ऑर्केस्ट्रा: मनोरंजन के नाम पर पितृसत्ता की भेंट चढ़ती महिलाएं
तस्वीर साभार: Insight Online News
FII Hindi is now on Telegram

ऑर्केस्ट्रा एक ऐसा समूह है जिनमें शामिल सभी लोग गाने या किसी न किसी म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट को बजाने में पारंगत होते हैं। यह समूह त्योहारों, वैवाहिक समारोहों और अन्य समारोहों में मनोरंजन के लिए शामिल किए जाते हैं। एक तरह से ये कलात्मक और सांस्कृतिक प्रदर्शनों के केन्द्र होते हैं लेकिन बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड जैसे अन्य उत्तर भारतीय राज्यों की स्थिति देखें तो यहां ऑर्केस्ट्रा की कहानी कुछ और ही है। दरअसल, इन राज्यों में ऑर्केस्ट्रा शब्द सुनकर जो छवि दिमाग में उभरती है, उसमें महिला डांसर्स के आस-पास शराब पीकर नाचते तमंचा धारी पुरुष, बैकग्राउंड में बजते अश्लील गाने और डांसर्स की जान पर हर पल बना खतरा, मुख्य रूप से शामिल है।

उत्तर प्रदेश और बिहार में आज भी ज्यादातर शादियां बिना ऑर्केस्ट्रा नाच के पूरी नहीं होती हैं। आर्थिक रूप से संपन्न तबकों द्वारा इन्हें अन्य समारोहों में भी बुलाया जाता है। ऑर्केस्ट्रा मालिकों को एक प्रोग्राम के लिए तीस हजार से एक लाख रुपये आसानी से मिल जाते हैं लेकिन महिला डांसर्स को एक से तीन हजार रुपये ही मिलते हैं। मुख्यधारा में महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर होनेवाले उत्पीड़न और पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलने पर बहुत कुछ लिखा गया है और लगातार लिखा जा रहा है।

समय-समय पर कार्यस्थल पर महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने और कार्यस्थल को सुरक्षित बनाने के लिए चर्चा, अलग-अलग जागरूकता कार्यक्रम भी किए जाते हैं। लेकिन ऑर्केस्ट्रा डांसर्स के साथ कार्यस्थल पर होनेवाले उत्पीड़न के बारे में मैंने शायद ही किसी को बात करते हुए सुना है। शायद इसलिए क्योंकि इस पितृसत्तात्मक समाज के साथ हम सब ने भी इनके साथ होनेवाले उत्पीड़न और भेदभाव को इस तरह स्वीकार कर लिया है कि इनकी व्यथा की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता।

और पढ़ें: विशाखा गाइडलाइंस के बहाने, कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा की वे बातें जो मुख्यधारा से छूट गईं

Become an FII Member

अगर हम ऑर्केस्ट्रा समूहों की महिला डांसर्स की आर्थिक स्थिति का अध्ययन करेंगे तो पाएंगें कि इनमें शामिल ज्यादातर लड़कियां बंगाल, बिहार, यूपी आदि राज्यों के अति पिछड़े इलाकों के सर्वाधिक निचले आर्थिक पायदान से आती हैं। इनमें से कुछ अपनी आर्थिक स्थिति से मजबूर होकर खुद शामिल होती हैं और कुछ तस्करी द्वारा लाई गई किशोरावस्था की लड़कियां होती हैं। सितंबर 2014 और अगस्त 2016 में ऐसी कुछ लड़कियों को पुलिस द्वारा इलाहाबाद से खोजा गया था।

इन महिला डांसर्स को कई बार कुछ दिनों तक लगातार काम करना पड़ता है और इस बीच इन्हें आराम करने का समय भी नहीं मिलता है। ज्यादातर दो-तीन घंटे की नींद के बाद ही दूसरी जगह जाने के लिए लंबी यात्रा शुरू करनी पड़ती है। घर में आर्थिक सहयोग के बाद भी इन्हें डांस जैसे शरीरिक रूप से थकाऊ काम से लौ कर घरेलू कामों में भी खुद को घिसना पड़ता है।

बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, जैसे अन्य उत्तर भारतीय राज्यों की स्थिति देखें तो यहां ऑर्केस्ट्रा की कहानी कुछ और ही है। दरअसल, इन राज्यों में ऑर्केस्ट्रा शब्द सुनकर जो छवि दिमाग में उभरती है, उसमें महिला डांसर्स के आस-पास शराब पीकर नाचते तमंचा धारी पुरुष, बैकग्राउंड में बजते अश्लील गाने और डांसर्स के जान पर हर पल बना खतरा, मुख्य रूप से शामिल है।

18 दिसंबर 2016 को इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने बयान में पंजाब की एक महिला डांसर बताती हैं कि कैसे स्टेज पर हर कोई गलत ढंग से उनके गुप्तांगों को छूना चाहता है। वहीं कई गांवों में उनके लिए चेंजिंग रूम और शौचालय जैसे मूलभूत जरूरतों का भी ध्यान नहीं रखा जाता जिसके कारण शौच के लिए बाहर जाते वक्त यौन हिंसा का खतरा बना रहता हैं। इन अनुभवों से साफ़ पता चलता है कि ये पितृसत्तात्मक समाज इन्हें अपनी उपभोग की वस्तु और इनके शरीर पर अपना एकाधिकार समझता है। सोनिया का यह भी कहना है कि संयोजकों से लेकर मालिकों तक किसी को उनके खाने-पीने की जरूरतों का कोई ध्यान नहीं होता है। वे केवल उनके परफॉर्मेंस और उससे आते पैसों पर ध्यान देते हैं। एक अन्य डांसर के अनुसार शादियों में उन्हें लगभग 5 समारोहों में नाचना होता है और वे मुश्किल से 2-3 घंटे ही सो पाती हैं। 

