महाड़ सत्याग्रह
तस्वीर:श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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अप्रैल माह कई मायनों में खास है। इस महीने राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और बाबा साहब डॉ.आंबेडकर की जयंती मनाई जाती है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधन करने के विरोध में 2 अप्रैल 2018 को देशभर के दलित और आदिवासी समुदाय के लोगों ने भारत बंद करके ‘ज़िदा’ होने का सबूत पेश किया था। इस दौरान 13 आंदोलनकारियों की जान चली गई थी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट को फैसला वापस लेना पड़ा और संघर्ष की जीत हुई। इसलिए अप्रैल का महीना अहम हो जाता है। इसकी शुरुआत बाबा साहब आंबेडकर द्वारा किए गए आंदोलन की कहानियों के साथ की जानी चाहिए। बात करते हैं उनके पहले सत्याग्रह की, जब उन्होंने पानी में आग लगाई थी, महाड़ सत्याग्रह की…

महाराष्ट्र में चावदार नामक तालाब महाड़ नगर में स्थित है। यह एक विशाल तालाब है। इसमें बारिश और प्राकृतिक स्रोतों का पानी आता है। इस तालाब में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई यहां तक की जानवर भी पानी पी सकते थे, लेकिन दलितों को चावदार तालाब से पानी पीने की मनाही थी क्योंकि ऐसा करने से सवर्ण हिंदुओं को तालाब अशुद्ध हो जाने का खतरा था। इस तालाब का कोई इतिहास नहीं मिलता कि यह किसने बनवाया था। महाड़ नगर को 1869 में नगरपालिका घोषित किया गया और यह तालाब नगरपालिका को सौंप दिया गया। महाड़ नगर में आने-जाने वाले लोग चावदार तालाब से पानी पी सकते थे लेकिन दलितों के लिए ऐसा करने पर मनाही थी। महाड़ में रहने वाले दलितों की बस्ती में बने तालाब से ही वह पानी पी सकते थे। सब कुछ इसी तरह चल रहा था, लेकिन अचानक से एक फरमान जारी हुआ जिसने स्थिति बदल दी। 

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दरअसल बंबई (मुंबई) की विधान परिषद ने 4 अगस्त 1923 में एक प्रस्ताव पारित किया। इसके अनुसार ऐसे सभी कुओं, तालाबों, जलाशयों और धर्मशालाओं का इस्तेमाल दलित कर सकते हैं जो सरकार के अधीन है या जिनका निर्माण या रखरखाव सरकार कर रही है। इसमें यह भी जोड़ दिया गया कि दलित अब सरकारी स्कूल, अस्पताल, अदालत और कार्यालयों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। बंबई विधान परिषद का यह प्रस्ताव सरकार ने स्वीकार कर आदेश जारी कर दिए। यह आदेश इस प्रकार था:

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“परिषद के पूर्वोक्त संकल्प के अनुसार बंबई सरकार सहर्ष यह निर्देश देती है कि जहां तक संकल्प का संबंध सरकारी स्वामित्व और देखरेख वाले सार्वजनिक स्थलों, संस्थाओं से है कार्यालयों के सभी अध्यक्ष उसे लागू करें। कलेक्टरों से अनुरोध किया जाए कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले स्थानीय निकायों को सलाह दें कि वह संकल्प में की गई सिफारिशों को स्वीकार करने की वांछनीयता पर विचार करें।”

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20 मार्च, 1927 वह ऐतिहासिक दिन जब डॉ.आंबेडकर के नेतृत्व में करीब ढ़ाई हज़ार लोगों की भीड़ चावदार तालाब पर पहुंची। सबसे पहले डॉ.आंबेडकर ने तालाब से पानी पिया और लोगों से कहा कि इस तालाब का पानी पीने का हमारा उद्देश्य यह नहीं है कि इसका पानी कुछ खास है, बल्कि यह आत्मसम्मान और बराबरी का मसला है। इसके बाद बाबा साहेब का अनुसरण करते हुए सभी लोगों ने तालाब से पानी पिया।  

कोलाबा जिले के डीएम ने इस आदेश की एक प्रति महाड़ नगरपालिका के पास भेज दी। नगरपालिका ने अस्पृश्यों को चावदार तालाब के इस्तेमाल के आदेश पर कोई आपत्ति नहीं जताई और जनवरी 1924 में इसे पारित कर दिया। चावदार तालाब से दलितों को पानी लेने का कानूनी अधिकार मिल चुका था, लेकिन सवर्ण हिंदू उन्हें ऐसा करने नहीं देना चाहते थे। इसके बाद कोलाबा जिले में पहली बार दलितों ने 19-20 मार्च 1927 को डॉ. आंबेडकर की अध्यक्षता में सम्मेलन किया। इसमें हज़ारों दलितों ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन का उद्देश्य चावदार तालाब पर जाकर पानी पीने का हक प्राप्त करना था। इससे पहले बाबा साहेब ने सम्मेलन को संबोधित किया। 

20 मार्च को सुबह नौ बजे सम्मेलन के दूसरे दिन बैठक शुरू हुई। सम्मेलन में मौजूद ऐसे कुछ सवर्ण जो दलितों का साथ देने का दम भर रहे थे, चावदार तालाब से पानी पीने के हक देने की बात सुनकर वहां से भाग खड़े हुए। यह देखकर दलितों में गुस्सा भर गया। उन्होंने एकजुट होकर नगर की सड़कों पर जुलूस निकाला। इस तरह का यह पहला शक्ति प्रदर्शन था जो सवर्ण लोगों के लिए असहनीय था। इसके बाद डॉ.आंबेडकर के नेतृत्व में करीब ढ़ाई हज़ार लोगों की भीड़ चावदार तालाब पर पहुंची। सबसे पहले डॉ.आंबेडकर ने तालाब से पानी पिया और लोगों से कहा कि इस तालाब का पानी पीने का हमारा उद्देश्य यह नहीं है कि इसका पानी कुछ खास है, बल्कि यह आत्मसम्मान और बराबरी का मसला है। इसके बाद बाबा साहेब का अनुसरण करते हुए सभी लोगों ने तालाब से पानी पिया। 

 तस्वीर साभार: Dr B.R. Ambedkar’s Caravan

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यह बात सवर्ण हिंदुओं में आग की तरह फैल गई। उन्होंने दलितों को बेरहमी से पीटा। हमले का विवरण बंबई से प्रकाशित होने वाले एक प्रमुख समाचार पत्र ‘द बोम्बे क्रॉनिकल’ ने कुछ यूं किया- “जुलूस शांति से चल रहा था। दो घंटे के बाद नगर के कुछ दुष्ट नेताओं ने गलत अफवाह उड़ा दी कि दलित वर्ग के लोग वीरेश्वर मंदिर में प्रवेश की योजना बना रहे हैं। लाठी-डंडों से लैस दंगाइयों की भीड़ इकट्ठा हो गई और वे दलितों के खून के प्यासे हो गए। दलितों के लोग सम्मेलन के बाद अपने गांव लौटने से पहले भोजन कर रहे थे।  इसी बीच उन पर हमला कर दिया गया। यही नहीं अपने गांव की तरफ लौटते दलितों पर भी उन्होंने हमला कर दिया और आसपास के दलितों के घरों में घुसकर मारपीट करनी शुरू कर दी। इस दौरान करीब 20 दलितों को गहरी चोट आई। हालांकि, दलितों की आबादी उनसे अधिक थी, लेकिन सम्मेलन के नेताओं ने संयम बरतने की अपील की जो कि प्रशंसनीय था। महाड़ और कोलाबा के सवर्ण हिंदुओं ने आसपास के सभी गांव के उच्च वर्ग के लोगों के पास यह संदेश भिजवा दिया कि दलित वर्ग के प्रतिनिधि अपने गांव में लौटे तो उन्हें दंडित किया जाए। इस तरह अपने गांव में लौटने वाले दलितों पर हमला किया गया। यह कहना ही पड़ेगा कि यदि रेजीडेंट मजिस्ट्रेट 2 घंटे के मूल्यवान समय तक हाथ पर हाथ धरकर न बैठा रहता तो संभव था कि दंगे की नौबत नहीं आती।”

सवर्णों ने इस घटना के बाद चावदार तालाब की शुद्धिकरण के लिए 108 बर्तनों में गाय का गोबर व मूत्र रखकर तालाब में विसर्जित किया। दलितों का छुआ पानी अशुद्ध हो गया था जिसमें गोबर और मूत्र मिलाने पर शुद्ध कर दिया गया। दलितों के पानी पीने से तालाब अशुद्ध हो जाता है लेकिन कुत्ते बिल्लियों के पानी पीने से नहीं। 

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खैर, इसके बाद भी दलित वर्ग शांत नहीं बैठा और 25 से 27 दिसंबर 1927 को दूसरे सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस बार सभी को पहले ही सूचना दी गई कि अच्छे से तैयार होकर आएं। सवर्ण हिंदुओं को इसकी भनक लगते ही वे मजिस्ट्रेट के पास दौड़े चले गए और नगर में धारा 144 लागू करने की मांग की ताकि दलित चावदार तालाब तक न पहुंचे। डीएम ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया और उनसे कहा कि अगर वह ऐसा चाहते हैं तो अदालत में जाकर यह सिद्ध करें कि वे चावदार तालाब के एकमात्र उपभोक्ता हैं। नौ सवर्ण हिंदुओं ने मिलकर महाड़ के उपन्यायाधीश की अदालत में 12 दिसंबर 1927 को दावा संख्या 405 दायर कर दिया। अब दलितों की ओर से डॉ. आंबेडकर समेत अन्य चार लोग प्रतिवादी बने। इसके साथ ही उन्होंने यह भी अपील कर दी कि मुकदमे के आदेश पर पांचों प्रतिवादी तालाब से पानी नहीं ले सकते। न्यायाधीश ने उनकी यह बात मान ली और सम्मेलन के 11 दिन पहले प्रतिवादियों पर तालाब से पानी पीने पर बैन लगा दिया। 

सम्मेलन के दौरान यह फैसला किया गया कि न्यायालय के आदेश तक इंतजार किया जाए। इसी बीच एक और ऐतिहासिक काम हुआ। डॉ. आंबेडकर ने हजारों दलितों के साथ 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति को आग के हवाले कर दिया। इसे जलाते हुए बाबा साहेब ने इसे अमानवीय करार दिया। मनुस्मृति को जलाने के संबंध में डॉ. आंबेडकर लिखते हैं, “हिंदू समाज व्यवस्था को मनुस्मृति की चट्टान पर खड़ा किया गया है। वह हिंदू धर्म ग्रंथों का अंश है। अतः वह सभी हिंदुओं के लिए पवित्र है। पवित्र होने के कारण वह अकाट्य और अजेय है। मनु न केवल जाति और अस्पृश्यता का समर्थन करता है, बल्कि उसे कानूनी मान्यता भी प्रदान करता है। मनुस्मृति को भस्म करना असीम साहस का काम था। वह तो हिंदू धर्म के घर पर ही प्रहार था। मनुस्मृति में विषमता की भावना व्याप्त है।”

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डॉ.आंबेडकर और कोलाबा के दलितों ने लंबा इंतजार किया। याचिका के करीब दस साल बाद बंबई उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया और कहा कि सभी तालाबों, कुओं, झरनों आदि पानी के प्राकृतिक स्रोतों पर देश के सभी नागरिकों का समान अधिकार हैं। यह फैसला दलितों के संघर्ष की जीत का प्रमाण बना। दलितों ने सिर्फ पानी पीने के लिए ही आंदोलन नहीं किए, बल्कि सार्वजनिक सड़कों के इस्तेमाल और मंदिरों में प्रवेश के लिए भी लंबे आंदोलन किए हैं। कानून की नजर में आज भी सब समान हैं, लेकिन सामाजिक तानाबाना इसकी इजाज़त नहीं देता। जब तक सामाजिक बराबरी नहीं मिलती, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता दें, वह बेमानी है। बाबा साहब की यह बात आज भी मील का पत्थर है। 

आए दिन किसी दलित को घोड़ी से उतार देना, मूंछ रखने पर जान से मार देना, सार्वजनिक स्थलों से खदेड़े जाना, सार्वजनिक मटके से पानी पी लेने पर पिटाई कर देना आदि आम बात है। एक लंबा वक़्त बीत जाने के बाद भी हालत जस के तस हैं। ताजे उदाहरण की बात करें तो राजस्थान स्थित अलवर के जितेंद्र मेघवाल को सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि उनका शानों-शौकत से रहना सवर्णों को पसंद नहीं आया। हरियाणा के ज़िला जींद के तीन गांव के दलितों का सामाजिक बहिष्कार जारी है, जो कि पिछले करीब पांच महीनों से अधिक से इसके विरोध में जींद कोर्ट के बाहर धरने पर बैठे हैं। शोषण और संघर्ष आज भी हर पल हर जगह जारी है। जब भी आप पानी पीते हैं या इसका इस्तेमाल कर रहे होते हैं तो डॉ.आंबेडकर को जरूर याद करें, उन्हें शुक्रिया कहें और अपनी संतानों को पानी के संघर्ष के बारे में बताएं। 

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तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

संदर्भ: बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर संपूर्ण वांग्मय (खंड 10, अस्पृश्य और अस्पृश्यता, अस्पृश्य का विद्रोह और महाड़ सत्याग्रह)

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक. अमर उजाला में रिपोर्टिंग के बाद इन दिनों स्वतंत्र लेखन जीवन का हिस्सा है. फिल्म व पुस्तक समीक्षा लिखना पसंद है. जाति, दलित व समाज पर लेखन. सदैव लिखने, कहने और समझने की ओर अग्रसर.

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