कांग्रेसी नेता पंडित मदन मोहन मालवीय ने हिंदू कोड बिल का पुरज़ोर तरीके से विरोध किया था। कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया ने बिल का बहिष्कार यह कहते हुए किया कि आनेवाले चुनावों में इस बिल का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस बिल का बहिष्कार यह कहते हुए किया था कि यह बिल हिंदू संस्कृति को टुकड़ों में बांट देगा। यहां तक कि जो महिलाएं हिंदू महासभा से जुड़ी हुई थीं उन तक ने इस बिल का बहिष्कार किया था। ऑल इंडिया हिंदू वीमेन कांफ्रेंस की अध्यक्ष जानकी बाई जोशी ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखते हुए कहा था कि प्रस्तावित विधेयक संस्कार विवाह को संविदात्मक बनाकर हिंदुओं की परिवार व्यवस्था को ही नष्ट कर रहा है। वहीं, खुद राजेंद्र प्रसाद का ये मानना था कि हिंदू कोड बिल हिंदुओं के व्यक्तिगत कानूनों में दखल दे रहा है जिससे चुनिंदा ‘प्रगतिशील’ लोगों को ही फायदा होगा। 

इस सबके मद्देनज़र यह भी नहीं नकारा जा सकता है कि यह एक महत्वपूर्ण बात थी कि आखिर बिल को कौन पेश कर रहा है। संसद में उपस्थित सभी लोग यह जानते, मानते थे कि बाबा साहब एक ‘अछूत’ जाति से थे, एक अछूत द्वारा इतने प्रगतिशील ड्राफ्ट को मानना उनके जातिगत अहम के लिए बड़ी बात थी। जैसे कि जेरेशास्त्री कहते थे कि गटर के गंगाजल को पवित्र नहीं माना जा सकता। यहां तक कि कुछ सदस्यों ने खुले तरीके से ये बात कही कि वे इस बिल को जब तक पास नहीं होने देंगे तब तक कि डॉक्टर आंबेडकर बिल को प्रस्तुत कर रहे हैं। 

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संसद से बाबा साहब आंबेडकर का इस्तीफ़ा

पंडित जवाहर लाल नेहरू बिल के समर्थन में थे लेकिन चूंकि बहुमत पक्ष में नहीं था और बाबा साहब हिंदू कोड बिल को किसी भी कीमत पर पारित करवाना चाहते थे इसीलिए जब बिल पारित नहीं हुआ तब हिंदू कोड बिल के साथ अन्य कारणों जिनमें कैबिनेट की अहम कमेटी में उनको सदस्य न बनाए जाने पर, सरकार का पिछड़ा जाति, अनुसूचित जाति के मुद्दे पर ठीक रवैया न होना, कश्मीर और ईस्ट पाकिस्तान के मुद्दे पर भारत की विदेश नीति से असहमति के चलते बाबा साहेब ने 27 सितंबर 1951 को इस्तीफ़ा दे दिया। 

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बाबा साहब आंबेडकर ने बिल के माध्यम से न सिर्फ महिलाओं के अधिकारों का रास्ता संवैधानिक तरीके से खोलने की पुरजोर कोशिश की थी बल्कि जाति व्यवस्था को भी संस्कार विवाह और सिविल विवाह के प्रावधानों में बदलावकर पूरी चुनौती दी।

बाबा साहब के इस्तीफे के बाद नेहरू कैबिनेट ने बिल को चार भागों में बांटकर पारित किया और इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं कि बाबा साहेब का संसद से हटने पर आसानी से सभी बिल बहुमत से संसद में पारित हुए थे। वे बिल थे – हिंदू मैरिज एक्ट 1955, हिंदू सक्सेशन एक्ट 1956, हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956 और हिंदू माइनोरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट 1956। बाबा साहब के विचारों से प्रभावित अन्य महिला हितकारी एक्ट संसद में पारित हुए जिनमें महत्वपूर्ण हैं- सती प्रिवेंशन एक्ट 1987, डाउरी प्रोहिबिशन एक्ट 1961, द फैमिली कोर्ट्स एक्ट 1984, द नेशनल कमीशन फॉर वूमेन एक्ट 1990 आदि। 

महिलाओं अधिकारों के चैंपियन बाबा साहब आंबेडकर

बाबा साहब द्वारा चलाए गए सत्याग्रहों में भी महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। बाबा साहेब ने दलित महिलाओं के एसोसिएशन बनाने के सुझाव दिए ताकि शिक्षा और जागृति उनके बीच फैलाई जा सके। मंदिर प्रवेश के लिए साल 1927 महाड़ सत्याग्रह में पचासों महिलाओं से ज्यादा महिलाओं ने भाग लिया था जिसमें मनुस्मृति, जो महिलाओं और शूद्रों को दबाने के प्रावधान है, उसे जलाया गया था। इसके बाद हुई सभा में बाबा साहब ने महिलाओं को सलाह दी कि वे अपना साड़ी पहनने का ढंग बदलें, हल्के आभूषण पहनें और सड़े-मरे जानवरों का मांस न खाएं। 20 जुलाई 1940 को ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस वूमेन कांफ्रेंस में वह कहते हैं, “महिलाओं के बिना कोई प्रगति मुमकिन नहीं है। मैं महिला संगठन में बहुत विश्वास रखता हूं, वे समाज की स्थिति सुधारने में सबल हैं।”

साल 1928, बॉम्बे विधान परिषद के सदस्य के रूप में, उन्होंने कारखानों में काम करनेवाली महिलाओं के लिए सवैतनिक मातृत्व अवकाश देने वाले एक विधेयक का समर्थन किया। उन्होंने माइंस मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट का भी मसौदा तैयार किया, जिसमें कोयला खदान श्रमिकों के लिए कल्याण कोष में समान वेतन और महिलाओं के समान प्रतिनिधित्व के लिए कहा गया और भारत में महिलाओं के अधिकारों के लिए समान नागरिकता और आर्थिक विकास के महिलाओं के अधिकार पर जोर दिया।

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वर्तमान में हिंदू कोड बिल की प्रासंगिकता और बाबा साहब आंबेडकर 

हिंदू कोड बिल उस समय जरूर नकार दिया गया था लेकिन वह कितना महत्वपूर्ण था ये उसका अलग भागों में बंटकर पारित होना बताता है। बाबा साहब आंबेडकर ने बिल के माध्यम से न सिर्फ महिलाओं के अधिकारों का रास्ता संवैधानिक तरीके से खोलने की पुरजोर कोशिश की थी बल्कि जाति व्यवस्था को भी संस्कार विवाह और सिविल विवाह के प्रावधानों में बदलावकर पूरी चुनौती दी। मुख्यधारा का नारीवाद जिसमें तथाकथित उच्च जाति की महिलाओं का प्रभुत्व है, वे भी बाबा साहब को सिर्फ़ दलितों के मसीहा तक ही सीमित करती हैं जबकि उच्च जाति की महिलाओं के अधिकारों के लिए भी बाबा साहब ने बराबर रूप से काम किया। इस बात में कोई दो राय नहीं कि जितनी भी जिस स्तर पर महिलाओं की स्थिति में सामाजिक और कानूनी रूप से सुधार आया है और निरंतर जारी है उसमें बाबा साहब का अहम योगदान है। इसके लिए हमें उनका शुक्रगुजार होना ही चाहिए। 

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तस्वीर साभार: The Live Mint

स्रोत:
Velivada

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