और पढ़ें: नाच भिखारी नाच : लौंडा नाच के कलाकारों के संघर्षों को दिखाती डॉक्यूमेंट्री

डांसर्स के साथ होनेवाले उत्पीड़न को खुलेआम दिखाता सोशल मीडिया

भोजपुरी में अश्लीत गानों और द्विअर्थी शब्दों की भरमार के साथ इन ऑर्केस्ट्रा ग्रूप्स से गायक विलुप्त होते जा रहे हैं। ऑडियंस की डिमांड पर अश्लील गानों पर नाचती महिला डांसर्स तक सीमित हो गई है। इसके साथ-साथ इन डांसर्स के साथ होनेवाली यौन हिंसा और इनके जान पर खतरे भी बढ़े हैं। स्मार्टफोन के बढ़ते चलन के कारण अब डांसर्स के स्टेज पर आते ही लोग फोन पर वीडियो बनाना शुरू कर देते हैं।

सोशल मीडिया पर मौजूद इन वीडियोज़ को सोशल मीडिया पर अत्यधिक शेयर किया जा रहा है। आज यह स्थिति हो गई है कि ‘आर्केस्ट्रा डांस’ सर्च करते ही आपको ऐसे विडियोज़ की लंबी लिस्ट मिल जाएगी जिसमें भोजपुरी के अश्लील गानों पर नाचती 14-15 साल की लड़कियों से लेकर 30-35 साल की औरतें नज़र आती हैं। साथ ही इन वीडियोज़ में उनका उत्पीड़न करते अपने होश-ओ-हवास में या नशे में धुत हर उम्र, हर वर्ग के पुरुष दिख जाते हैं।

ऑर्केस्ट्रा डांसर्स के साथ कार्यस्थल पर होनेवाले उत्पीड़न के बारे में मैंने शायद ही किसी को बात करते हुए सुना है। शायद इसलिए क्योंकि इस पितृसत्तात्मक समाज के साथ हम सब ने भी इनके साथ होनेवाले उत्पीड़न और भेदभाव को इस तरह स्वीकार कर लिया है कि इनकी व्यथा की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता।

इन डांसर्स के साथ होनेवाले इस तरह की हरकतों और उत्पीड़न की कोई शिकायत नहीं होती है क्योंकि आमतौर पर इसे इनके काम का हिस्सा मान लिया जाता है। इनके साथ होनेवाली हिंसा के जो थोड़े-बहुत मामले दर्ज भी होते हैं उन पर पुलिस और प्रशासन के असंवेदनशील रवैये से हम सब अच्छी तरह वाकिफ़ हैं। हम नीचे दिए इन तथ्यात्मक उदाहरणों से उस डरावनी परिस्थिति का अंदाजा लगाने की कोशिश कर सकते हैं, जिनमें ये महिला डांसर्स काम करने को मजबूर होती हैं:

  • 20 फरवरी 2012 में प्रकाशित एक खबर के अनुसार यूपी में गोंडा के वजीरगंज थाना क्षेत्र में एक शादी में ऑर्केस्ट्रा ग्रुप के एक डांसर के साथ दो युवको ने गैंगरेप किया।
  • दिसंबर 2016 में पंजाब की कुलविन्दर जो डांस से ही अपने भाई की मौत के बाद उसके 3 बच्चों समेत सात सदस्यों वाले परिवार का भरणपोषण कर रही थी, एक शादी में हुई फायरिंग में मारी गई। 
  • जून 2019 में यूपी में एक ऑर्केस्ट्रा डांसर को नशे में धुत आदमी ने इसलिए गोली मार दी क्योंकि वह नाचते हुए रुक गई थी।
  • जनवरी 2022 में रांची में मंडा पूजा के समापन पर बुलाए ऑर्केस्ट्रा के बाद हुई झड़प में दो लोगों की जान चली गई।
  • 20 जून 2022 को एक महिला को उसके पति ने इसलिए तीन तलाक दे दिया क्योंकि उसने ऑर्केस्ट्रा में नाचने से मना कर दिया था।

ये सभी मामले हमें यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि इस पेशे से जुड़ी महिलाओं की आर्थिक-सामाजिक परिस्थिति किस स्तर की है जिसने इन्हें नशे में डूबे इन पुरुषों के बीच अपना आत्मसम्मान और जान दांव पर लगाकर अश्लील गानों पर नाचने को मजबूर किया है। जबकि ये पुरुष जो इनका शोषण करते हैं, वहीं इन्हें चरित्रहीन करार देते हैं, कथित ‘सम्मानित घरों’ के लोग इनकी तरफ देखना भी पसंद नहीं करते। यह काम इनसे समाज में मनुष्य को मनुष्य होने के लिए मिलनेवाले सम्मान का अधिकार भी छीन लेता है। 

और पढ़ें: कार्यस्थल पर होने वाला लैंगिक और जातिगत भेदभाव एक अहम मुद्दा क्यों नहीं बनता


तस्वीर साभार: Insight Online News

+ posts

मेरा नाम श्वेता है,मैंने बीएचयू से स्नातक किया है। फिलहाल मैं मध्यकालीन इतिहास में परास्नातक कर रही हूं। मुझे लोक-चित्रकलाओं के विषय में जानना और उन्हें चित्रित करने में विशेष रुचि है लेकिन अपने अनुभवों को शब्दों में बया़ करना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply